परमात्मा बनना है तो पहले परमात्मा को पहचानना होगा: आचार्य श्री उदारसागर महाराज
मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा— भगवान के गुणों को जीवन में उतारना ही सच्ची आराधना, 9 अगस्त को होगी मंगल कलश स्थापना
मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग के लिए विराजमान जैनाचार्य अभिनंदन सागरजी महाराज के परम प्रभावक आज्ञानुवर्ती शिष्य आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने अपने प्रेरणादायी प्रवचनों में धर्म, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जीवन के महत्व पर प्रकाश डाला।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन में उसी आदर्श का अनुसरण करना चाहिए, जिसे वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है। यदि किसी व्यक्ति का लक्ष्य परमात्मा पद की प्राप्ति है, तो केवल जिन प्रतिमाओं के दर्शन कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। परमात्मा के गुणों, उनके वीतराग स्वरूप, तप, त्याग, करुणा और समता को समझकर अपने जीवन में धारण करना ही सच्ची आराधना है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा बनने की यात्रा का पहला चरण परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है। जब तक व्यक्ति भगवान के गुणों और उनके आदर्शों को नहीं समझेगा, तब तक आत्मा के विकास और मुक्ति के मार्ग को सही रूप से नहीं जान पाएगा।
भगवान से मांगना नहीं, भगवान जैसा बनना ही सच्ची भक्ति
आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोग पूजा-पाठ तो करते हैं, लेकिन पूजा के वास्तविक उद्देश्य को समझने का प्रयास नहीं करते।
उन्होंने कहा कि भगवान से सांसारिक वस्तुओं की मांग करना भक्ति का अंतिम स्वरूप नहीं है। सच्ची भक्ति तो यह है कि व्यक्ति भगवान के गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प करे।
उन्होंने बताया कि जिनेंद्र भगवान किसी व्यक्ति के सुख-दुःख का निर्माण नहीं करते, बल्कि वे आत्मा को यह प्रेरणा देते हैं कि प्रत्येक जीव अपने पुरुषार्थ के माध्यम से अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत शक्ति को प्राप्त कर सकता है।

हाथी के प्रसंग से समझाया पहचान का महत्व
अपने प्रवचन को सरल और प्रभावशाली बनाने के लिए आचार्यश्री ने हाथी बेचने वाले व्यक्ति का प्रेरक प्रसंग सुनाया।
उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति अपना हाथी बेच रहा था। कई ग्राहक हाथी को देखने आए, लेकिन एक व्यक्ति बार-बार हाथी को ध्यान से देखता और फिर लौट जाता। हाथी बेचने वाले को लगा कि शायद यह व्यक्ति हाथी में कोई कमी खोज रहा है, जिससे उसका सौदा खराब हो जाएगा।
कई बार ऐसा होने के बाद हाथी बेचने वाले ने नाराज होकर पूछा कि वह बार-बार क्या देख रहा है। इस पर उस व्यक्ति ने शांत भाव से कहा कि वह केवल यह देख रहा है कि हाथी का मुख किस दिशा में है।
इस प्रसंग के माध्यम से आचार्यश्री ने समझाया कि जब एक सामान्य वस्तु को प्राप्त करने से पहले उसकी सही पहचान करना जरूरी माना जाता है, तो परमात्मा बनने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए परमात्मा के वास्तविक स्वरूप और उनके गुणों को पहचानना कितना आवश्यक होगा।
उन्होंने कहा कि सही पहचान के बिना सही मार्ग प्राप्त नहीं होता और बिना सही मार्ग के लक्ष्य तक पहुंचना संभव नहीं है।

मंदिर आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र हैं: मुनिश्री उपशांत सागर महाराज
इस अवसर पर मुनिश्री 108 उपशांत सागर महाराज ने भी अपने प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्राचीन समय में जिनालयों में अनेक दिव्य अनुभूतियां देखने को मिलती थीं।
उन्होंने कहा कि आज ऐसी अनुभूतियां कम दिखाई देती हैं, इसका कारण मंदिरों की शक्ति में कमी नहीं है, बल्कि मनुष्य की श्रद्धा, भक्ति और समर्पण भावना में कमी आना है।
मुनिश्री ने कहा कि जहां निष्कपट श्रद्धा, अटूट विश्वास और निर्मल भक्ति होती है, वहां आत्मा स्वयं दिव्यता का अनुभव करती है।
उन्होंने कहा कि मंदिर सदैव से आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र रहे हैं। लेकिन वर्तमान समय में मनुष्य की चंचलता, भौतिक आकर्षण और संदेह की भावना उसे उस दिव्य अनुभूति से दूर कर रही है।
यदि व्यक्ति अपने जीवन में फिर से श्रद्धा और समर्पण का भाव जागृत करे तो जिनालय केवल पूजा स्थल नहीं रहेंगे, बल्कि आत्मजागरण, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण के केंद्र बन जाएंगे।
उन्होंने कहा कि चमत्कार बाहर नहीं, बल्कि श्रद्धा से भरे हुए अंतर्मन में जन्म लेते हैं।

मंगल कलश स्थापना की पत्रिका का हुआ विमोचन
धर्मसभा के उपरांत मंगल पावन वर्षायोग–2026 की मांगलिक पत्रिका का विधिवत विमोचन किया गया।
पत्रिका का विमोचन जैन विद्वत् प्रतिष्ठाचार्य संजय शास्त्री, नवनीत शास्त्री, समिति अध्यक्ष अनिल जैन, बाबूलाल जैन, नेमीचंद जैन, प्रेमचंद जैन, पदमचंद जैन, दर्शनलाल जैन, अनिल बरैया एवं विजय जैन के करकमलों द्वारा संपन्न हुआ।
इस अवसर पर ब्रह्मचारी प्रदीप जैन ‘पीयूष’ (जबलपुर) की विशेष उपस्थिति रही।

9 अगस्त को होगी मंगल कलश स्थापना
कार्यक्रम के दौरान आगामी धार्मिक आयोजनों की जानकारी भी दी गई। बताया गया कि वर्षायोग के अंतर्गत 9 अगस्त को मंगल कलश स्थापना समारोह आयोजित किया जाएगा।
धर्मसभा का संचालन विद्वान नवनीत शास्त्री द्वारा किया गया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक अर्घ्य समर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के प्रवचनों को जीवन में धर्म और आत्मकल्याण का मार्गदर्शक बताया।
