इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है? हैदराबाद चातुर्मास में आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी ने आचार्य विजयवल्लभसूरीश्वरजी की दूरदृष्टि को याद करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज निर्माण और भविष्य की दिशा पर प्रेरक संदेश दिया।
इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है?
रिपोर्ट: भरतकुमार सोलंकी
हैदराबाद। इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है—यह प्रश्न आज केवल एक विचार नहीं बल्कि समाज के भविष्य से जुड़ा गंभीर चिंतन बन गया है। हैदराबाद में आयोजित चातुर्मास प्रवेश समारोह के दौरान आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में पूज्य आचार्य विजयवल्लभसूरीश्वरजी महाराज की दूरदृष्टि का स्मरण करते हुए समाज के सामने कई महत्वपूर्ण प्रश्न रखे।
उन्होंने कहा कि आज गोडवाड़ क्षेत्र में जो सामाजिक जागृति, शिक्षा का विस्तार और विकास दिखाई देता है, उसके पीछे उन संतों का त्याग और दूरदर्शी नेतृत्व है जिन्होंने अपने समय में विरोध सहते हुए भी समाजहित में बड़े निर्णय लेने का साहस किया।
शिक्षा का विरोध, लेकिन समय ने बदल दी सोच
आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी ने बताया कि एक समय ऐसा था जब आधुनिक शिक्षा, विद्यालयों की स्थापना, छात्रावास निर्माण, अस्पतालों का विकास, मतदान के प्रति जागरूकता और समाजोपयोगी भवनों के निर्माण जैसे प्रयासों का भी विरोध हुआ था।
कुछ लोगों का मानना था कि आधुनिक शिक्षा धर्म से दूर ले जाएगी, लेकिन समय ने सिद्ध कर दिया कि शिक्षा ही समाज की सबसे बड़ी शक्ति बनी।
आज उसी शिक्षा के कारण समाज ने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी, उद्योगपति और अनेक सफल व्यक्तित्व देश को दिए हैं।
यदि उस समय विरोध सफल हो जाता…
उन्होंने चिंतन का विषय रखते हुए कहा कि यदि उस समय केवल विरोध ही होता रहता और दूरदर्शी संतों की बात स्वीकार नहीं की जाती, तो क्या आज समाज के पास इतने विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास और अस्पताल होते?
क्या समाज राष्ट्रीय जीवन में इतनी प्रभावी भूमिका निभा पाता?
क्या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी इतनी मजबूत होती?
इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं इतिहास देता है कि समाजहित में लिए गए निर्णय समय के साथ समाज की पहचान बन जाते हैं।
इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है
अपने संबोधन के दौरान आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी ने संकेत दिया कि वर्तमान समय भी वैसी ही परिस्थितियों से गुजर रहा है।
आज भी कई नए विचारों का विरोध हो रहा है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में वही विचार समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता सिद्ध होंगे?
यही कारण है कि आज समाज के सामने यह गंभीर प्रश्न खड़ा है—क्या इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है?
चातुर्मास को समाज निर्माण का केंद्र बनाने की जरूरत
आचार्यश्री ने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक प्रवचनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
इसे शिक्षा, स्वास्थ्य, छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, अनुसंधान, कौशल विकास, युवा मार्गदर्शन और समाज निर्माण की ठोस योजनाओं का केंद्र बनाया जाना चाहिए।
यदि धार्मिक आयोजनों के साथ सामाजिक विकास की योजनाएं भी जुड़ें, तो आने वाली पीढ़ियों को उसका दीर्घकालीन लाभ मिलेगा।
भविष्य हमें किस रूप में याद करेगा?
उन्होंने समाज से आत्ममंथन का आग्रह करते हुए कहा कि आज जो निर्णय लिए जाएंगे, वही आने वाले पचास वर्षों के समाज का स्वरूप तय करेंगे।
जिस प्रकार आज पूरा समाज आचार्य विजयवल्लभसूरीश्वरजी को उनकी दूरदृष्टि के लिए श्रद्धा से स्मरण करता है, क्या भविष्य की पीढ़ियां भी वर्तमान समाज को उसी सम्मान से याद करेंगी?
यह प्रश्न केवल वर्तमान के लिए नहीं बल्कि आने वाले समय के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समाज के लिए प्रेरणा
आचार्य विमलसागरसूरीश्वरजी का संदेश केवल अतीत का स्मरण नहीं बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा है।
इतिहास गवाह है कि समाजहित में उठाए गए दूरदर्शी कदम प्रारंभ में विरोध झेलते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ वही समाज की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज सेवा को एक-दूसरे का पूरक मानते हुए नई पीढ़ी के लिए सशक्त भविष्य का निर्माण किया जाए।
इसी सोच के साथ चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ सामाजिक जागरण, शिक्षा विस्तार और जनकल्याण की नई क्रांति का माध्यम बनाया जा सकता है। यही संदेश हैदराबाद से पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनकर सामने आया है।
