आठ बार प्रथम पुरस्कार जीत चुकी श्री रविदास व्यायामशाला में युवाओं को शस्त्र कला का प्रशिक्षण
अनंत चतुर्दशी चल समारोह में पहली बार बालिकाएं भी दिखाएंगी प्रतिभा, ‘गतका फरी’ और ‘दो हाथ की बनेठी’ का करेंगी प्रदर्शन
इंदौर। शहर की ऐतिहासिक अखाड़ा परंपरा को जीवित रखने के उद्देश्य से रुस्तम का बगीचा स्थित सार्वजनिक श्री रविदास व्यायामशाला में युवाओं और बालिकाओं को पारंपरिक शस्त्र कला का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अनंत चतुर्दशी पर 25 सितंबर को आयोजित होने वाले चल समारोह में व्यायामशाला के खिलाड़ी अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे। इस बार विशेष बात यह है कि व्यायामशाला की बालिकाएं भी पहली बार चल समारोह में शामिल होकर लाखों दर्शकों के सामने शस्त्र कला का प्रदर्शन करेंगी।
करीब 77 वर्ष पुरानी श्री रविदास व्यायामशाला अनंत चतुर्दशी चल समारोह में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अलग पहचान रखती है। व्यायामशाला अब तक लगातार आठ बार प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है। इसके अतिरिक्त भी विभिन्न वर्षों में इसके खिलाड़ियों ने प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान हासिल कर संस्था तथा शहर का गौरव बढ़ाया है।
दो महीने से चल रहा विशेष प्रशिक्षण
व्यायामशाला के उस्ताद कमल पाल और अध्यक्ष मिथिलेश कैमरे ने बताया कि अनंत चतुर्दशी चल समारोह की तैयारी करीब दो महीने पहले ही शुरू कर दी गई थी। युवाओं और बच्चों को नियमित रूप से पारंपरिक शस्त्र चलाने, संतुलन बनाए रखने तथा समूह में अनुशासित तरीके से प्रदर्शन करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
कई युवा पहली बार इस ऐतिहासिक चल समारोह में शामिल होंगे। इसे लेकर उनमें विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। प्रशिक्षण के दौरान सुरक्षा और अनुशासन का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है। कलाकारों को निर्धारित समय में अपनी कला प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करने का अभ्यास कराया जा रहा है।
व्यायामशाला से जुड़ी बालिकाएं भी पूरे उत्साह के साथ अभ्यास कर रही हैं। उन्हें पारंपरिक शस्त्र कला की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। आयोजकों के अनुसार बालिकाओं की सहभागिता से अन्य लड़कियों को भी इस प्राचीन कला को सीखने और खेल गतिविधियों से जुड़ने की प्रेरणा मिलेगी।
‘गतका फरी’ और ‘दो हाथ की बनेठी’ का प्रदर्शन
स बार अनंत चतुर्दशी चल समारोह में सार्वजनिक श्री रविदास व्यायामशाला के कलाकार ‘गतका फरी’ और ‘दो हाथ की बनेठी’ का प्रदर्शन करेंगे। जिला प्रशासन के निर्णायक मंच के सामने इन्हीं दो पारंपरिक शस्त्र कला विधाओं का प्रदर्शन किया जाएगा।
प्रत्येक अखाड़े को हर कला के प्रदर्शन के लिए तीन-तीन मिनट का समय दिया जाएगा। निर्धारित समय में अनुशासन, तालमेल, तकनीक और कला का प्रभावशाली प्रदर्शन करने वाले अखाड़ों का चयन पुरस्कार के लिए किया जाएगा। महिला खिलाड़ियों और महिला अखाड़ों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष पुरस्कार भी दिए जाने की व्यवस्था की गई है।
अनंत चतुर्दशी चल समारोह के दौरान शहर की प्रमुख सड़कों से आकर्षक झांकियां निकाली जाएंगी। इनके साथ विभिन्न अखाड़ों के कलाकार पारंपरिक शस्त्र कला का प्रदर्शन करेंगे। जिला प्रशासन द्वारा सर्वश्रेष्ठ झांकियों और अखाड़ों का चयन कर उन्हें सम्मानित किया जाएगा।
राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी खिलाड़ियों ने बढ़ाया गौरव
श्री रविदास व्यायामशाला केवल अनंत चतुर्दशी चल समारोह तक सीमित नहीं है। यहां पूरे वर्ष खिलाड़ियों को पारंपरिक लाठी और अन्य शस्त्र कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाता है। व्यायामशाला के खिलाड़ी राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में भी भाग लेकर पदक जीत रहे हैं।
इस वर्ष व्यायामशाला के खिलाड़ी प्रवीण सांवरिया ने राष्ट्रीय परंपरागत लाठी स्पर्धा में स्वर्ण पदक, जबकि जीवेश बिलोरे ने रजत पदक प्राप्त कर मध्य प्रदेश का गौरव बढ़ाया। खिलाड़ियों की इन उपलब्धियों से व्यायामशाला से जुड़े प्रशिक्षकों और सदस्यों में उत्साह है।
व्यायामशाला के अध्यक्ष मिथिलेश कैमरे अंतरराष्ट्रीय ताइक्वांडो प्रशिक्षक होने के साथ जिला लाठी संघ के अध्यक्ष भी हैं। वे इंदौर के विभिन्न अखाड़ों के खिलाड़ियों को एक मंच पर लाने और उन्हें प्रतियोगिताओं में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि पारंपरिक शस्त्र कला को केवल त्योहारों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे खेल के रूप में विकसित कर बालक-बालिकाओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का अवसर दिया जाए।
घटती जा रही अखाड़ों की संख्या
इंदौर के विभिन्न क्षेत्रों में पहले दो से चार अखाड़े हुआ करते थे। शहर में इनकी संख्या 90 से अधिक बताई जाती थी, लेकिन अब करीब 65 अखाड़े ही शेष रह गए हैं। इनमें से भी कई अखाड़े संसाधनों और आर्थिक सहयोग की कमी के कारण बंद होने की स्थिति में हैं।
अखाड़ों के संचालकों का कहना है कि जिस प्रकार प्रशासन अनंत चतुर्दशी की झांकियों को सहयोग देता है, उसी तरह अखाड़ों और व्यायामशालाओं को भी आर्थिक एवं तकनीकी सहायता मिलनी चाहिए। पारंपरिक शस्त्र कला सिखाने वाले अनुभवी उस्तादों की संख्या भी लगातार कम हो रही है। ऐसे में इस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए योजनाबद्ध प्रयास आवश्यक हैं।
शहर की पहचान है अखाड़ा परंपरा
इंदौर में अखाड़ों की परंपरा का इतिहास काफी पुराना है। प्रारंभिक दौर में अखाड़े शारीरिक विकास, अनुशासन और युद्ध कला के प्रशिक्षण के प्रमुख केंद्र होते थे। समय के साथ अखाड़े धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का भी अभिन्न हिस्सा बन गए।
शहर की कपड़ा मिलें बंद होने के बाद झांकियों और अखाड़ों की संख्या पर असर पड़ा, लेकिन कलाकारों और उस्तादों ने इस परंपरा को समाप्त नहीं होने दिया। अनंत चतुर्दशी का चल समारोह आज भी इंदौर की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। श्री रविदास व्यायामशाला के खिलाड़ी भी इस वर्ष अपनी कला से शहर की इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते नजर आएंगे।
