श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन संघ को बंबोरी परिवार ने अष्टमंगल अर्पण किया। साध्वी सौम्यकला श्रीजी ने धर्मसभा में अष्टमंगल के 8 पवित्र चिन्हों का महत्व बताया।
श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन संघ को अष्टमंगल अर्पण, बंबोरी परिवार ने लिया लाभ
अष्टमंगल से होगी मंदिर के साधारण खाते में वृद्धि, साध्वी सौम्यकला श्रीजी ने बताए 8 पवित्र चिन्हों के आध्यात्मिक अर्थ
भायंदर। श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन संघ को अष्टमंगल अर्पण का धार्मिक एवं मंगलकारी आयोजन श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। गच्छाधिपति आचार्य विजय नित्यानंद सुरीश्वरजी म.सा. एवं गच्छाधिपति आचार्य कुलचंद्र सुरीश्वरजी (KC) म.सा. के आशीर्वाद से श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन संघ द्वारा संचालित भायंदर के प्रथम ऐसे श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर को अष्टमंगल अर्पण किया गया। इससे मंदिर के साधारण खाते में वृद्धि होगी।
बंबोरी परिवार ने लिया अष्टमंगल अर्पण का लाभ
यह आयोजन संघ के तत्वावधान में गच्छाधिपति आचार्य विजय धर्म धुरंधर सुरीश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी सौम्यकला श्रीजी आदि ठाणा की निश्रा में संपन्न हुआ।
इसके लाभार्थी रमेश बंबोरी परिवार ने मोहनराजजी डी. बंबोरी एवं सोहनबाई मोहनराजजी बंबोरी, सादड़ी के दिव्य आशीष से अ.सौ. शकुंतला रमेश बंबोरी एवं वीणा दीपक बंबोरी के चौदह पूर्व की तपस्या पूर्ण होने के अवसर पर संघ को अष्टमंगल अर्पण किया।
बंबोरी परिवार के निवास स्थान से उपाश्रय पहुंचने के बाद विशाल धर्मसभा का आयोजन हुआ।
साध्वी सौम्यकला श्रीजी ने बताया अष्टमंगल का महत्व
धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी सौम्यकला श्रीजी ने कहा कि जैन धर्म में अष्टमंगल 8 सबसे पवित्र और मांगलिक चिन्ह माने जाते हैं। कोई भी शुभ कार्य, पूजा, स्थापना या अर्पण इनके बिना अधूरा माना जाता है।
उन्होंने कहा कि ये आठ चिन्ह हमें मोक्ष के मार्ग की याद दिलाते हैं।
जानिए अष्टमंगल के 8 पवित्र चिन्ह
1. स्वस्तिक: शांति और चार गतियों—देव, मनुष्य, तिर्यंच और नरक से मुक्ति का प्रतीक है।
2. श्रीवत्स: भगवान के हृदय पर स्थित चिन्ह है। यह अनंत करुणा और विशुद्ध प्रेम का प्रतीक है।
3. नंदावर्त: बड़ा स्वस्तिक है। यह भव्यता और उच्च आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है, जिससे मोक्ष का द्वार खुलता है।
4. वर्धमानक/सम्पुट: दीपक जैसी आकृति वाला पात्र है। यह धन, वृद्धि और सांसारिक दुखों के नाश का प्रतीक है।
5. भद्रासन/सिंहासन: भगवान के बैठने का पवित्र आसन है। यह सर्वोच्च पद और जगत के कल्याण का प्रतीक है।
6. कलश: मंगल कलश ज्ञान रूपी अमृत से भरा हुआ माना जाता है। यह पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक है।
7. दर्पण: आत्म दर्शन का प्रतीक है। जैसे दर्पण में अपना रूप दिखाई देता है, वैसे ही मनुष्य को अपने आत्म-स्वरूप को देखना चाहिए।
8. मत्स्य युगल/मीन युगल: दो मछलियों का जोड़ा संसार रूपी सागर से पार होने और जीवन की चंचलता पर नियंत्रण का प्रतीक है।
संघ और परिवार में हमेशा मंगल की कामना
साध्वी सौम्यकला श्रीजी ने अष्टमंगल के महत्व को समझाते हुए कहा कि जब श्री चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन संघ को अष्टमंगल अर्पण किया जाता है, तो इसका अर्थ है कि हम प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि हमारे जीवन, संघ और परिवार में हमेशा मंगल बना रहे, सभी विघ्न दूर हों और सभी जीवों को धर्म का मार्ग मिले।
उन्होंने कहा कि अष्टमंगल को घर, मंदिर और शुभ प्रसंगों पर अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
इस धार्मिक अवसर पर शहर की पहली पूर्व महिला विधायक गीता जैन सहित अनेक गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे। श्रद्धा और धर्ममय वातावरण के बीच संपन्न आयोजन में बंबोरी परिवार द्वारा किए गए अष्टमंगल अर्पण का विशेष महत्व रहा।


