चातुर्मास 2026 का धार्मिक महत्व क्या है? के. विक्रम सुराणा ने बताया कि चातुर्मास का विशेष प्राण जिनवाणी है। जानिए चातुर्मास के नियम, भक्ष्य-अभक्ष्य, साधु-साध्वी की आराधना और आत्मकल्याण का संदेश।
चातुर्मास 2026: चातुर्मास का विशेष प्राण है जिनवाणी, वाणी और पानी का बढ़ा महत्व – के. विक्रम सुराणा
चातुर्मास 2026: चातुर्मास का विशेष प्राण है जिनवाणी, वाणी और पानी का बढ़ा महत्व – के. विक्रम सुराणा
चातुर्मास 2026 केवल चार महीनों का समय नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, साधना और धर्म आराधना का श्रेष्ठ अवसर है। धर्मप्रेमी के. विक्रम सुराणा ने कहा कि चातुर्मास का विशेष प्राण जिनवाणी है। यदि चातुर्मास में जिनवाणी का श्रवण नहीं किया, तो इस दुर्लभ अवसर का वास्तविक लाभ अधूरा रह जाता है।उन्होंने बताया कि वर्ष में बारह महीने और तीन ऋतुएँ होती हैं। प्रत्येक ऋतु लगभग चार महीने तक रहती है। वर्षा ऋतु के चार महीनों को ही चातुर्मास कहा जाता है। यही कारण है कि इस अवधि का जैन धर्म में अत्यंत विशेष महत्व माना गया है।
चातुर्मास क्या है?
चातुर्मास वर्षा ऋतु के चार महीनों का वह पावन काल है, जब साधु-साध्वी भगवंत एक ही स्थान पर विराजमान होकर धर्म आराधना करते हैं तथा समाज को धर्मोपदेश प्रदान करते हैं।
के. विक्रम सुराणा ने बताया कि वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है। यदि साधु-संत लगातार विहार करें तो अनजाने में जीव हिंसा की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए ज्ञानी भगवंतों ने श्रमण एवं श्रमणी भगवंतों को चार माह एक स्थान पर स्थिर रहकर साधना करने की आज्ञा दी।
चातुर्मास में वाणी और पानी का महत्व
के. विक्रम सुराणा ने कहा कि चातुर्मास में वाणी और पानी दोनों का विशेष महत्व होता है।वाणी का अर्थ केवल बोलना नहीं, बल्कि जिनवाणी का श्रवण करना भी है। वहीं पानी का उपयोग अत्यंत सावधानी एवं जीवदया की भावना के साथ करना चाहिए।इस अवधि में प्रत्येक धर्मावलंबी को अधिक से अधिक धर्मश्रवण, स्वाध्याय, तप, संयम और आत्मचिंतन करना चाहिए।
चातुर्मास में हमारा कर्तव्य
के. विक्रम सुराणा ने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि इन चार महीनों में बिना आवश्यक कारण के बाहर गांव जाने से बचें।यद्यपि साधु-संतों के कठोर नियम होते हैं, लेकिन गृहस्थ भी अपनी क्षमता अनुसार संयम का पालन कर सकते हैं। जितना संभव हो उतना जयणा (सावधानी) का पालन करना चाहिए।
भक्ष्य और अभक्ष्य का विशेष ध्यान रखें
चातुर्मास के दौरान भोजन संबंधी नियमों का विशेष महत्व है।उन्होंने बताया कि ऋतु परिवर्तन के साथ कई खाद्य पदार्थ भक्ष्य से अभक्ष्य हो जाते हैं। उदाहरण के रूप में जो बादाम कल तक भक्ष्य थी, वह चातुर्मास प्रारंभ होने के बाद चार महीनों तक अभक्ष्य मानी जा सकती है।इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को निकट के उपाश्रय में जाकर साधु-साध्वी भगवंतों से यह अवश्य जानना चाहिए कि वर्तमान समय में कौन-कौन से पदार्थ भक्ष्य हैं और कौन अभक्ष्य।उन्होंने विशेष रूप से कहा कि चातुर्मास में बाहर का भोजन पूरी तरह त्याग देना चाहिए ताकि निर्दोष गोचरी का लाभ प्राप्त हो सके।
चातुर्मास का विशेष प्राण है जिनवाणी
के. विक्रम सुराणा ने कहा कि यदि चातुर्मास का कोई वास्तविक प्राण है, तो वह जिनवाणी है।आजकल साधु-संतों के चातुर्मास प्रवेश पर भव्य स्वागत, विशाल पंडाल और सुंदर सजावट देखने को मिलती है, लेकिन प्रवचन के समय अधिकांश सभागार खाली दिखाई देते हैं।उन्होंने कहा कि यदि जिनवाणी का श्रवण नहीं किया गया तो चातुर्मास की सार्थकता अधूरी रह जाएगी।
युवाओं से विशेष अपील
के. विक्रम सुराणा ने विशेष रूप से युवाओं से आह्वान किया कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपाश्रय पहुंचकर जिनवाणी का श्रवण करें।उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी यदि धर्म, संयम और संस्कारों से जुड़ेगी तो समाज और राष्ट्र दोनों का भविष्य उज्ज्वल होगा।उन्होंने कहा—
“बिना जिनवाणी के आत्मा का कल्याण संभव नहीं है। प्रभु की वाणी ही आत्मा के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करती है।”
निष्कर्ष
चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, तप, स्वाध्याय और जीवदया का महान पर्व है। इन चार महीनों में यदि श्रद्धालु जिनवाणी का श्रवण करें, भक्ष्य-अभक्ष्य का पालन करें, संयमित जीवन जिएँ और धर्म आराधना करें तो उनका जीवन आध्यात्मिक रूप से समृद्ध हो सकता है।धर्मप्रेमी के. विक्रम सुराणा ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की कि वे चातुर्मास का अधिकतम लाभ उठाएं, उपाश्रय में नियमित पहुंचें और जिनवाणी का श्रवण कर आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हों।
— के. विक्रम सुराणा
