चातुर्मास का महत्व केवल चार माह के प्रवास तक सीमित नहीं है। प्रिंस जैन शास्त्री देवांश ने बताया कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम, तप, धर्मप्रभावना और समाज के आध्यात्मिक उत्थान का महापर्व है। पढ़ें पूरी खबर।
चातुर्मास का महत्व: क्यों चातुर्मास केवल 4 माह का प्रवास नहीं, बल्कि नगर के भाग्य का उदय है – जानिए प्रिंस देवांश की प्रेरक बात
मुरैना | संवाददाता : मनोज जैन नायक
चातुर्मास का महत्व
चातुर्मास का महत्व दिगम्बर जैन परंपरा में केवल चार माह के धार्मिक प्रवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, संयम, तप, साधना, धर्मप्रभावना और समाज के नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान का महापर्व माना जाता है। इस पावन काल में पूज्य मुनिराज एवं आर्यिका माताजी एक स्थान पर विराजमान होकर अपने तप, त्याग, साधना और प्रवचनों के माध्यम से हजारों श्रद्धालुओं के जीवन में नई चेतना का संचार करते हैं।जैन संस्कृत विद्यालय के विद्वान प्रिंस जैन शास्त्री “देवांश” (फिरोजाबाद) ने कहा कि “चातुर्मास केवल चार माह का प्रवास नहीं, बल्कि उस नगर के भाग्य का उदय होता है।” उन्होंने कहा कि जिस नगर को संतों के चातुर्मास का सौभाग्य प्राप्त होता है, वह वास्तव में पुण्यशाली बन जाता है।
संतों का चातुर्मास क्यों महत्वपूर्ण है?
प्रिंस जैन शास्त्री देवांश के अनुसार चातुर्मास का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इस अवधि में जप, तप, व्रत, दान, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, उपवास और धर्मचर्चा जैसे आध्यात्मिक कार्यों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।प्रतिदिन होने वाले प्रवचनों, शंका-समाधान और स्वाध्याय के माध्यम से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की भावना मजबूत होती है। संतों के सान्निध्य में व्यक्ति के भीतर त्याग, तप, संयम, क्षमा, अहिंसा और आत्मानुशासन जैसे श्रेष्ठ संस्कार विकसित होते हैं।जैन आगमों के अनुसार संयमी संतों का सान्निध्य अनेक जन्मों के पुण्य से प्राप्त होता है। इसलिए जिस नगर में चातुर्मास होता है, वहां धर्म, शांति और सदाचार का वातावरण स्वतः निर्मित हो जाता है।
युवाओं के लिए चातुर्मास का महत्व
आज के समय में भौतिकता, व्यस्त जीवनशैली और पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण नई पीढ़ी अपने धर्म और संस्कारों से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में चातुर्मास का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।प्रिंस देवांश ने कहा कि संतों के प्रवचन युवाओं को जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझाते हैं तथा उन्हें संयम, सदाचार, आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करते हैं।उन्होंने कहा कि चातुर्मास के दौरान बालक-बालिकाओं एवं युवाओं को जैन दर्शन, संस्कृति, नैतिकता और जीवन मूल्यों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे उनमें अनुशासन, संस्कार और धर्म के प्रति आस्था विकसित होती है।
समाज के लिए क्यों आवश्यक है चातुर्मास?
प्रिंस जैन शास्त्री देवांश ने कहा कि समाज में संगठन, सद्भाव, सेवा और सहयोग की भावना विकसित करने में चातुर्मास का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।गुरुभक्ति, वैयावृत्य (सेवा), आहार व्यवस्था और धार्मिक आयोजनों में सहभागिता के माध्यम से समाज में धार्मिक चेतना का विस्तार होता है। इससे समाज का नैतिक स्तर मजबूत होता है और आने वाली पीढ़ियों को श्रेष्ठ संस्कार प्राप्त होते हैं।उन्होंने कहा कि भव्य मंदिरों और सामाजिक भवनों का निर्माण आवश्यक है, लेकिन यदि वहां संतों का प्रवास, साधना और धर्मोपदेश न हो तो उनका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
प्रिंस जैन शास्त्री देवांश का संदेश
प्रिंस जैन शास्त्री “देवांश” ने सभी जैन समाज, तीर्थ क्षेत्रों और नगरों के पदाधिकारियों से आग्रह किया कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार संतों के चातुर्मास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें।उन्होंने कहा कि यह केवल चार माह का धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक निर्माण का मजबूत आधार है।उन्होंने अपने संदेश में कहा—
“संतों का आगमन केवल किसी नगर में नहीं होता, वह उस नगर के भाग्य का उदय होता है।”
और
“चातुर्मास केवल चार माह का प्रवास नहीं, बल्कि अनंत आत्माओं के कल्याण का महाअभियान है।”
निष्कर्ष
चातुर्मास का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण की आधारशिला है। संतों का चातुर्मास समाज को धर्म, संस्कार, संयम, सेवा और आत्मकल्याण की दिशा प्रदान करता है।प्रिंस जैन शास्त्री देवांश ने सभी धर्मानुरागियों से आह्वान किया कि वे चातुर्मास की इस महान परंपरा को और अधिक सशक्त बनाने का संकल्प लें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को धर्म, संस्कृति और श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की अमूल्य विरासत मिल सके।
लेखक
भाव लेखक : प्रिंस जैन शास्त्री “देवांश”, फिरोजाबाद
संवाददाता
मनोज जैन नायक, मुरैना


