आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि आत्मिक सुख ही सर्वोच्च और शाश्वत सुख है। भोग में शांति नहीं, योग और भक्ति में वास्तविक आनंद है।
राजेश जैन दद्दू
आत्मिक सुख ही सर्वश्रेष्ठ सुख, भोग में नहीं योग में है शाश्वत आनंद : आचार्य विशुद्धसागर जी
दिल्ली/इंदौर। दिगंबर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक महाश्रमण पट्ट आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रह्मांड में सबसे श्रेष्ठ सुख यदि कोई है तो वह आत्मिक सुख है। आत्मिक सुख शाश्वत और निरंतर होता है तथा इसके लिए किसी बाहरी साधन या सामग्री की आवश्यकता नहीं होती।
आचार्य श्री ने कहा कि यदि भौतिक सामग्रियों में ही सुख होता तो संसार के सभी धनपति सुखी होते। भोगों में वास्तविक शांति नहीं है, बल्कि योग और साधना में शाश्वत आनंद है। साधनों से रहित साधना ही वास्तविक सुख का मार्ग है।
इन्द्रिय सुख क्षणिक और नश्वर
आचार्य विशुद्धसागर जी ने पांच इन्द्रियों—स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और कर्ण—के विषयों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य इन्हीं की लालसा में अनेक प्रकार के कष्ट सहन करता है। इन्द्रिय सुख क्षणिक, विनाशी और नश्वर हैं। यह वास्तविक सुख नहीं, बल्कि सुख का आभास मात्र है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य इन्द्रिय सुख के साधन जुटाने में अपना जीवन लगा देता है। भोग के दौरान मोह और पागलपन बढ़ता है, वियोग में पीड़ा होती है और भोग के बाद पश्चाताप का सामना करना पड़ता है। भोगों से कभी वास्तविक संतुष्टि नहीं मिलती, बल्कि इच्छाएं और अधिक बढ़ती जाती हैं।
भक्ति से मुक्ति का मार्ग
आचार्य श्री ने कहा कि भक्ति मुक्ति की दातार है। गुरु भक्ति और प्रभु भक्ति से जहां सांसारिक एवं स्वर्गिक सुख की प्राप्ति होती है, वहीं साधक को परंपरा से शाश्वत सुख-शांति स्वरूप निर्वाण सिद्धि की ओर बढ़ने का मार्ग भी मिलता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पुष्पों की सुगंध से भौंरे और मिश्री की सुगंध से चींटियां स्वतः आकर्षित होकर पहुंच जाती हैं, उसी प्रकार जहां सच्चे गुरुओं के दिव्य उपदेश होते हैं, वहां भक्त स्वयं पहुंचते हैं। जहां देवाधिदेव जिनेंद्र की भक्ति होती है, वहां स्वर्ग के देव भी उपस्थित होते हैं।
संतान को धन के साथ संस्कार भी दें
धर्मसभा में आचार्य श्री ने अभिभावकों को संतान के संस्कारों पर विशेष संदेश दिया। उन्होंने कहा कि माता-पिता को बच्चों के लिए केवल धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि सुसंस्कारों का उपहार भी छोड़ना चाहिए। अच्छे संस्कार ही संतान को श्रेष्ठ, योग्य, विनयी, विवेकी और यशस्वी बनाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि यदि देश और विश्व को विनाश से बचाना है तो आने वाली पीढ़ी को संस्कारों से भूषित करना होगा। धर्म, संप्रदाय और पंथ अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन नैतिक संस्कार सभी के लिए समान रूप से श्रेष्ठ होने चाहिए। उन्होंने कहा कि क्लेश से मुक्ति चाहिए तो मनुष्य को संक्लेशता से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए।
धर्मसभा के समापन पर “णमो लोए सव्व साहूणं, नमोस्तु शासन, जयवंत हो” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो गया।
राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आचार्य श्री के प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
