गुरु के सामने स्वयं को ज्ञानी मानने की भूल पर राष्ट्र संत सुधा सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को महत्वपूर्ण संदेश दिया। जानिए ज्ञान, विनम्रता और गुरु भक्ति का महत्व।
गुरु के सामने ज्ञानी बनने की भूल: सुधा सागर जी महाराज ने बताए कल्याण के 3 सूत्र
इंदौर। गुरु के सामने ज्ञानी बनने की कोशिश मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। श्रमण संस्कृति के महाश्रमण राष्ट्र संत सुधा सागर जी महाराज ने बुधवार को सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में दलाल बाग स्थित विद्या सुधा सत्संग मंडप में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए अहंकार, ज्ञान और गुरु के प्रति समर्पण का महत्व समझाया।
गुरु के सामने ज्ञानी बनने की भूल क्यों भारी पड़ती है?
मुनिश्री ने कहा कि आज हर व्यक्ति, कोई माने या न माने, स्वयं को श्रेष्ठ, ज्ञानी और महान घोषित करना चाहता है। यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। वास्तविक ज्ञान के साथ हमेशा विनम्रता आती है। जो व्यक्ति स्वयं को ही सबसे अधिक ज्ञानी समझने लगे, उसके भीतर सीखने की क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि हीरा स्वयं अपने मुंह से यह नहीं कहता कि लाखों रुपये उसका मूल्य है। इसी प्रकार कस्तूरी को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि उसमें सुगंध है। यदि कोई हीरा स्वयं को असली बताने लगे या कस्तूरी स्वयं अपनी सुगंध का प्रचार करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसमें कुछ न कुछ बनावटीपन है।इसी तरह जो व्यक्ति स्वयं को ज्ञानी और अपने गुरु को अज्ञानी मानता है, वह कभी महान नहीं बन सकता और न ही उसका वास्तविक कल्याण हो सकता है।
ज्ञान चाहिए तो पहले स्वयं को खाली करो
धर्म सभा में सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि यदि वास्तव में ज्ञान प्राप्त करना है तो ज्ञानी पुरुष के सामने स्वयं को अज्ञानी मानकर जाना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि जब हम पहले से ही अपने ज्ञान का अहंकार लेकर किसी गुरु, संत या ज्ञानी के पास जाते हैं तो नई बात हमारे भीतर प्रवेश ही नहीं कर पाती।मुनिश्री ने कहा कि ज्ञानी पुरुषों के सामने, सत्संग पंडाल में और मंदिर में कोरी स्लेट बनकर जाना चाहिए। कोरी स्लेट पर ही कुछ नया लिखा जा सकता है। यदि स्लेट पहले से ही लिखी हुई हो तो उस पर नया ज्ञान आसानी से अंकित नहीं हो सकता।यही कारण है कि गुरु के सामने ज्ञानी बनने के बजाय विनम्र शिष्य बनकर जाना आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग है।
देव, शास्त्र और गुरु के प्रति समर्पण
सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु के लिए आपने जो कुछ किया है, उसका स्वयं प्रचार नहीं करना चाहिए। अपने किए हुए कार्य को गुरु के सामने बताने की आवश्यकता नहीं है। जो सेवा सच्चे भाव से की जाती है, उसका फल स्वयं मिलता है।उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धार्मिक कार्य प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के लिए किए जाने चाहिए। सेवा और भक्ति में यदि अहंकार आ गया तो उसका आध्यात्मिक महत्व कम हो जाता है।
इन तीन प्रवृत्तियों से बचने की जरूरत
मुनिश्री ने कहा कि तीन प्रकार की प्रवृत्तियां मनुष्य के कल्याण में बाधक बनती हैं—गुरु के सामने स्वयं को ज्ञानी मानना, शास्त्र स्वाध्याय के सामने स्वयं को विद्वान समझना और गुरु की बात को स्वीकार न करना।उन्होंने कहा कि जो न गुरु को मानता है और न गुरु की मानता है, वह अपने अहंकार के कारण सही मार्ग से दूर हो जाता है। मुनिश्री ने इन दुर्गुणों की तुलना रावण के स्वभाव से करते हुए कहा कि अहंकार और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति अंततः व्यक्ति के पतन का कारण बनती है।
सच्चे गुरु का शब्द मंत्र समान
सुधा सागर जी महाराज ने कहा कि सच्चे गुरु के मुख से निकला प्रत्येक शब्द शिष्य के लिए मंत्र के समान होता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि शिष्य के भीतर उसे ग्रहण करने की पात्रता हो।गुरु के प्रति श्रद्धा, शास्त्र के प्रति विश्वास और स्वयं के ज्ञान के प्रति विनम्रता ही मनुष्य को सही दिशा दे सकती है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा सीखने की भावना रखनी चाहिए और अपने अहंकार को ज्ञान के मार्ग में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
धर्म सभा में ये श्रेष्ठी रहे उपस्थित
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्म सभा में सामाजिक संसद युवा प्रकोष्ठ के अध्यक्ष राहुल सेठी, सामाजिक संसद के अध्यक्ष आनंद नवीन गोधा गोधा, समाजसेवी रानी अशोक डोसी, आकाश कोल, हर्ष जैन, दिगंबर जैन समाज छत्रपति नगर के अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, ट्रस्टी कमल जैन, विपुल बाझलं, मयंक जैन, प्रिंसिपल टोंग्या, मुक्ता जैन, सोनाली बगड़िया सहित अनेक श्रेष्ठी उपस्थित थे।धर्म सभा का संचालन आवाज के जादूगर अनुराग जैन ने किया।
रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू, इंदौर


