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LPG Import: भारत ने अमेरिका से खरीदी 2.60 अरब डॉलर की पेट्रोलियम गैस, पहली तिमाही में आयात 254% बढ़ा; कच्चे तेल की खरीद घटी

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Published On: 1 September 2026
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LPG Import: भारत ने अमेरिका से खरीदी 2.60 अरब डॉलर की पेट्रोलियम गैस, पहली तिमाही में आयात 254% बढ़ा; कच्चे तेल की खरीद घटी

मध्य पूर्व में सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों के बीच भारत ने अमेरिका से बढ़ाया LPG आयात, अप्रैल-जून 2026 में पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की खरीद में बड़ी तेजी; अमेरिकी कच्चे तेल का आयात 3.70 अरब डॉलर से घटकर 1.57 अरब डॉलर

बिजनेस डेस्क। वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अनिश्चितताओं के बीच भारत ने अपनी LPG आपूर्ति को मजबूत करने के लिए अमेरिका से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की खरीद में बड़ी बढ़ोतरी की है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2026 के दौरान अमेरिका से भारत के पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, विशेष रूप से LPG से जुड़े आयात का मूल्य बढ़कर करीब 2.60 अरब डॉलर पहुंच गया।

आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में इसमें करीब 254 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। दूसरी ओर इसी अवधि में अमेरिका से भारत के कच्चे तेल के आयात में बड़ी गिरावट देखने को मिली और यह घटकर लगभग 1.57 अरब डॉलर रह गया।

वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति में बनी अनिश्चितता और मध्य पूर्व से होने वाली सप्लाई में व्यवधान की आशंकाओं के बीच अमेरिका से LPG की बढ़ी खरीद को भारत की ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अप्रैल-जून में 2.60 अरब डॉलर तक पहुंचा आयात

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में अमेरिका से भारत का पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का आयात करीब 735 मिलियन डॉलर था। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में यह बढ़कर करीब 2.60 बिलियन डॉलर यानी 2.60 अरब डॉलर हो गया।

इस तरह सालाना आधार पर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के आयात में लगभग 254 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

इस आयात में LPG से जुड़े उत्पादों, विशेष रूप से लिक्विड प्रोपेन और ब्यूटेन की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी बताई गई है। भारत में घरेलू और अन्य जरूरतों के लिए LPG की बड़ी खपत होती है, इसलिए इसकी पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

आखिर क्या है LPG और कैसे तैयार होती है?

LPG का पूरा नाम Liquefied Petroleum Gas है। यह मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन जैसी हाइड्रोकार्बन गैसों का मिश्रण होती है। इसे दबाव के जरिए तरल रूप में रखा जाता है, जिससे इसका भंडारण और परिवहन आसान हो जाता है।

भारत में LPG का सबसे सामान्य उपयोग घरों में खाना पकाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा होटल, रेस्टोरेंट, छोटे उद्योग और कई व्यावसायिक गतिविधियों में भी इसका इस्तेमाल होता है।

भारत में LPG का घरेलू उत्पादन भी होता है, लेकिन बड़ी मांग को पूरा करने के लिए विदेशों से भी प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया जाता है।

मध्य पूर्व की परिस्थितियों के बीच अमेरिका से बढ़ी खरीद

अप्रैल से जून के दौरान वैश्विक ऊर्जा बाजार में सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी रही। मध्य पूर्व में तनाव और प्रमुख समुद्री मार्गों से ऊर्जा उत्पादों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका ने कई आयातक देशों के लिए वैकल्पिक स्रोतों की अहमियत बढ़ा दी।

भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों से तेल और गैस खरीदता रहा है। किसी एक क्षेत्र या देश पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए आपूर्ति स्रोतों में विविधता ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ऐसे माहौल में अमेरिका से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की खरीद में हुई तेज वृद्धि को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

