जो आपके पास है उसे कोसें नहीं, जो नहीं है उसकी इच्छा न करें: ऋषिराज मुनि श्री सुधासागर जी
दलाल बाग की चातुर्मासिक धर्मसभा में दिया संतोष और कृतज्ञता का संदेश, कहा—इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, उनके निरोध में है सच्ची शांति
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू
इंदौर। दलाल बाग में आयोजित चातुर्मासिक धर्मसभा में ऋषिराज मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी से श्रद्धालुओं को जीवन और अध्यात्म का गहन सूत्र समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवनभर अपनी इच्छाओं को पूरा करने के पीछे भागता रहता है, लेकिन सच्ची शांति इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि इच्छाओं के निरोध और संतोष में मिलती है।
जो मिला है, उसके लिए धन्यवाद दें
मुनि श्री ने कहा, “जो आपके पास है, उसे कोसें नहीं और जो नहीं है, उसकी इच्छा न करें। जो मिला है, उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दें।”
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस सरल सूत्र को छह महीने तक भी पूरी ईमानदारी से अपने जीवन में उतार ले तो परिस्थितियां बदलें या न बदलें, लेकिन जीवन को देखने की उसकी दृष्टि निश्चित रूप से बदल जाएगी। परिस्थितियों के प्रति दृष्टिकोण बदलते ही मन में संतोष, शांति और सकारात्मकता का भाव जागृत होने लगता है।
अभाव नहीं, उपलब्धियों पर ध्यान दें
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति अधिकांश समय इसी बात से दुःखी रहता है कि उसके पास क्या नहीं है। कोई धन के अभाव में दुःखी है, कोई प्रतिष्ठा चाहता है, कोई सफलता नहीं मिलने से परेशान है तो कोई आध्यात्मिक ऊंचाई प्राप्त नहीं कर पाने का दुःख मनाता है।
मनुष्य इस दौरान यह भूल जाता है कि उसे जीवन में कितना कुछ प्राप्त हुआ है। मनुष्य जन्म मिलना, जैन धर्म प्राप्त होना, जिनवाणी सुनने का अवसर, मंदिर और गुरु का सान्निध्य मिलना तथा व्रत एवं त्याग करने की प्रेरणा प्राप्त होना—ये सभी जन्म-जन्मांतर के पुण्य का परिणाम हैं।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म को केवल कर्तव्य मानकर नहीं करना चाहिए, बल्कि इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य समझकर श्रद्धा और समर्पण के साथ अपनाना चाहिए।
जीवन को कोसने की आदत सबसे बड़ा ‘भूत’
मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि कठिन परिस्थिति आते ही मनुष्य कभी बुरी नजर, कभी किसी बाहरी शक्ति और कभी अपने भाग्य को दोष देने लगता है। वास्तव में जीवन का सबसे बड़ा ‘भूत’ कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को बार-बार कोसने की आदत है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि व्यापार में कमी आने पर व्यक्ति कहने लगता है—“यह कैसा व्यापार है?” घर में परेशानी आते ही कहता है—“यह कैसी जिंदगी है?” जो कुछ मिला है, उसी को बार-बार कोसते रहने से व्यक्ति के जीवन से संतोष समाप्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि सुखी रहने के लिए बाहरी परिस्थितियों से अधिक अपनी सोच को बदलना आवश्यक है। कृतज्ञता का भाव मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करने की शक्ति प्रदान करता है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु
धर्मसभा में आकाश जैन, आलोक जैन, आनंद जैन, नवीन गोधा, अक्षय कासलीवाल, विपुल बांझल, भूपेंद्र जैन, ब्रह्मचारी पारस भैया, डॉ. जैनेन्द्र जैन, स्वदेश जैन गुरुजी, अखिलेश सौधिया, सविता दीदी, मुक्ता जैन, सोनाली बगड़िया और रानी डोशी सहित बड़ी संख्या में समाजजन एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने मुनि श्री के मंगल प्रवचनों का धर्मलाभ प्राप्त किया।
