चातुर्मास में पहली बार ‘अणु संदेश’ पर तत्वज्ञश्री देंगे विशेष व्याख्यान, जैन संघ में आध्यात्मिक उत्साह
Thandla । चातुर्मास काल के पावन अवसर पर थांदला जैन संघ में इस वर्ष आध्यात्मिक गतिविधियों का विशेष आयोजन किया जा रहा है। जिन शासन गौरव जैनाचार्य पूज्य गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म.सा. के संक्षिप्त लेकिन गहन आध्यात्मिक संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से संघ हित चिंतक पूज्य तत्वज्ञ श्री धर्मेन्द्रमुनिजी म.सा. द्वारा पहली बार ‘अणु संदेश’ पर विशेष व्याख्यान दिए जाएंगे।
पूज्य तत्वज्ञ श्री ने बताया कि आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के संदेश छोटे शब्दों में गहरे आध्यात्मिक अर्थों को समाहित किए हुए हैं। इन संदेशों में जीवन, धर्म, आत्मचिंतन और मोक्ष मार्ग से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांतों का सार छिपा है। वर्षावास के दौरान विभिन्न विषयों पर लिखे गए अणु संदेशों का विस्तृत विवेचन श्रद्धालुओं को सुनने का अवसर मिलेगा।
‘अणु संदेश’ में छिपा है आध्यात्मिक ज्ञान का सार
पूज्य तत्वज्ञ श्री धर्मेन्द्रमुनिजी ने कहा कि ‘अणु संदेश’ शब्द के दो अर्थ समझे जा सकते हैं। पहला अर्थ है छोटा अथवा लघु संदेश, जबकि दूसरा अर्थ स्वयं गुरुदेव द्वारा दिए गए उपनाम ‘अणु’ से जुड़ा हुआ है। गुरुदेव ने अपने जन्मदिन के अवसर पर जो पहला अणु संदेश प्रदान किया था, उसमें जीवन के गहरे आध्यात्मिक रहस्य समाहित थे।
उन्होंने कहा कि पहली दृष्टि में उस संदेश में नत्व की बात दिखाई नहीं देती, लेकिन गहराई से चिंतन करने पर उसमें अनेक आध्यात्मिक तत्वों का समावेश दिखाई देता है। संसार में ज्ञान और अज्ञान से जुड़ी सभी बातें किसी न किसी तत्व से संबंधित हैं और जीवन का वास्तविक उद्देश्य उन तत्वों को समझना है।
जन्म और मरण के रहस्य पर दिया संदेश
पूज्य तत्वज्ञ श्री ने बताया कि गुरुदेव ने अपने संदेश में जन्म को भव में प्रवेश का द्वार और मरण को निर्गमन का द्वार बताया है। उन्होंने कहा कि जो जन्म लेता है, उसके लिए मृत्यु निश्चित है। इसलिए जन्म-मरण के इस चक्र से मुक्ति पाने के लिए आयुष्य कर्म के बंधन को रोकना आवश्यक है, जो केवल अप्रमत्त धर्म आराधना से संभव हो सकता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य और देव भव पुण्य कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होते हैं। पुण्य का बंध धर्म और शुभ क्रियाओं से होता है, लेकिन धर्म साधना केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति के उद्देश्य से नहीं करनी चाहिए। निरंतर धर्म आराधना से प्राप्त पुण्य ही भव बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
इस अवसर पर उन्होंने रोहिणेय चोर के उदाहरण को सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि भगवान की वाणी यदि मन से न भी सुनी जाए, तब भी उसमें इतनी शक्ति होती है कि वह जीव के जीवन में परिवर्तन ला सकती है। वहीं सुदत्त चारित्र के माध्यम से उपशांत भाव की महत्ता भी बताई।
पच्चखक्खाण से जीवन में आती है सकारात्मकता: संत श्री सन्दीपमुनिजी
धर्मसभा में रोचक वक्ता पूज्य श्री सन्दीपमुनिजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि पच्चखक्खाण करने से जीव की अनेक शारीरिक और मानसिक समस्याओं का समाधान स्वतः होने लगता है।
उन्होंने कहा कि कई बार जीव पच्चखक्खाण करने से डरता है कि कहीं नियम टूट न जाए, लेकिन इतिहास में गजसुकुमाल मुनि और धरमरुचि अणगार जैसे महापुरुषों ने दृढ़ संकल्प के साथ नियमों का पालन किया और शाश्वत सुख की प्राप्ति की।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि यदि कोई नियम लिया जाए तो उसे पूरी निष्ठा और दृढ़ता से निभाने का प्रयास करना चाहिए। यदि किसी कारणवश नियम में बाधा आ जाए तो प्रायश्चित द्वारा स्वयं को शुद्ध कर पुनः संकल्प के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने युवाओं को सात कुव्यसनों से दूर रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि बचपन में दिए गए संस्कारों को जीवनभर बनाए रखना आवश्यक है। समय-समय पर बच्चों और युवाओं को धर्म नियमों की याद दिलाकर उन्हें अच्छे मार्ग पर बनाए रखना समाज की जिम्मेदारी है।
25 जुलाई से शुरू होगी नन्दचक्र तप आराधना
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया एवं सचिव हितेश शाह ने जानकारी देते हुए बताया कि स्थानीय गुरुभगवंतों का वर्षावास थांदला में होने से पूरे संघ में उत्साह का वातावरण है। युवा वर्ग सुबह की प्रार्थना से लेकर रात्रि तक होने वाली तत्व चर्चा में उत्साहपूर्वक भाग ले रहा है।
उन्होंने बताया कि सामूहिक तप आराधना के अंतर्गत आगामी 25 जुलाई से नन्दचक्र तपस्या प्रारंभ होगी। इसके लिए नवयुवक मंडल एवं संघ के पदाधिकारी घर-घर जाकर श्रद्धालुओं को तप आराधना के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने बताया कि अभी तक करीब 40 श्रद्धालुओं ने तपस्या के लिए अपने नाम दर्ज करवाए हैं। नाम लिखने की प्रक्रिया अभी भी जारी है और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के इसमें जुड़ने की संभावना है।
चातुर्मास के दौरान होने वाले धार्मिक आयोजन, प्रवचन, तपस्या और आध्यात्मिक गतिविधियां थांदला जैन संघ में धर्म आराधना और आत्मचिंतन का वातावरण निर्मित कर रही हैं। श्रद्धालु बड़ी संख्या में इन आयोजनों में सहभागी बनकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
