आचार्य उदारसागर महाराज ने मुरैना की धर्मसभा में कहा कि धन नहीं, धर्म ही मनुष्य का वास्तविक धन है। जानिए उनके प्रेरणादायक प्रवचन की 7 महत्वपूर्ण सीख और मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के धर्म ध्यान पर विचार।
आचार्य उदारसागर महाराज: धन नहीं, धर्म ही जीवन का वास्तविक धन
रिपोर्टर : मनोज जैन नायक | मुरैना
आचार्य उदारसागर महाराज ने मुरैना स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज का मनुष्य धन कमाने की अंधी दौड़ में इतना व्यस्त हो गया है कि वह अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य अर्थात धर्म, आत्मकल्याण और नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन हो सकता है, लेकिन जीवन का उद्देश्य कभी नहीं बन सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि धन नश्वर है, जबकि धर्म ऐसा अमूल्य धन है जो वर्तमान जीवन के साथ-साथ अनंत जन्मों तक जीव का कल्याण करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में धर्म को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।
धन नहीं, धर्म ही सबसे बड़ी संपत्ति
अपने ओजस्वी प्रवचन में आचार्य उदारसागर महाराज ने कहा कि धन आज है तो कल नहीं भी हो सकता, लेकिन धर्म सदैव जीव के साथ रहता है। धर्म आत्मा को शुद्ध करता है, पापकर्मों का क्षय करता है और पुण्य का संचय कर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है बल्कि सत्य, संयम, करुणा, आत्मचिंतन, स्वाध्याय और सदाचार का पालन ही वास्तविक धर्म है।
धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा आवश्यक
आचार्यश्री ने कहा कि धर्म का पालन दिखावे, स्वार्थ या आडंबर के लिए नहीं होना चाहिए। धर्म तभी फलदायी होता है जब उसमें निष्कपट भावना, पूर्ण श्रद्धा और ईमानदारी हो।उन्होंने कहा कि यदि धर्म में छल, कपट, अहंकार और स्वार्थ प्रवेश कर जाए तो उसका वास्तविक स्वरूप समाप्त हो जाता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आत्मशुद्धि के भाव से धर्म का पालन करना चाहिए।
प्रतिदिन निकालें धर्म के लिए समय
धर्मसभा में आचार्य उदारसागर महाराज ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि प्रतिदिन कुछ समय धर्म, पूजा, स्वाध्याय, ध्यान, संयम और आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालें।उन्होंने कहा कि धन केवल भौतिक सुविधाएं दे सकता है, लेकिन धर्म ही आत्मिक शांति, सच्चा आनंद और स्थायी सुख प्रदान करता है।
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने बताया ध्यान का महत्व
धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशांत सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य का जीवन उसके चिंतन और ध्यान की दिशा से निर्मित होता है।उन्होंने जैन दर्शन में बताए गए चार प्रकार के ध्यान—
- आर्त ध्यान
- रौद्र ध्यान
- धर्म ध्यान
- शुक्ल ध्यान
—का विस्तार से वर्णन किया।मुनिश्री ने कहा कि धर्म ध्यान आत्मा की शुद्धि का सबसे श्रेष्ठ माध्यम है। आत्मचिंतन, जिनवाणी का अध्ययन, गुरु के प्रति श्रद्धा तथा शुभ भावों का निरंतर चिंतन ही धर्म ध्यान है।
धर्म ध्यान से मिलता है आत्मिक उत्थान
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि धर्म ध्यान के माध्यम से जीव अपने पापकर्मों का क्षय करता है और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करता है।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है जबकि वास्तविक आवश्यकता आत्मकल्याण और धर्म की है।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्म पालन का संकल्प
धर्मसभा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के प्रेरणादायी प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना।प्रवचन से प्रेरित होकर अनेक श्रद्धालुओं ने अपने दैनिक जीवन में धर्म, संयम, स्वाध्याय, आत्मचिंतन एवं ध्यान को अपनाने का संकल्प लिया।कार्यक्रम का शुभारंभ समाज के श्रावक श्रेष्ठियों एवं गणमान्य नागरिकों द्वारा मंगलाचरण, चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।
निष्कर्ष
आचार्य उदारसागर महाराज ने अपने प्रेरणादायी संदेश में स्पष्ट किया कि धन जीवन की आवश्यकता हो सकता है, लेकिन धर्म ही जीवन का वास्तविक आधार है। धर्म आत्मा का श्रृंगार, जीवन की दिशा और मोक्ष का द्वार है। यदि मनुष्य अपने जीवन में धर्म को सर्वोच्च स्थान दे, तो उसका वर्तमान और भविष्य दोनों मंगलमय बन सकते हैं।


