पर्युषण पर्व: आत्मा की शुद्धि का महापर्व—मुस्कान जैन
अम्बाह/मुरैना। जैन धर्म में पर्युषण पर्व को आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और संयम का महापर्व माना जाता है। गैर-जैन समाज के लोगों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि पर्युषण क्या है और इसे पर्वों का महापर्व क्यों कहा जाता है। वास्तव में ‘पर्युषण’ का भाव अपनी आत्मा के निकट आना, स्वयं में ठहरना और आत्मावलोकन करना है। यह पर्व बाहरी दुनिया की भाग-दौड़ से विराम लेकर अपने भीतर झांकने और स्वयं को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
दिगंबर जैन समाज में पर्युषण पर्व दस लक्षण महापर्व के रूप में दस दिनों तक श्रद्धा, संयम और तप के साथ मनाया जाता है। सामान्य दिनों में हम अपने घर और आसपास की सफाई करते हैं, जबकि इन दिनों में अपनी आत्मा की सफाई का प्रयास किया जाता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों से दूर रहकर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना ही इस पर्व का मूल उद्देश्य है।
व्रत और नियमों से संयम का अभ्यास
पर्युषण पर्व का प्रमुख आधार संयम और तप है। इन दिनों श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न व्रत एवं नियम धारण करते हैं।
उपवास में पूरे दिन अन्न का त्याग किया जाता है। अनेक श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार लगातार कई दिनों तक उपवास भी करते हैं।
एकासना में दिन में एक बार, एक ही स्थान पर बैठकर भोजन किया जाता है और सूर्यास्त के बाद भोजन का त्याग किया जाता है। कई श्रद्धालु इस दौरान कंद-मूल सहित विभिन्न खाद्य पदार्थों का त्याग करते हैं।
बेआसना में दिन में दो बार, सामान्यतः सुबह और दोपहर में, सूर्यास्त से पहले भोजन किया जाता है।
इसके अलावा श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार रात्रि भोजन का त्याग, कंद-मूल का त्याग, चप्पल-जूते का त्याग, मौन या अल्पभाषिता, मोबाइल-टीवी से दूरी, मंदिर दर्शन, स्वाध्याय और प्रतिक्रमण जैसे नियम भी अपनाते हैं। प्रतिक्रमण आत्मावलोकन और अपनी भूलों के लिए पश्चाताप करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
क्षमावाणी का संदेश
पर्युषण के समापन पर क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर एक-दूसरे से हाथ जोड़कर “मिच्छामि दुक्कडम्” कहा जाता है। इसका भाव है कि जाने-अनजाने में यदि किसी से कोई गलती हुई हो या किसी के मन को ठेस पहुंची हो तो उसके लिए क्षमा मांगना और दूसरों को भी क्षमा करना।
दस लक्षण पर्व के दस उत्तम धर्म
दस लक्षण महापर्व में दस उत्तम धर्मों का विशेष महत्व है। इनमें उत्तम क्षमा के तहत क्रोध का त्याग और क्षमा का भाव, उत्तम मार्दव में अहंकार छोड़कर विनम्रता, उत्तम आर्जव में मन-वचन-कर्म की सरलता और छल-कपट से दूरी शामिल है।
उत्तम शौच लोभ और अत्यधिक इच्छाओं का त्याग कर संतोष एवं मन की पवित्रता का संदेश देता है। उत्तम सत्य में हितकारी और प्रिय सत्य बोलने की प्रेरणा है। उत्तम संयम मन और पांचों इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का अभ्यास है। उत्तम तप में व्रत, उपवास और तपस्या के माध्यम से इच्छाओं पर नियंत्रण किया जाता है।
इसी तरह उत्तम त्याग परोपकार के लिए अपनी प्रिय वस्तुओं और सुविधाओं का त्याग करने की प्रेरणा देता है। उत्तम आकिंचन्य वस्तुओं के प्रति मोह और ममत्व छोड़ने का संदेश देता है, जबकि उत्तम ब्रह्मचर्य मन, वचन और आचरण की पवित्रता बनाए रखने की सीख देता है।
भोजन के त्याग से आगे आत्मशुद्धि का संदेश
आज पर्युषण पर्व की चर्चा कई बार केवल इस बात तक सीमित रह जाती है कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, कितने दिन उपवास करना है या एकासना करना है। निश्चित रूप से व्रत और तप इस पर्व की महत्वपूर्ण साधनाएं हैं, लेकिन पर्युषण का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं है।
पर्युषण हमें अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, छल, लोभ, मोह और विकारों को पहचानकर उनसे दूर होने की प्रेरणा देता है। यह आत्मचिंतन, संयम, क्षमा, त्याग और आत्मशुद्धि का पर्व है।
सच्चा पर्युषण तभी सार्थक होगा, जब इन दस धर्मों की भावना केवल मंदिर और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर हमारे व्यवहार और दैनिक जीवन में भी दिखाई दे। क्योंकि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि निर्मल और शांत अंतर्मन में निहित है।
— मुस्कान जैन
अम्बाह, मुरैना (मध्यप्रदेश)
