श्रीजी का अभिषेक: मुनि सुधासागर महाराज की 5 बड़ी सीख, भक्तों को दिया चमत्कार का संदेश
इंदौर। श्रीजी का अभिषेक केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और आत्मिक भावनाओं से जुड़ी परंपरा है। जगत पूज्य मुनि श्री सुधासागर महाराज ने सोमवार को दलाल बाग स्थित विद्या सुधा सत्संग मंडप में आयोजित धर्मसभा में मंदिरों में नियमित रूप से भक्तों की सहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू, इंदौर ने बताया कि मुनि श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि जिन मंदिरों में भक्तों के अभाव में भगवान की प्रतिमा का अभिषेक कर्मचारियों या नौकरों से कराया जाता है, वहां धार्मिक भावना और मंदिर की सक्रियता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से मंदिरों में स्वयं पहुंचकर पूजा-अर्चना और श्रीजी का अभिषेक करने का आह्वान किया।
नौकरों से नहीं, भक्तिभाव से करें श्रीजी का अभिषेक
मुनि श्री ने कहा कि कर्मचारियों से व्यापार से जुड़े दूसरे काम करवाए जा सकते हैं और वे कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन भगवान का अभिषेक उनसे नहीं करवाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी दिन भगवान का अभिषेक नहीं हो पाए तो भी यह बेहतर है, लेकिन केवल औपचारिकता के लिए नौकर से अभिषेक करवाना उचित नहीं है।मुनि श्री ने श्रीजी का अभिषेक विधि, शुद्धि और श्रद्धा के साथ करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ेगी तो धार्मिक वातावरण भी मजबूत होगा।
गंधोदक के महत्व का किया उल्लेख
प्रवचन के दौरान मुनि श्री सुधासागर महाराज ने गंधोदक के महत्व को भी समझाया। उन्होंने सती मैना सुंदरी और उनके पति श्रीपाल से जुड़ी धार्मिक कथा का उल्लेख करते हुए श्रद्धा के महत्व को बताया।उन्होंने कहा कि यदि मंदिर में विराजित भगवान की प्रतिमा में अतिशय देखना चाहते हो तो मंदिरों में भक्तों की संख्या बढ़ाओ, उनसे श्रीजी का अभिषेक कराओ और धार्मिक वातावरण को मजबूत बनाओ।यह बात धार्मिक आस्था और परंपरा के संदर्भ में मुनि श्री द्वारा कही गई। जैन परंपरा में अभिषेक एवं पूजा की विधियों का उल्लेख विभिन्न धार्मिक स्रोतों में मिलता है।
गुरु से ज्यादा ताकत चरणों की धूल में : मुनि श्री
जगत पूज्य मुनि श्री ने कहा कि गुरु से ज्यादा ताकत गुरु के चरणों की धूल में होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जैन धर्म में चरणों की पूजा के बजाय चरण चिन्हों की पूजा का विधान है।मुनि श्री ने कहा कि जो भक्त नहीं बन सकता, वह भगवान तो दूर मंदिर का बागवान भी नहीं बन पाएगा। इसलिए भगवान बनने की भावना रखने से पहले भक्त बनना आवश्यक है।
धन-दौलत नहीं, भक्ति देखते हैं भगवान
मुनि श्री सुधासागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु और भगवान पूज्य पुण्य पुरुष हैं। उन्हें धन-दौलत दिखाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे सारी संपत्ति का त्याग कर वीतरागी बने हैं।उन्होंने कहा कि भगवान भक्त की भावना और भक्ति देखते हैं, धन-दौलत नहीं। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं से उन्होंने धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करने का संदेश दिया।
युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की सीख
धर्मसभा में युवाओं को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा कि युवाओं को पिता की कमाई पर निर्भर रहकर जिंदगी नहीं जीना चाहिए। उन्होंने युवाओं से स्वयं की कमाई से जीवन जीना सीखने का आह्वान किया।उन्होंने कहा कि युवा मेहनत, आत्मविश्वास और स्वावलंबन के साथ आगे बढ़ें तथा अपने जीवन में धर्म और संस्कारों को भी स्थान दें।
धर्मसभा में समाजजन रहे उपस्थित
धर्मसभा में आकाश कोल, आनंद नवीन गोधा, हर्ष जैन, मुकेश पाटोदी, धर्मेन्द्र जैन, अनुराग जैन, श्रीमती मुक्ता जैन, अर्चना गोधा, सोनाली बागढीया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।मुनि श्री के संदेश में मंदिरों को केवल पूजा का स्थान न मानकर श्रद्धा, भक्ति और सामूहिक धार्मिक सहभागिता का केंद्र बनाने पर विशेष जोर दिया गया। मंदिरों में भक्तों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना ही इस प्रवचन का प्रमुख संदेश रहा।
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू, इंदौर