कच्चे तेल का आयात 3.70 अरब डॉलर से घटकर 1.57 अरब डॉलर

जहां अमेरिका से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का आयात तेजी से बढ़ा है, वहीं कच्चे तेल की खरीद में विपरीत तस्वीर सामने आई है।

आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-जून 2025 के दौरान अमेरिका से भारत का कच्चे तेल का आयात लगभग 3.70 अरब डॉलर था। अप्रैल-जून 2026 में यह घटकर करीब 1.57 अरब डॉलर रह गया।

इस तरह सालाना आधार पर अमेरिका से कच्चे तेल के आयात के मूल्य में करीब 57.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

कच्चे तेल की खरीद में इस तरह का उतार-चढ़ाव कई कारणों से हो सकता है। भारतीय रिफाइनरियां अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदते समय कीमत, ग्रेड, परिवहन लागत, रिफाइनिंग जरूरत और बाजार की परिस्थितियों जैसे कारकों को ध्यान में रखती हैं।

LPG बढ़ी, लेकिन क्रूड ऑयल की खरीद घटी

अमेरिका के साथ भारत के ऊर्जा कारोबार में पहली तिमाही के आंकड़े दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। एक तरफ कच्चे तेल का आयात कम हुआ, जबकि दूसरी ओर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, खासकर LPG से जुड़े उत्पादों की खरीद कई गुना बढ़ गई।

इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल कुल तेल आयात को देखकर ऊर्जा व्यापार की पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। अलग-अलग पेट्रोलियम उत्पादों की मांग और खरीद बाजार की जरूरतों के अनुसार बदलती रहती है।

LPG की मांग को देखते हुए प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

क्या अब देश में LPG की किल्लत नहीं होगी?

अमेरिका से LPG से जुड़े उत्पादों की खरीद में बड़ी बढ़ोतरी निश्चित रूप से आपूर्ति के स्रोत बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। हालांकि केवल एक तिमाही के आयात आंकड़ों के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि भविष्य में LPG की किल्लत की संभावना पूरी तरह समाप्त हो गई है।

LPG की उपलब्धता अंतरराष्ट्रीय बाजार, समुद्री परिवहन, वैश्विक कीमतों, घरेलू उत्पादन, मांग और आयात व्यवस्था सहित कई कारकों पर निर्भर करती है।

अलग-अलग देशों से खरीद बढ़ने से किसी एक क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में जोखिम कम करने में मदद जरूर मिल सकती है।

भारत में भी होता है LPG का उत्पादन

भारत अपनी जरूरत की पूरी LPG केवल आयात से हासिल नहीं करता। देश की रिफाइनरियों और गैस प्रोसेसिंग सुविधाओं के माध्यम से घरेलू स्तर पर भी LPG का उत्पादन किया जाता है।

इसके बावजूद देश में LPG की बड़ी खपत के कारण आयात की आवश्यकता बनी रहती है। यही कारण है कि भारत खाड़ी देशों सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बाजारों से LPG और उससे जुड़े उत्पाद खरीदता है।

अमेरिका से खरीद में हुई हालिया बढ़ोतरी से भारत के लिए आयात स्रोतों का दायरा और व्यापक हुआ है।

ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम है सप्लाई में विविधता

भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में शामिल है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और बड़ी आबादी के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की मांग भी काफी अधिक है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी संकट का असर घरेलू बाजार पर पड़ने का जोखिम बना रहता है।

अलग-अलग देशों से कच्चा तेल, LPG और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने की रणनीति इस जोखिम को कम करने में मदद कर सकती है।

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में अमेरिका से पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का आयात 2.60 अरब डॉलर तक पहुंचना इसी बदलते ऊर्जा व्यापार की महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करता है। आने वाली तिमाहियों के आंकड़ों से यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका से LPG से जुड़े उत्पादों की बढ़ी हुई खरीद आगे भी इसी स्तर पर जारी रहती है या वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के साथ इसमें बदलाव आता है।

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