उठावनी : श्रद्धांजलि के बहाने रिश्तों की वास्तविकता का आईना – अनुज जैन “क्रांति”
मुरैना/आगरा (मनोज जैन नायक)।
किसी अपने की विदाई जीवन की नश्वरता का एहसास कराने के साथ-साथ रिश्तों की गहराई को भी समझने का अवसर देती है। सुख के अवसरों पर जहां रिश्तों की भीड़ दिखाई देती है, वहीं कठिन समय में मिलने वाली संवेदनाएं और साथ रिश्तों की वास्तविक पहचान कराते हैं। आगरा निवासी जैसवाल जैन समाज के युवा चिंतक Anuj Jain “क्रांति” ने उठावनी जैसे संवेदनशील विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए रिश्तों के मानवीय पक्ष को सामने रखा है।
अनुज जैन “क्रांति” का कहना है कि उठावनी में रखी गई दिवंगत व्यक्ति की तस्वीर केवल उस व्यक्ति की स्मृति नहीं होती, बल्कि वह जीवित रिश्तों का भी एक आईना बन जाती है। उस तस्वीर के सामने खड़े होकर मन में यह विचार आता है कि जीवन के सुख-दुख में कौन वास्तव में हमारे साथ खड़ा रहा और किसने केवल औपचारिकता निभाई।
दुख के समय सामने आती है रिश्तों की असली पहचान
अनुज जैन कहते हैं कि खुशियों के अवसरों पर लोगों की कमी नहीं होती। विवाह समारोह, जन्मदिन, सामाजिक आयोजन और अन्य उत्सवों में रिश्तों का बड़ा संसार दिखाई देता है। हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, लेकिन जीवन की कठिन घड़ी रिश्तों की वास्तविकता को उजागर करती है।
जब किसी परिवार पर दुख आता है और कोई अपना संसार से विदा हो जाता है, तब हर छोटी संवेदना भी बहुत मायने रखती है। कोई व्यक्ति अपना जरूरी काम छोड़कर परिवार के साथ खड़ा होता है, कोई दूर से आकर सांत्वना देता है और कोई बिना अधिक शब्दों के केवल अपनी मौजूदगी से दुखी परिवार को सहारा देता है।
ऐसे समय में मौन संवेदना भी कई बार बड़े-बड़े शब्दों से अधिक प्रभाव छोड़ती है।
उपस्थिति और अनुपस्थिति दोनों देती हैं संदेश
उठावनी के दौरान अक्सर लोगों की नजरें कुछ परिचित चेहरों को तलाशती हैं। वे लोग, जिन्हें वर्षों से अपना माना गया, जिनके साथ सुख-दुख साझा किए गए। जब ऐसे लोगों में से कोई दिखाई नहीं देता तो उसकी अनुपस्थिति भी महसूस होती है।
हालांकि अनुज जैन का मानना है कि केवल किसी व्यक्ति के आने या न आने के आधार पर रिश्तों का पूरा मूल्यांकन करना उचित नहीं है। हर व्यक्ति की अपनी परिस्थितियां, जिम्मेदारियां और मजबूरियां हो सकती हैं। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर रिश्तों का अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता।
रिश्तों की वास्तविक मजबूती इस बात से समझी जाती है कि कौन व्यक्ति हमारे दुख को महसूस करता है और कठिन समय में किस प्रकार हमारा साथ निभाता है।

अपेक्षाओं से अलग मिलती है रिश्तों की पहचान
अनुज जैन “क्रांति” कहते हैं कि जीवन में कई बार ऐसा होता है कि जिन लोगों से हमें सबसे अधिक उम्मीद होती है, वे किसी कारणवश साथ नहीं आ पाते। वहीं दूसरी ओर, जिनसे विशेष अपेक्षा नहीं होती, वही लोग संकट की घड़ी में सबसे पहले साथ खड़े दिखाई देते हैं।
ऐसे अनुभव व्यक्ति को रिश्तों की वास्तविकता समझने का अवसर देते हैं। यह सिखाते हैं कि रिश्तों का मूल्य केवल परिचय, निकटता या सामाजिक संबंधों से नहीं, बल्कि संवेदनाओं और सहयोग से तय होता है।
उठावनी के बाद भी जरूरी है संवेदना
अनुज जैन का कहना है कि उठावनी केवल एक दिन की परंपरा नहीं है। असली संवेदना तो उसके बाद भी दिखाई देती है। जब भीड़ समाप्त हो जाती है, लोग अपने-अपने जीवन में लौट जाते हैं, तब जिस परिवार ने अपना सदस्य खोया है, उसके जीवन में खालीपन बना रहता है।
ऐसे समय में कुछ दिनों बाद किया गया एक फोन, हालचाल पूछने वाला संदेश या आत्मीय मुलाकात भी परिवार के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकती है।
उन्होंने कहा कि दुख के समय साथ देना केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मानवीय कर्तव्य भी है।
आत्ममंथन का अवसर है उठावनी
अनुज जैन “क्रांति” ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया कि जब किसी अन्य परिवार के जीवन में दुख आया था, तब हम कहां थे? क्या हमने कभी यह सोचकर किसी के घर जाना टाल दिया कि हमारी अनुपस्थिति से क्या फर्क पड़ेगा?
उन्होंने कहा कि संभव है जिस अनुपस्थिति से आज हमें दुख पहुंच रहा है, कभी हमारी अनुपस्थिति ने भी किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा ही महसूस कराया हो।
इसलिए उठावनी केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को समझने और रिश्तों के प्रति अधिक संवेदनशील बनने का अवसर है।
संवेदनशील समाज की ओर एक कदम
अनुज जैन के अनुसार जीवन में रिश्तों का महत्व तभी समझ आता है जब हम एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं। खुशियों में साथ देना आसान है, लेकिन दुख की घड़ी में साथ खड़ा होना रिश्तों की वास्तविक पहचान है।
उठावनी हमें यही संदेश देती है कि इंसान की पहचान केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कठिन समय में निभाए गए साथ से होती है।
क्योंकि सुख के अवसरों पर हमारी अनुपस्थिति शायद भुला दी जाती है, लेकिन दुख के समय हमारी मौजूदगी हमेशा याद रहती है और हमारी अनुपस्थिति भी अपना प्रभाव छोड़ जाती है।
