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त्याग, संयम और आत्मविजय से ही जीवन बनता है सार्थक: आचार्यश्री उदारसागर; 19 अगस्त को पार्श्वनाथ मोक्ष कल्याणक महोत्सव

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Published On: 18 August 2026
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त्याग, संयम और आत्मविजय से ही जीवन बनता है सार्थक: आचार्यश्री उदारसागर; 19 अगस्त को पार्श्वनाथ मोक्ष कल्याणक महोत्सव

रिपोर्टर: मनोज जैन नायक

Morena Jain News: मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने त्याग, तप, संयम और अपरिग्रह का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि सच्चे गुरु की पहचान केवल ज्ञान से नहीं, बल्कि उनके आचरण और त्याग से होती है। वहीं मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक विकारों पर विजय को वास्तविक आत्मविजय बताया। बुधवार, 19 अगस्त को भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव बड़े जैन मंदिर में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा।

मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर में चातुर्मासरत जैनाचार्य विद्यासागरजी एवं अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री 108 उदारसागरजी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को धर्म, संयम, त्याग और आत्मकल्याण का संदेश दिया।

आचार्यश्री ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी द्वारा रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ के माध्यम से सच्चे गुरु के लक्षणों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान देने वाला या उपदेश देने वाला नहीं होता, बल्कि अपने आचरण से शिष्य को धर्म और आत्मकल्याण की दिशा दिखाने वाला होता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन केवल भौतिक साधनों और सुविधाओं के संग्रह से सार्थक नहीं होता। जीवन की वास्तविक सार्थकता त्याग, संयम और स्वयं के विकारों पर विजय प्राप्त करने में है।

सच्चे गुरु की पहचान उनके आचरण से होती है

आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि सच्चे गुरु की पहचान उनके ज्ञान के साथ उनके त्याग, तप, संयम और अपरिग्रह से होती है। गुरु स्वयं जिस मार्ग पर चलते हैं, उसी मार्ग पर अपने शिष्यों और समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

उन्होंने मूलाचार में वर्णित गुरु के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा करते हुए दिगम्बर साधु के नग्नत्व की महत्ता समझाई।

आचार्यश्री ने कहा कि दिगम्बर साधु का नग्नत्व किसी प्रदर्शन का विषय नहीं है। यह पूर्ण अपरिग्रह और सांसारिक वस्तुओं के प्रति ममत्व के त्याग का प्रतीक है। जब साधु वस्त्र सहित समस्त बाहरी परिग्रहों का त्याग करता है, तब वह आत्मा की वास्तविक स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है।

वस्तु नहीं, उसके प्रति आसक्ति बनती है परिग्रह

आचार्यश्री ने अपरिग्रह की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल अपने पास वस्तुओं की संख्या कम कर लेना वास्तविक अपरिग्रह नहीं है। वस्तुओं के प्रति मन में मौजूद ममत्व और आसक्ति का समाप्त होना ही सच्चा अपरिग्रह है।

उन्होंने सूई, पापड़ और बड़ी जैसे सामान्य उदाहरणों के माध्यम से श्रद्धालुओं को समझाया कि वस्तु छोटी हो या बड़ी, महंगी हो या साधारण, यदि उसके प्रति मन में ‘यह मेरा है’ का भाव उत्पन्न हो जाता है तो वही परिग्रह का कारण बनता है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक परिग्रह वस्तु में नहीं बल्कि व्यक्ति के मन में मौजूद आसक्ति में होता है। इसलिए धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि मन के भीतर मौजूद मोह और ममत्व को कम करना है।

सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन मन की शांति होती जा रही कम

आचार्यश्री ने वर्तमान जीवनशैली का उल्लेख करते हुए कहा कि आज मनुष्य सुविधाओं को ही सुख समझने लगा है। घर बड़े होते जा रहे हैं और भौतिक वस्तुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद मन की शांति कम होती जा रही है।

उन्होंने कहा कि इसका कारण बाहरी साधनों की कमी नहीं, बल्कि भीतर लगातार बढ़ता मोह और ममत्व है।

जैन दर्शन वस्तुओं का विरोध नहीं करता, बल्कि उनके प्रति अनावश्यक आसक्ति छोड़ने की शिक्षा देता है। गृहस्थ व्यक्ति भी परिवार और समाज में रहते हुए आवश्यकता तथा संग्रह के बीच अंतर समझ सकता है और अपने जीवन में अपरिग्रह की भावना को अपना सकता है।

