शब्दों से नहीं, भावों से पढ़ें शास्त्र, तभी खुलेगा आत्मकल्याण का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना के बड़ा मंदिर में धर्मसभा का आयोजन, आचार्यश्री ने शास्त्र अध्ययन और आत्मचिंतन का बताया महत्व
मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चतुर्मासरत दिगम्बराचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सुख-सुविधाओं और सांसारिक उपलब्धियों को प्राप्त करना नहीं है। जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य जन्म-मरण, जरा और संसार के बंधनों से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण के इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए केवल शास्त्रों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके भीतर छिपे मर्म और भाव को समझना तथा उसे जीवन में उतारना आवश्यक है।
शास्त्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि शास्त्र केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं। जिनवाणी के प्रत्येक शब्द में आत्मकल्याण का गहरा संदेश और मार्गदर्शन छिपा हुआ है। यदि व्यक्ति शास्त्रों का केवल पाठ करता रहे, लेकिन उनके भावार्थ को अपने व्यवहार और जीवन में स्थान नहीं देता, तो उसका ज्ञान वास्तविक परिवर्तन का माध्यम नहीं बन सकता।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय करें, उनके विषयों पर मनन करें और फिर उन शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करें। ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब वह व्यक्ति के विचार, व्यवहार और परिणामों में सकारात्मक परिवर्तन लेकर आए।
शिखर और छाया के उदाहरण से समझाया शास्त्रों का मर्म
आचार्यश्री ने शास्त्रों के गूढ़ अर्थ को समझाने के लिए मंदिर के शिखर और छाया का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मान लीजिए किसी मंदिर के शिखर में खजाना छिपा हुआ है और यह बताया जाए कि अमावस्या की रात 12 बजे शिखर की छाया जहां पड़ेगी, वहीं खजाना मिलेगा।
ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति केवल मंदिर के शिखर को देखकर खड़ा रहे तो उसे खजाना प्राप्त नहीं होगा। उसे शिखर की छाया को समझना होगा और जहां छाया पड़े, वहां पहुंचकर खजाने को प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना होगा।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों की स्थिति भी इसी प्रकार है। शास्त्र के शब्द शिखर के समान हैं, जबकि उनके भीतर छिपा तत्व और भावार्थ उस छाया के समान है, जिसके माध्यम से व्यक्ति वास्तविक सत्य तक पहुंच सकता है। केवल शब्दों को याद कर लेना आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

ज्ञान तभी सार्थक जब जीवन में आए बदलाव
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि शास्त्रों का अध्ययन तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के परिणामों और व्यवहार में दिखाई दे। यदि व्यक्ति शास्त्र पढ़ने के बाद भी पहले की तरह क्रोध करता है, मान-सम्मान के पीछे भागता है, माया और लोभ से घिरा रहता है तथा दूसरों के प्रति द्वेष रखता है, तो उसे अपने अध्ययन और उसके उद्देश्य पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिनवाणी का उद्देश्य केवल व्यक्ति को विद्वान बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य मनुष्य को वीतरागता की दिशा में आगे बढ़ाना है। शास्त्रों का अध्ययन व्यक्ति के भीतर आत्मचिंतन, संयम और सकारात्मक परिवर्तन पैदा करे, तभी उसका वास्तविक लाभ प्राप्त होता है।
भगवान के दर्शन के साथ उनके गुणों को समझना जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि मंदिर में भगवान की प्रतिमा के दर्शन करते समय केवल भगवान को देखना ही पर्याप्त नहीं है। श्रद्धालुओं को यह भी समझना चाहिए कि भगवान किस प्रकार परमात्मा बने। उन्होंने राग-द्वेष का त्याग किया, मोह पर विजय प्राप्त की, अहंकार को छोड़ा और आत्मस्वरूप में स्थित होकर वीतरागता प्राप्त की।
उन्होंने कहा कि यदि हम भगवान के दर्शन और पूजा करते हैं, तो उनके गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करना चाहिए। भगवान की उपासना तभी सार्थक होगी, जब उनके बताए मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ किया जाए।
परमात्मा बनने के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक : मुनिश्री उपशान्तसागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता मौजूद है। लेकिन अहंकार, राग, द्वेष, मोह और विभिन्न कषायों के कारण मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता।
उन्होंने कहा कि परमात्मा बनने की दिशा में सबसे पहला कदम अपने भीतर के अहंकार को पहचानना और उसका त्याग करना है। मनुष्य बार-बार यह सोचता है कि मैं बड़ा हूं, मैं विद्वान हूं, मेरे पास धन है, मेरी प्रतिष्ठा है, मेरा परिवार है। यही ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव आत्मा को संसार के बंधनों में बांधे रखता है।

‘मैं’ और ‘मेरा’ के भाव से मुक्त होने की जरूरत
मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार और स्वामित्व का भाव बना रहेगा, तब तक आत्मा का वास्तविक स्वरूप पूरी तरह प्रकट नहीं हो सकता। धर्म का पहला कार्य अपने भीतर झांकना और अपनी कमियों तथा दोषों को पहचानना है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि दूसरों की कमियां देखने से पहले व्यक्ति को अपने भीतर मौजूद दोषों को देखना चाहिए। अपने क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह और द्वेष को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास ही वास्तविक धार्मिक साधना है।
भगवान की उपासना का अर्थ गुणों को अपनाना
मुनिश्री ने कहा कि केवल मंदिर जाकर पूजा करने से उपासना पूर्ण नहीं हो जाती। भगवान की उपासना का वास्तविक अर्थ उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति भगवान की प्रतिमा के सामने सिर झुकाता है, लेकिन घर या समाज में अहंकार करता है, दूसरों का अपमान करता है, क्रोध करता है और द्वेष की भावना रखता है, तो उसकी उपासना अभी अधूरी है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि भगवान के सामने केवल पूजा और प्रार्थना करने के बजाय उनके गुणों को अपने व्यवहार में लाने का संकल्प लेना चाहिए। यही सच्ची उपासना है।
पढ़ें, मनन करें और जीवन में उतारें
मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि शास्त्रों का अध्ययन तीन चरणों में होना चाहिए। सबसे पहले शास्त्रों को पढ़ें, उसके बाद उनके संदेश पर मनन करें और अंत में उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारें।
उन्होंने कहा कि केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। पढ़े हुए विषय पर विचार करना और फिर उसके अनुसार आचरण करना आवश्यक है। जब ज्ञान व्यवहार में दिखाई देने लगे, तभी वह वास्तविक ज्ञान कहलाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से मंदिर आने, भगवान की पूजा करने और जिनवाणी का स्वाध्याय करने के साथ-साथ अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाने का आह्वान किया।

आत्मकल्याण के लिए आत्मचिंतन जरूरी
धर्मसभा में दोनों संतों के प्रवचनों के दौरान आत्मकल्याण, शास्त्रों के मर्म, अहंकार त्याग, संयम और वीतरागता जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया गया। श्रद्धालुओं को संदेश दिया गया कि धार्मिक जीवन केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका प्रभाव व्यक्ति के भीतर और उसके व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
आचार्यश्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने धर्म के वास्तविक उद्देश्य को समझाते हुए श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और आत्मसुधार की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रवचनों को ध्यानपूर्वक सुना और जीवन में धार्मिक शिक्षाओं को अपनाने का संकल्प लिया।
