इंद्रियों पर विजय ही उत्तम ब्रह्मचर्य का सच्चा स्वरूप: आचार्यश्री उदारसागर
दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन हुई उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना, भगवान वासुपूज्य स्वामी का मोक्ष कल्याणक भी मनाया
मुरैना (मनोज जैन नायक। दशलक्षण धर्म के दसवें एवं अंतिम दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की गई। इस अवसर पर जैनाचार्य अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज के ससंघ सान्निध्य में धर्मसभा आयोजित हुई। आचार्यश्री ने ब्रह्मचर्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य केवल विषय-वासनाओं से दूर रहने का नाम नहीं है, बल्कि मन, वचन और काया को विकारों से बचाकर आत्मा में रमण करना ही इसका वास्तविक स्वरूप है।
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है—‘ब्रह्म’ अर्थात अपनी शुद्ध आत्मा में ‘चर्या’ अर्थात रमण करना। जब व्यक्ति का मन बाहरी आकर्षणों से हटकर भीतर की ओर मुड़ता है, तभी वह वास्तविक ब्रह्मचर्य को समझ पाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरियों में उसकी इंद्रियां भी शामिल हैं। आंखें सुंदरता की ओर, कान मधुर शब्दों की ओर, जीभ स्वाद की ओर और मन विभिन्न विषयों की ओर आकर्षित होता है। यदि इन इंद्रियों पर संयम नहीं रखा गया तो धार्मिक अनुष्ठानों के बावजूद आत्मिक शांति प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
उन्होंने ब्रह्मचर्य को जीवन की ऊर्जा को सही दिशा देने वाली साधना बताते हुए कहा कि जैसे बांध में पानी को रोककर उसका सदुपयोग किया जाए तो वही पानी खेतों की सिंचाई कर फसल पैदा करता है, लेकिन बांध टूटने पर वही पानी विनाश का कारण बन सकता है। इसी प्रकार मनुष्य अपनी ऊर्जा को संयमित कर आत्मकल्याण में लगाए तो जीवन ऊंचा उठता है, जबकि इंद्रियों को अनियंत्रित छोड़ देने पर वही ऊर्जा पतन का कारण बन सकती है।
आचार्यश्री ने कहा कि आज मनुष्य बाहरी सुखों के पीछे भाग रहा है। उसे लगता है कि अधिक भोग करने से सुख मिलेगा, लेकिन भोग से मन की तृप्ति नहीं होती। एक इच्छा पूरी होने के बाद दूसरी इच्छा जन्म लेती है और व्यक्ति इच्छाओं की श्रृंखला में उलझता चला जाता है। संयम ही इस श्रृंखला को तोड़ने का मार्ग है।

मन की शुद्धता ही ब्रह्मचर्य: मुनिश्री उपशांतसागरजी
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल शरीर से संबंधित विषय नहीं है, बल्कि इसकी शुरुआत विचारों की पवित्रता से होती है। मन में जिस प्रकार के विचार उत्पन्न होते हैं, उनका प्रभाव धीरे-धीरे व्यक्ति के आचरण में दिखाई देने लगता है। इसलिए ब्रह्मचर्य की साधना सबसे पहले मन की निगरानी से शुरू होती है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने खान-पान, संगति, दृष्टि, विचार और व्यवहार पर संयम रखना चाहिए। मन को विषयों से हटाकर आत्मा की ओर लगाना ही ब्रह्मचर्य की साधना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार आग के पास सूखी वस्तु रखने पर उसके जलने की संभावना रहती है, उसी प्रकार विषयों के प्रति बार-बार आकर्षण रखने से मन भी विकारों से प्रभावित हो सकता है।
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि ब्रह्मचर्य का पालन केवल साधु-संतों तक सीमित नहीं है। गृहस्थ भी अपने जीवन में मर्यादा, संयम और पवित्रता को अपनाकर ब्रह्मचर्य धर्म की भावना को आत्मसात कर सकते हैं। वैवाहिक जीवन में भी मर्यादा, परस्पर सम्मान और संयम का महत्व है। संयमित जीवन परिवार में शांति और अच्छे संस्कारों को बढ़ावा देता है।
युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल, इंटरनेट और मनोरंजन के विभिन्न साधन मन को लगातार आकर्षित करते हैं। ऐसे वातावरण में अपनी दृष्टि और विचारों की रक्षा करना भी एक प्रकार की तपस्या है। जो व्यक्ति अपनी नजर और विचारों को नियंत्रित करना सीख लेता है, वह अपने जीवन की दिशा को भी बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकता है।
मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण लाडू समर्पित
दशलक्षण पर्व के अवसर पर तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव भी आचार्यश्री के ससंघ सान्निध्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्रीजी के निर्देशन में धार्मिक विधि-विधान के साथ निर्वाण लाडू समर्पित किया गया।
प्रथम निर्वाण लाडू अर्पित करने का सौभाग्य अभिषेक जैन टीटू, अनिकेत जैन एवं आलोक प्रेस परिवार को प्राप्त हुआ। इसके बाद उपस्थित साधर्मी बंधुओं ने निर्वाण कांड का वाचन करते हुए भगवान को निर्वाण लाडू अर्पित किए। धार्मिक आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति और आस्था के साथ दशलक्षण पर्व के अंतिम दिवस की आराधना की।
