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मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. की पुण्यतिथि पर 160 श्रद्धालुओं का सामूहिक एकासन, धर्मेन्द्रमुनिजी ने दिए संस्कार और कर्म के संदेश

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Published On: 7 August 2026
Jain devotees participate in a collective Ekasan and religious rituals during the Punyatithi of Malwa Kesari Pujya Gurudev Saubhagyamalji M.S. under the guidance of Dharmendra Muni in Thandla.
— Jain devotees participate in a collective Ekasan and religious rituals during the Punyatithi of Malwa Kesari Pujya Gurudev Saubhagyamalji M.S. under the guidance of Dharmendra Muni in Thandla.

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सौभाग्य का सौभाग्य हमेशा साथ चलता रहा : धर्मेन्द्रमुनि

भाग्य पर विश्वास जरूरी, पर गलत क्रियाओं से बनाए रखें दूरी : धर्मेन्द्रमुनिजी

मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. की पुण्यतिथि पर 160 आराधकों ने किया सामूहिक एकासन, तप-आराधना से गूंजा चतुर्विध संघ

संवाददाता : जीवनलाल जैन

थांदला। जैन धर्म की तप, त्याग और आत्मशुद्धि की महान परंपरा के अनुरूप थांदला में मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. की पुण्यतिथि श्रद्धा, भक्ति और तप-आराधना के साथ मनाई गई। तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी आदि ठाणा के पावन सानिध्य में आयोजित इस विशेष धार्मिक आयोजन में चतुर्विध संघ ने बड़ी संख्या में भाग लिया। पूरे दिन मंदिर और धर्मसभा परिसर में भक्ति, तप, साधना और धर्मचर्चा का वातावरण बना रहा।

इस अवसर पर सामूहिक एकासन, सामायिक, विभिन्न तपों की आराधना तथा गुणानुवाद सभा का आयोजन किया गया, जिसमें पूज्य संतों ने गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के जीवन, उनके संघर्ष, समाज सुधार के कार्यों तथा धर्म के मूल सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बच्चों, युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठ श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इसे एक प्रेरणादायी धार्मिक महोत्सव का स्वरूप प्रदान किया।

160 आराधकों ने किया सामूहिक एकासन, तप से गूंज उठा वातावरण

पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित सामूहिक एकासन तप में लगभग 160 आराधकों ने भाग लेकर आत्मसंयम और तपस्या का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। एकासन जैन धर्म की महत्वपूर्ण तप-साधनाओं में से एक माना जाता है, जिसमें दिनभर केवल एक बार भोजन ग्रहण कर शेष समय धर्म आराधना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन में व्यतीत किया जाता है।

इसके अलावा चतुर्विध संघ के अनेक श्रद्धालुओं ने विभिन्न प्रकार की कठिन तप-आराधनाएं भी कीं। कार्यक्रम में 88 वर्षीतप आराधक, 32 नन्दीचक्र आराधक, 4 श्रेणीतप आराधक तथा 15 से 20 अन्य तपस्वियों ने अपनी दीर्घकालीन साधनाओं के माध्यम से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से तीन-तीन सामायिक तथा सात सामायिक की विशेष आराधना भी संपन्न की। इन धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पूरे परिसर में नवकार मंत्र और धार्मिक स्तुतियों का मधुर वातावरण बना रहा।

जीवन में संघर्ष आए, लेकिन सौभाग्य ने कभी साथ नहीं छोड़ा : धर्मेन्द्रमुनिजी

गुणानुवाद सभा को संबोधित करते हुए तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।

उन्होंने कहा कि सरवानिया निवासी चौथमलजी फाफरिया के परिवार में जन्मे गुरुदेव सौभाग्यमलजी ने बाल्यकाल से ही असाधारण प्रतिभा, धार्मिक रुचि और वैराग्य का परिचय दिया। जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियां आईं, लेकिन उनका सौभाग्य सदैव उनके साथ चलता रहा। यही कारण है कि वे समाज और धर्म जगत में एक महान संत के रूप में स्थापित हुए।

धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि महान व्यक्तित्व परिस्थितियों के कारण नहीं बनते, बल्कि अपने पुरुषार्थ, तप और सद्कर्मों के कारण महान बनते हैं। गुरुदेव सौभाग्यमलजी इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

भाग्य पर विश्वास रखें, लेकिन गलत कर्मों से हमेशा बचें

अपने प्रवचन में धर्मेन्द्रमुनिजी ने भाग्य और कर्म के संबंध को अत्यंत सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने भाग्य पर विश्वास अवश्य रखना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह गलत कार्य करने लगे।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है। यदि व्यक्ति गलत मार्ग अपनाता है तो उसका परिणाम भी दुखद ही होता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई बार जेल से छूटने वाला व्यक्ति यह संकल्प करता है कि वह दोबारा अपराध नहीं करेगा, लेकिन मोह, लोभ और आसक्ति के कारण वह फिर उसी रास्ते पर लौट जाता है। इसलिए केवल संकल्प लेने से नहीं, बल्कि व्यवहार में परिवर्तन लाने से जीवन बदलता है।

उन्होंने कहा कि भाग्य तभी साथ देता है जब व्यक्ति अपने कर्मों को भी शुद्ध रखता है। अच्छे कर्म ही अच्छे भविष्य की नींव रखते हैं।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले संत थे सौभाग्यमलजी म.सा.

