पहले छपकर बिकने वाला अखबार अब बिककर छपने लगा है
वो कलम भी जरूर शर्मिंदा हुई होगी जिससे पवन माकन ने अपने धर्म और ईमान का सौदा कर सच के खिलाफ लिखने लगा : हार्दिक हुंडिया
कई सालों से पत्रकारिता और समाज हित में काम करने वाले हार्दिक हुंडिया ने किया सत्य की अवाज बुलंद, अधर्मियों के हाथों कितने में बिका है महानगर मेट्रो का पत्रकार पवन माकन इसकी जाँच किया जाय
हार्दिक हुंडिया ने महानगर मेट्रो के संपादक पवन माकन को अधिवक्ता दर्शन पंकज बाफना के मार्फत भेजा कानूनी नोटिस
मुंबई। कुसाधु को साथ सहकर देने वाला गुजरात का एक मात्र पत्रकार महानगर मेट्रो के संपादक पवन माकन को हार्दिक हुंडिया ने करारा जवाब दिया है। पत्रकार कभी नहीं बिकता, लेकिन ग़लत ख़बर प्रकाशित करने की क्या क़ीमत मिली ? पवन की पत्रकारिता पर दया आती है ? ऐसे लोगों के कारण हालांकि निष्पक्ष पत्रकारिता कभी बदनाम नहीं होती है लेकिन ऐसे बदनाम पत्रकार समाज के सामने जरूर खुल्ले पड़ जाते है !
सत्य को बदनाम नहीं किया जा सकता, झूठे प्रचार से केवल भ्रम फैलाया जा सकता है: हार्दिक हुंडिया
साधु के वेश में कुसाधु बने सागर चन्द्र सागर और उसके जैसे कई अधर्मियों और उनके कुकर्म के बारे में प्रमाण के साथ हमारे द्वारा समाचार प्रकाशित किया गया यह बात इन अधर्मियों को पची नहीं तो वे हमारे खिलाफ झूठी खबर फैलाने का षड़यंत्र रचने लगे। लेकिन कोइ सच्चा पत्रकार इसके लिये तैयार नहीं हुआ क्यों सभी सच्चे और निष्पक्ष पत्रकार को सच्चाई अच्छी तरह से मालूम है। लेकिन महानगर मेट्रो का पवन माकन ने अपना धर्म और ईमान दोनों का सौदा कर डाला। पवन माकन द्वारा प्रकाशित समाचारों में हमारे विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इन समाचारों में प्रस्तुत दावों की सत्यता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने का अधिकार केवल न्यायपालिका और विधिसम्मत जांच एजेंसियों को है, न कि इस तरह भ्रामक खबर फैलाने वाले पवन माकन को। हमने जो भी खबर लिखा वो पूरे प्रमाण और शत प्रतिशत साक्ष्यों से अपनी बात रखी लेकिन पवन माकन ने जो लिखा इसको उसके पास न तो कई ठोस प्रमाण है और ना ही इसमें कोई सच्चाई है इसलिये हमने उसे नोटिस भेंजकर कानूनी कार्यवाई की पहल की है।
यदि किसी के पास हमारे विरुद्ध कोई ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें संबंधित जांच एजेंसियों और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। तथ्यों और साक्ष्यों के अभाव में केवल सनसनीखेज शीर्षकों के माध्यम से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना न तो पत्रकारिता की नैतिकता के अनुरूप है और न ही संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा के अधिकार के अनुरूप।
हम वर्षों से समाजहित, जनजागरण और सत्य के पक्ष में अपनी बात रखते आए हैं। स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति या संस्था जनहित के मुद्दे उठाती है, तो उसके विरोध में भी विभिन्न प्रकार के प्रयास हो सकते हैं। किंतु हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि सत्य का मार्ग कभी भी दुष्प्रचार से विचलित नहीं होता।
हम सभी नागरिकों से आग्रह करते हैं कि किसी भी समाचार पर तत्काल विश्वास करने के बजाय उसके स्रोत, प्रमाण और आधिकारिक तथ्यों की जांच अवश्य करें। सोशल मीडिया या किसी भी मंच पर प्रसारित प्रत्येक सूचना सत्य नहीं होती। इसलिए विवेकपूर्ण निर्णय लेना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
यदि प्रकाशित समाचारों में असत्य, भ्रामक या मानहानिकारक सामग्री पाई जाती है, तो हम भारतीय कानून के अंतर्गत उपलब्ध सभी वैधानिक अधिकारों का उपयोग करेंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन यह स्वतंत्रता किसी की प्रतिष्ठा को बिना प्रमाण क्षति पहुँचाने का अधिकार नहीं देती।
हमारा विश्वास संविधान, न्यायपालिका और निष्पक्ष जांच व्यवस्था में है। हमें पूर्ण विश्वास है कि सत्य अंततः सामने आएगा और तथ्य स्वयं अपना प्रमाण बनेंगे।
हम अपने शुभचिंतकों, सहयोगियों और समाज के जागरूक नागरिकों से अपील करते हैं कि वे अफवाहों से प्रभावित न हों, संयम बनाए रखें और केवल सत्यापित एवं आधिकारिक तथ्यों पर ही विश्वास करें।
“झूठ कुछ समय तक चर्चा का विषय बन सकता है, लेकिन सत्य इतिहास का आधार बनता है।