बाहरी शत्रु को जीतना आसान, भीतर के विकारों पर विजय कठिन

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने आत्मविजय के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी बाहरी शत्रु को पराजित करना आसान हो सकता है, लेकिन मनुष्य के भीतर मौजूद क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और द्वेष को जीतना अत्यंत कठिन है।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान की आराधना का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि अपने भीतर मौजूद विकारों को पहचानकर उन्हें धीरे-धीरे समाप्त करना होना चाहिए।

उन्होंने भगवान नेमिनाथ के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि परिस्थितियां कितनी भी आकर्षक क्यों न हों, आत्मकल्याण का मार्ग मनुष्य के लिए सर्वोपरि होना चाहिए।

हर दिन स्वयं से करें आत्मचिंतन

मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं से प्रतिदिन आत्मचिंतन करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को हर दिन स्वयं से पूछना चाहिए कि आज उसने अपने भीतर के किस विकार को कम किया।

किस व्यक्ति के प्रति द्वेष कम हुआ, किसके प्रति क्षमा का भाव विकसित हुआ और अपने जीवन में कितना संयम बढ़ाया—इन प्रश्नों पर नियमित रूप से विचार करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ऐसा आत्मचिंतन व्यक्ति को धीरे-धीरे आत्मविजय की ओर लेकर जाता है। जब व्यक्ति दूसरों को बदलने से पहले स्वयं के भीतर परिवर्तन करने का प्रयास करता है, तभी वास्तविक आध्यात्मिक विकास शुरू होता है।

भगवान के गुणों को जीवन में उतारना ही सच्ची आराधना

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मुनिश्री ने कहा कि किसी भी कल्याणक महोत्सव की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब भगवान के जीवन का कम से कम एक गुण हमारे जीवन का हिस्सा बने।

भगवान के जन्म कल्याणक के अवसर पर अपने भीतर सद्भाव का जन्म करना चाहिए। इसी तरह तप कल्याणक के अवसर पर अपनी बुरी आदतों और कषायों के त्याग का संकल्प लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक आयोजन में शामिल होना पर्याप्त नहीं है। भगवान द्वारा बताए गए मार्ग और गुणों को अपने व्यवहार में शामिल करना ही सच्ची आराधना है।

19 अगस्त को मनेगा भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक

विद्वत नवनीत जैन शास्त्री ने बताया कि बुधवार, 19 अगस्त को जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा।

यह धार्मिक आयोजन आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ससंघ के सान्निध्य और मुनिश्री उपशांत सागरजी महाराज के निर्देशन में आयोजित होगा।

महोत्सव के दौरान भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।

मंदिर परिसर में बनाई गई सम्मेद शिखरजी पर्वत की कृत्रिम रचना

मोक्ष कल्याणक महोत्सव को लेकर बड़ा जैन मंदिर में विशेष तैयारियां की गई हैं। मंदिर प्रांगण में श्री सम्मेद शिखरजी पर्वत की कृत्रिम रचना तैयार कर पहाड़ का स्वरूप बनाया गया है।

जैन धर्म में सम्मेद शिखरजी का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान पार्श्वनाथ सहित अनेक तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि होने के कारण श्रद्धालुओं के बीच इस पवित्र क्षेत्र के प्रति विशेष आस्था है।

मंदिर परिसर में बनाई गई इसकी प्रतिकृति महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं के आकर्षण और आस्था का प्रमुख केंद्र रहेगी।

सुबह 7 बजे से शुरू होंगे धार्मिक अनुष्ठान

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भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक महोत्सव की शुरुआत बुधवार सुबह 7 बजे धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होगी। सबसे पहले भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का जलाभिषेक किया जाएगा। इसके बाद वृहद शांतिधारा और विशेष पूजन होगा।

सुबह 8:15 बजे आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज और मुनिश्री के प्रवचन होंगे। धर्मसभा के माध्यम से श्रद्धालुओं को भगवान पार्श्वनाथ के जीवन, तप, त्याग और मोक्ष मार्ग से जुड़े संदेश दिए जाएंगे।

इसके बाद सुबह 9:30 बजे मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण कांड का वाचन किया जाएगा और भगवान पार्श्वनाथ स्वामी को निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा।

श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा महोत्सव

मोक्ष कल्याणक महोत्सव को लेकर जैन समाज में उत्साह का वातावरण है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के बड़ा जैन मंदिर पहुंचकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का अभिषेक, पूजन और निर्वाण लाडू समर्पित करने की संभावना है।

धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक और आध्यात्मिक परिवर्तन लाना होना चाहिए।

 

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