धर्मसभा में धर्मेन्द्रमुनिजी ने बताया कि मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. केवल धार्मिक संत ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक भी थे।

उन्होंने बाल्यकाल में ही दीक्षा ग्रहण कर अपना संपूर्ण जीवन धर्म और समाज सेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागरण चलाया।

गुरुदेव ने विशेष रूप से मृत्यु भोज, बाल विवाह, वृद्ध विवाह, जातिवाद तथा छुआछूत जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ प्रभावी अभियान चलाए। उनके प्रयासों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन आया और अनेक परिवारों ने इन कुरीतियों को त्यागकर धार्मिक एवं नैतिक जीवन को अपनाया।

धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि आज भी समाज को ऐसे संतों के आदर्शों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

मीठी वाणी से ही बनते हैं मजबूत रिश्ते

अपने सहज, सरल और व्यंग्यपूर्ण अंदाज में धर्मेन्द्रमुनिजी ने जीवन व्यवहार पर भी महत्वपूर्ण संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति प्रतिदिन तरह-तरह की मिठाइयां खाता है, लेकिन उसकी वाणी में मिठास दिखाई नहीं देती। जबकि मीठा बोलने में न कोई पैसा लगता है और न ही कोई विशेष प्रयास करना पड़ता है।

उन्होंने कहा कि कटु वचन रिश्तों को तोड़ देते हैं, जबकि मधुर वाणी परिवार, समाज और मित्रों के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करती है।

उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने व्यवहार में नम्रता, मधुरता और सद्भाव बनाए रखें, क्योंकि यही वास्तविक धर्म है।

भाग्य हो तो छत्रपति, नहीं तो पत्रपति बनने में देर नहीं लगती : सन्दीपमुनिजी

रोचक शैली में प्रवचन देते हुए पूज्य श्री सन्दीपमुनिजी ने कहा कि माता-पिता अपनी संतान को धन-दौलत, मकान और संपत्ति तो दे सकते हैं, लेकिन यदि बच्चों के पास अच्छे संस्कार और पुण्य नहीं हैं तो वह संपत्ति भी अधिक समय तक टिक नहीं सकती।

उन्होंने कहा कि बच्चों को यदि धर्म, संस्कार और नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाए तो वे जीवन में स्वयं सफलता के मार्ग बना लेते हैं।

उन्होंने कहा कि “भाग्य साथ हो तो व्यक्ति छत्रपति बन जाता है, अन्यथा पत्रपति बनने में भी देर नहीं लगती।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल भाग्य के भरोसे बैठना उचित नहीं है। धर्म क्षेत्र हो या सांसारिक जीवन, महान बनने के लिए पुण्य, पुरुषार्थ, तप और सद्कर्म सभी आवश्यक हैं।

50 से अधिक आराधकों ने कंठस्थ किया प्रतिक्रमण सूत्र

संघ प्रवक्ता पवन नाहर एवं सचिव हितेश शाह ने बताया कि पूज्य श्री धर्मदास युवा संगठन द्वारा युवाओं और बच्चों में धार्मिक अध्ययन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रतिक्रमण सूत्र को छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर सरल तरीके से कंठस्थ कराया जा रहा है।

इस अभियान को थांदला में अत्यंत अच्छा प्रतिसाद मिला है। अब तक 50 से अधिक बच्चों, युवाओं और वरिष्ठ आराधकों ने प्रतिक्रमण सूत्र पूर्ण रूप से कंठस्थ कर लिया है।

उन्होंने बताया कि 9 अगस्त को आयोजित धर्मसभा में तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी इन सभी आराधकों को सामूहिक रूप से वाचनी प्रदान करेंगे, जो उनके धार्मिक अध्ययन की महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

चातुर्मास के दौरान थांदला बना श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र

संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने बताया कि चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु थांदला पहुंच रहे हैं।

रतलाम, झाबुआ, पेटलावद, कल्याणपुरा, बामनिया, करवड़ सहित अनेक नगरों एवं गांवों से श्रद्धालु पूज्य संतों के दर्शन, वंदन एवं प्रवचन सुनने के लिए नियमित रूप से आ रहे हैं।

श्रीसंघ द्वारा बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए महावीर भवन में आवास, भोजन और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं भी की गई हैं, जिससे सभी श्रद्धालु बिना किसी असुविधा के धर्म आराधना का लाभ प्राप्त कर सकें।

धर्म, तप और संस्कार का मिला प्रेरक संदेश

पूरे आयोजन में धर्म, तप, संयम, संस्कार और समाज सुधार का संदेश प्रमुख रूप से सामने आया। पूज्य संतों ने अपने प्रवचनों के माध्यम से स्पष्ट किया कि जीवन में केवल भाग्य पर निर्भर रहने के बजाय सद्कर्म, मधुर व्यवहार, अच्छे संस्कार और आत्मसंयम को अपनाना आवश्यक है।

मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमलजी म.सा. की पुण्यतिथि पर आयोजित यह धार्मिक आयोजन श्रद्धालुओं के लिए केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि आत्मचिंतन, तपस्या और समाज सुधार की प्रेरणा देने वाला एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव बन गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता ने यह सिद्ध कर दिया कि आज भी समाज में धर्म, तप और संस्कारों के प्रति गहरी आस्था और समर्पण की भावना जीवंत है।

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