बछोड़िया में राजस्व विभाग की बड़ी लापरवाही: ‘2-3 दिन काम रोको, फिर चालू’ के खेल में खड़ा हो गया पक्का मकान!
तहसील में केस चलने का दावा, पर धरातल पर केवल राजस्व अमले का ‘फोन लगाओ-चौकीदार भेजो’ का छलावा
कोई सुनने को तैयार नहीं: पटवारी के मौखिक आदेश पर दो दिन रुकता है काम, फिर शुरू हो जाता है अवैध निर्माण
शासकीय भूमि पर कब्जा होने से रास्तों और नालियों के पास कचरा फेंकने की मजबूरी, मूकदर्शक बना राजस्व प्रशासन
संवाददाता : अर्जुन कुमावत
बछोड़िया (पिपलोदा):ग्राम बछोड़िया में शासकीय भूमि की सुरक्षा और राजस्व प्रशासन की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। तहसील में केस चलने और राजस्व फाइलों में प्रक्रिया जारी होने की बात कही जा रही है, लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि कागजी प्रक्रिया की आड़ में शासकीय भूमि पर पक्का मकान बनकर पूरी तरह तैयार हो गया।
‘2-3 दिन काम रोको, फिर चालू कर लो’ – ऐसा चला राजस्व अमले का खेल
ग्रामीणों का आरोप है कि इस मामले में बार-बार शिकायत के बावजूद राजस्व विभाग का कोई भी जिम्मेदार कर्मचारी ठोस कार्रवाई करने को तैयार नहीं है। लगातार यही ढर्रा दोहराया जा रहा है:
1.फोन पर शिकायत: ग्रामीण जब भी शासकीय भूमि पर हो रहे अवैध निर्माण की सूचना पटवारी को फोन पर देते हैं, तो पटवारी स्वयं मौके पर जाने के बजाय केवल चौकीदार (कोटवार) को भिजवा देते हैं।
2. 2-3 दिन का दिखावा:चौकीदार के मौखिक संदेश देने पर निर्माणकर्ता 2 से 3 दिन के लिए काम बंद कर देता है।
3. फिर निर्माण शुरू:मामला शांत होते ही निर्माणकर्ता पुनः निर्माण कार्य चालू कर देता है।
4. वही कहानी दोबारा: ग्रामीण फिर परेशान होकर पटवारी को फोन करते हैं, फिर चौकीदार आता है, 2-3 दिन काम रुकता है और फिर चालू हो जाता है।
‘दो-तीन दिन काम बंद और फिर चालू’ के इसी खेल का फायदा उठाकर अवैध निर्माणकर्ता ने देखते ही देखते पूरी पक्की इमारत तैयार कर ली।

कागजी केस और ज़मीनी ढिलाई
हैरानी की बात यह है कि लगातार मामला संज्ञान में होने और तहसील में प्रक्रिया चलने के बावजूद राजस्व अमले ने मौके पर पहुंचकर न तो निर्माण सामग्री जब्त की और न ही पुलिस बल की मदद से काम को स्थाई रूप से रुकवाया। केवल चौकीदार से मौखिक संदेश भिजवाकर औपचारिकता निभाई जाती रही, जिसकी आड़ में शासकीय भूमि पर कब्जा पक्का हो गया।
रास्तों और नालियों के पास कचरा फेंकने की मजबूरी
जिस शासकीय भूमि पर यह पक्का निर्माण हुआ है, वहां पूर्व में ग्रामीण कचरा डालते थे। अब वह जगह बंद हो जाने के कारण ग्रामीणों को विवश होकर आम रास्तों और नालियों के पास कचरा फेंकना पड़ रहा है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराना और गांव की व्यवस्था दुरुस्त रखना पूर्णतः राजस्व व स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन उनकी इस अनदेखी का खामियाजा पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है।
> **सीधा सवाल:** जब मामला तहसील में चल रहा है और बार-बार शिकायतें की जा रही हैं, तो राजस्व अमले ने मौके पर पहुंचकर जब्ती या कड़ाई से काम रुकवाने की ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या राजस्व विभाग की यह ढिलाई अवैध निर्माण को मौन सहमति दे रही है?
ग्रामीणों ने उठाए प्रशासन से सवाल
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि शासकीय भूमि पर अवैध निर्माण हुआ है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का सीधा सवाल है कि जब विभाग को लगातार जानकारी दी जा रही थी और मामला तहसील में लंबित था, तो निर्माण को रोकने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए?
अब देखना होगा कि राजस्व विभाग इस मामले में आगे क्या कार्रवाई करता है और क्या शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया जाता है या नहीं।
