नन्दचक्र आराधना के दौरान थांदला में पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने कषाय, परिग्रह, त्याग और आत्मकल्याण पर प्रेरक प्रवचन दिए। पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने प्रत्याख्यान का महत्व बताया। 50 तपस्वियों ने नन्दचक्र आराधना का शुभारंभ किया।
नन्दचक्र आराधना: कषायों का संतुलन भी घातक, परिग्रह की मर्यादा से घटते हैं पाप – धर्मेन्द्रमुनि
नन्दचक्र आराधना का शुभारंभ
नन्दचक्र आराधना के पावन अवसर पर थांदला में धार्मिक वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया। स्थानीय महावीर भवन में पूज्य तत्त्वज्ञ श्री धर्मेन्द्रमुनिजी एवं रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी के सान्निध्य में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं तपस्वियों ने धर्म आराधना का लाभ लिया।इस अवसर पर 50 से अधिक तपस्वियों ने उपवास तप के साथ नन्दचक्र आराधना का शुभारंभ किया। प्रथम उपवास पूर्ण होने के बाद नवकारसी के समय सामूहिक पारणा सम्पन्न कराया गया।
धर्मेन्द्रमुनिजी का प्रेरणादायी संदेश
अपने प्रवचन में पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि संसार का प्रत्येक जीव सुख चाहता है, लेकिन वास्तविक सुख त्याग में है, भोग में नहीं।उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती राजा भी अंततः भोग-विलास छोड़कर आत्मकल्याण की राह अपनाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि वास्तविक आनंद त्याग और संयम में ही निहित है।उन्होंने कहा—
“जीव जब स्वयं को बड़ा समझने लगता है, तभी क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषाय उत्पन्न होने लगते हैं।”
कषायों का संतुलन भी घातक
धर्मेन्द्रमुनिजी ने अत्यंत सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार डॉक्टर वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाकर रोग दूर करता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में कषायों का संतुलन भी पर्याप्त नहीं है।उन्होंने कहा—“कषायों का संतुलन भी घातक है, क्योंकि वे संसार को बढ़ाते हैं। उनका पूर्ण समाप्त होना ही आत्मकल्याण का मार्ग है।”उन्होंने बताया कि क्रोध, चिड़चिड़ापन और इच्छाओं को महत्व देना आत्मा के लिए सबसे बड़ा नुकसान है।
परिग्रह की मर्यादा से कम होते हैं पाप
प्रवचन में धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि संसारी जीव अनेक प्रकार के पापों से घिरा रहता है।यदि व्यक्ति अपने परिग्रह की मर्यादा तय कर ले तो उसके जीवन में अनेक पाप स्वतः कम होने लगते हैं।उन्होंने साधुत्व की परिभाषा बताते हुए कहा—“समस्त पापों का त्याग ही वास्तविक साधुत्व है।”
संदीपमुनिजी ने बताया प्रत्याख्यान का महत्व
रोचक वक्ता पूज्य श्री संदीपमुनिजी ने प्रत्याख्यान (पच्चक्खाण) के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि जिस प्रकार राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री अथवा कोई जनप्रतिनिधि शपथ लेने के बाद ही वैधानिक रूप से पद ग्रहण करता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी त्याग तभी महान बनता है जब वह संकल्पपूर्वक स्वीकार किया जाए।उन्होंने कहा—“भोग का त्याग उत्तम है, लेकिन संकल्पपूर्वक लिया गया प्रत्याख्यान उसे महान फलदायी बना देता है।”उन्होंने लोगों से मोबाइल, चाय, तंबाकू एवं अन्य व्यसनों से दूर रहने का भी आह्वान किया।
नन्दचक्र आराधना की विधि
पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने नन्दचक्र आराधना की संपूर्ण विधि भी श्रद्धालुओं को समझाई।इस आराधना में—
- 1 उपवास
- पारणा
- 2 उपवास
- पारणा
- 4 उपवास
- पारणा
- 8 उपवास
- पारणा
- पुनः 4 उपवास
- पारणा
- 2 उपवास
- पारणा
- 1 उपवास
इस प्रकार कुल 29 दिनों की विशेष तप आराधना सम्पन्न होती है।साथ ही उन्होंने निर्देश दिए कि इस दौरान—
- 21 माला णमो अरिहंताणं
- 12 लोगस्स
- 12 णमोत्थुणं
- 12 वंदना
- सचित्त त्याग
- ब्रह्मचर्य पालन
- रात्रि चौविहार
का पालन किया जाए।
50 तपस्वियों ने किया प्रथम पारणा
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी देते हुए बताया कि गुरुदेव की प्रेरणा से लगभग 50 तपस्वियों ने 25 जुलाई से नन्दचक्र आराधना प्रारंभ की।आज स्थानीय महावीर भवन में नवकारसी के समय प्रथम सामूहिक पारणा सम्पन्न हुआ।
जन्मोत्सव पर मिला तपस्वियों को लाभ
समस्त वर्षीतप एवं नन्दचक्र आराधकों के सामूहिक पारणे का लाभ स्व. सुशीला देवी पटवा के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में अलका सुनील पटवा (उज्जैन) परिवार द्वारा लिया गया।इसी अवसर पर नीलेश माणकलाल पटवा ने तपस्वियों की प्रभावना कराई।वहीं नन्ही परी ईहा अनुलेश श्रीश्रीमाल के जन्मदिन पर अनुपमा मंगलेश श्रीश्रीमाल परिवार द्वारा प्रवचन प्रभावना का लाभ लिया गया।
आयोजन में इनका रहा विशेष सहयोग
पूरे आयोजन का संचालन एवं व्यवस्थापन—
- पूज्य तत्त्वज्ञ श्री धर्मेन्द्रमुनिजी
- पूज्य श्री संदीपमुनिजी
- संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया
- सचिव हितेश शाह
- प्रवक्ता पवन नाहर
- अलका सुनील पटवा (उज्जैन)
- नीलेश माणकलाल पटवा
- अनुपमा मंगलेश श्रीश्रीमाल
- समस्त श्रीसंघ
- सभी तपस्वी एवं श्रद्धालुओं
के सहयोग से सम्पन्न हुआ।
निष्कर्ष
थांदला में आयोजित नन्दचक्र आराधना केवल तप की साधना नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, त्याग और कषायों से मुक्ति का एक आध्यात्मिक अभियान बनकर सामने आई। धर्मेन्द्रमुनिजी एवं संदीपमुनिजी के प्रेरणादायक प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और संयमपूर्ण जीवन अपनाने की प्रेरणा दी।

