—Advertisement—

“विसंवाद से बचो, संवाद करो”: आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज

Author Picture
Published On: 14 August 2026
IKUKIUK

—Advertisement—

“विसंवाद से बचो, संवाद करो”: आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज

दिल्ली में धर्मसभा को किया संबोधित, बोले— सत्य के नाम पर लड़ो मत, सत्य को जानकर लड़ाई शांत करो; वाणी को वीणा बनाएं, शूल नहीं

रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू

दिल्ली। जीवन में सुख, शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को विवाद और विसंवाद से बचकर आपसी संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। संवाद में बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान करने की शक्ति होती है। मन न मिलने और मतभेद होने के बावजूद एक-दूसरे से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए। यह प्रेरक संदेश दिगंबर जैन श्रमण संस्कृति के अध्यात्मयोगी पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने दिल्ली स्थित ऋषभोदय, ऋषभ विहार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।

धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आचार्य श्री ने अपनी मंगल देशना में जीवन को यशस्वी, शांत और आनंदमय बनाने के अनेक सूत्र बताए। उन्होंने सत्य, संवाद, मधुर वाणी, श्वासों पर नियंत्रण और राग-द्वेष से मुक्त होने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति का आचरण और उसकी वाणी उसके जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं।

यशस्वी जीवन ही सुखद जीवन

आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति सुख, शांति और आनंद के साथ जीवन जीना चाहता है। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य ऐसे आचरण से बचे जो उसे अपयश की ओर ले जाए।

उन्होंने कहा कि जीवन में केवल भौतिक उपलब्धियां ही महत्वपूर्ण नहीं होतीं, बल्कि व्यक्ति का यश, चरित्र और व्यवहार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाज में सम्मानपूर्वक और सद्भाव के साथ जीवन जीना वास्तविक उपलब्धि है। मनुष्य को अपने आचरण पर निरंतर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अच्छे कर्म और श्रेष्ठ व्यवहार ही यशस्वी जीवन का आधार बनते हैं।

संवाद ही समस्या के समाधान की सबसे बड़ी शक्ति

आचार्य श्री ने पारिवारिक और सामाजिक जीवन में संवाद के महत्व पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में अशांति से बचना है तो किसी के साथ विसंवाद की स्थिति पैदा नहीं होने देना चाहिए।

उन्होंने समझाया कि मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद में बदलने से रोकना आवश्यक है। किसी विषय को लेकर विवाद हो जाए तब भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं होना चाहिए।

आचार्य श्री ने कहा, “विवादों का अंत करना है तो झगड़ा होने पर भी परस्पर बोलना बंद मत करो। मन न मिले, तब भी बात करते रहो।”

उन्होंने कहा कि भ्रम और शंका से विसंवाद की शुरुआत होती है। कई बार वास्तविकता जाने बिना व्यक्ति अपने मन में दूसरे के प्रति गलत धारणा बना लेता है और यही धारणा धीरे-धीरे संबंधों में दूरी पैदा कर देती है। इससे बचने के लिए सही सोच, सही दृष्टि और समीचीन चिंतन आवश्यक है। संवाद ऐसी शक्ति है, जो गलतफहमी को दूर कर संबंधों को फिर से मजबूत बना सकती है।

“सत्य के नाम पर लड़ो मत, सत्य जानकर लड़ाई शांत करो”

आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में सत्य के महत्व को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि सत्य धर्म है, सत्य ही जीवन का सार है और सत्य शांति का द्वार खोलता है। प्रत्येक व्यक्ति को सत्य को जानने, पहचानने, सीखने और अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “सत्य को स्वीकार करो, लेकिन सत्य के नाम पर संप्रदाय मत बनाओ। सत्य के नाम पर लड़ो मत, सत्य को जानकर लड़ाई शांत करो।”

आचार्य श्री ने कहा कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को कई बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन अंततः विजय सत्य की ही होती है। सत्य व्यक्ति को आंतरिक शांति देता है और जीवन को आनंद की दिशा में आगे बढ़ाता है।

“वाणी वीणा बने, शूल नहीं”

मंगल देशना के दौरान आचार्य श्री ने वाणी और शब्दों की शक्ति पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की वाणी मधुर, हितकारी, संशय दूर करने वाली और मिश्री की तरह मीठी होनी चाहिए। किसी से बात करते समय शब्दों का चयन सोच-समझकर और विनम्रता के साथ करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का एक अच्छा वाक्य शत्रु को भी मित्र बना सकता है, जबकि एक कटु वाक्य पुराने मित्र को शत्रु में बदल सकता है। इसलिए बोलने से पहले यह विचार करना आवश्यक है कि हमारे शब्दों का सामने वाले व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

आचार्य श्री ने कहा कि कटु शब्द कई बार शस्त्र से भी अधिक पीड़ा पहुंचाते हैं। शस्त्र से लगा घाव समय के साथ भर सकता है, लेकिन कठोर शब्दों से मन पर लगा घाव लंबे समय तक बना रह सकता है। व्यक्ति की वाणी से उसके संस्कार, परिवार और आंतरिक भावों की पहचान होती है। इसलिए मनुष्य की “वाणी वीणा बने, शूल नहीं।”

श्वासों से होता है आंतरिक भावों का बोध

आचार्य श्री ने शरीर और मन के बीच संबंध बताते हुए श्वासों के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की श्वासों से उसके आंतरिक भावों का अनुमान लगाया जा सकता है। क्रोध, काम और कषाय की अवस्था में श्वासों की गति तेज हो जाती है, जबकि शांत और योगमय अवस्था में श्वासों की गति मंद रहती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अपनी श्वासों को संभालना सीखें, क्योंकि श्वास जीवन का आधार है। जब व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण करना सीखता है तो उसकी अनावश्यक आकांक्षाएं और मानसिक अशांति भी धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं।

आचार्य श्री ने राग-द्वेष से मुक्त होने की प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना है तो व्यक्ति को संक्लेश और कषायों से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए।

शून्य के आध्यात्मिक महत्व को समझाया

धर्मसभा के अंत में आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने ‘शून्य’ के माध्यम से जीवन और अध्यात्म का गहरा संदेश दिया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक अंक के आगे शून्य जुड़ने से उसका मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। इसी प्रकार जीवन में अहंकार को शून्य करने का भी विशेष महत्व है।

उन्होंने कहा कि शून्य भाव की ओर बढ़ना व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करता है। जब मनुष्य राग, द्वेष, अहंकार और कषाय से स्वयं को दूर करने लगता है, तब उसकी आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ती है।

बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सुनी मंगल देशना

दिल्ली स्थित ऋषभोदय, ऋषभ विहार में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज की मंगल देशना और अमृत वचनों का लाभ लिया।

आचार्य श्री का संदेश मुख्य रूप से संवाद, सत्य, मधुर वाणी, संयम और आत्मचिंतन पर केंद्रित रहा। उन्होंने समाज को यह प्रेरणा दी कि विवादों को बढ़ाने के बजाय संवाद से उनका समाधान किया जाए, सत्य को संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय शांति का आधार बनाया जाए और ऐसी वाणी का प्रयोग किया जाए जो लोगों को जोड़ने का कार्य करे।

 

Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp