जीवदया का संदेश देते हुए हार्दिक हुंडिया ने भगवान नेमिनाथ और राजुल की प्रेरणा से जैन समाज से अपील की कि जहां अबोल जीवों की हत्या होती हो, वहां जाने से भी बचें।
जीवदया का संदेश: भगवान नेमिनाथ की प्रेरणा आज भी उतनी ही प्रासंगिक
जीवदया का संदेश केवल एक धार्मिक उपदेश नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए करुणा, अहिंसा और संवेदनशीलता का सर्वोच्च आदर्श है। भगवान नेमिनाथ (नेम कुंवर) और महारानी राजुल की प्रेरणादायक कथा सदियों से जैन समाज को यह सिखाती आई है कि किसी भी निर्दोष जीव की पीड़ा हमारे सुख से बड़ी है।
इसी विषय को लेकर समाजसेवी हार्दिक हुंडिया (कल्याणी मित्र) ने भावुक अपील करते हुए जैन समाज सहित सभी लोगों से आत्ममंथन करने का आग्रह किया है।
भगवान नेमिनाथ और राजुल की प्रेरणा
जैन परंपरा के अनुसार महाराजा नेम कुंवर (भगवान नेमिनाथ) का विवाह महारानी राजुल से होने वाला था। पूरे राज्य में उत्सव का वातावरण था। दोनों राजपरिवारों में अपार खुशी थी।इसी दौरान भगवान नेमिनाथ को ज्ञात हुआ कि विवाह समारोह में भोज के लिए हजारों अबोल पशुओं को मारने की तैयारी की गई है।यह सुनते ही उनके भीतर करुणा जागृत हो गई।उन्होंने विचार किया कि जिस विवाह की खुशी निर्दोष जीवों की हत्या पर आधारित हो, ऐसा विवाह स्वीकार नहीं किया जा सकता।क्षणभर में उन्होंने विवाह, राजपाट, वैभव और संसार का त्याग कर संयम का मार्ग अपना लिया।भगवान नेमिनाथ के इस निर्णय से प्रेरित होकर महारानी राजुल ने भी सांसारिक सुख छोड़कर संयम का मार्ग स्वीकार किया।आज भी यह प्रसंग जीवदया का संदेश देने वाली सबसे महान घटनाओं में गिना जाता है।
हार्दिक हुंडिया ने उठाए महत्वपूर्ण सवाल
कल्याणी मित्र हार्दिक हुंडिया ने कहा कि हर जैन धर्मावलंबी भगवान नेमिनाथ और राजुल की कथा जानता है।उन्होंने प्रश्न उठाया—
“अपने आप से पूछिए कि हमने कैसी जीवदया सीखी?”
उन्होंने कहा कि आज भी समाज में आयंबिल, उपवास और अनेक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं ताकि जीवों को कष्ट न पहुंचे।लेकिन यदि हम स्वयं ऐसे स्थानों पर जाते हैं जहां प्रतिदिन हजारों अबोल जीवों की हत्या होती है, तो क्या यह वास्तविक जीवदया है?उनके अनुसार भगवान नेमिनाथ ने केवल उपदेश नहीं दिया बल्कि अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि जहां जीवों की हत्या हो रही हो, वहां रहना भी उचित नहीं।
फाइव स्टार होटल और जीवदया का विरोधाभास
हार्दिक हुंडिया ने अपने वक्तव्य में एक उदाहरण देते हुए कहा कि आज समाज में कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि एक ही परिवार में माता या बहन दीक्षा लेकर संयम जीवन अपना लेती हैं, जबकि उसी परिवार के लोग अपने बच्चों के विवाह ऐसे फाइव स्टार होटलों में आयोजित करते हैं जहां प्रतिदिन मांसाहार परोसा जाता है।उन्होंने कहा कि यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है।यदि हम भगवान नेमिनाथ और राजुल महारानी के भक्त हैं तो हमें उनके जीवन के आदर्शों को व्यवहार में भी अपनाना चाहिए।
जीवदया केवल उपवास नहीं, व्यवहार भी है
हार्दिक हुंडिया का कहना है कि जीवदया केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए।वास्तविक जीवदया तब है जब—
- किसी भी अबोल जीव की हत्या का समर्थन न किया जाए।
- ऐसे स्थानों से दूरी बनाई जाए जहां मांसाहार परोसा जाता हो।
- अपने परिवार और समाज में अहिंसा का संदेश दिया जाए।
- बच्चों को करुणा और संवेदनशीलता की शिक्षा दी जाए।
- भगवान नेमिनाथ के आदर्शों को जीवन में उतारा जाए।
आज के समाज के लिए संदेश
हार्दिक हुंडिया ने कहा कि यदि भगवान नेमिनाथ अपनी शादी जैसी सबसे बड़ी खुशी छोड़ सकते हैं, तो हम भी अपने जीवन में छोटे-छोटे त्याग करके जीवदया का पालन कर सकते हैं।उन्होंने समाज से आग्रह किया कि आज से यह संकल्प लें—
“जहां अबोल जीवों की हत्या होती हो, वहां हमारा पैर भी नहीं पड़ेगा।”
उनके अनुसार यही भगवान नेमिनाथ और महारानी राजुल के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।
जीवदया का संदेश समाज को क्या सिखाता है?
जीवदया का संदेश हमें बताता है कि—
- प्रत्येक जीव का जीवन मूल्यवान है।
- अहिंसा केवल विचार नहीं बल्कि जीवनशैली है।
- करुणा सबसे बड़ा धर्म है।
- धार्मिक आस्था तभी सार्थक है जब वह व्यवहार में दिखाई दे।
- भगवान नेमिनाथ का जीवन त्याग और संवेदना की सर्वोच्च मिसाल है।
निष्कर्ष
भगवान नेमिनाथ और महारानी राजुल का जीवन आज भी मानवता को करुणा, अहिंसा और जीवदया का मार्ग दिखाता है।हार्दिक हुंडिया की अपील केवल जैन समाज के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का अवसर है।यदि हम वास्तव में भगवान नेमिनाथ के अनुयायी हैं तो केवल पूजा-अर्चना ही नहीं बल्कि उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना भी आवश्यक है।जहां किसी अबोल जीव की हत्या होती हो, वहां जाने से भी बचना ही जीवदया का संदेश का वास्तविक पालन माना जा सकता है।
