Jhabua में नवकार आराधिका लीलाबेन भंडारी को मरणोपरांत ‘पुण्यश्लोका’ की उपाधि से अलंकृत,
ऋषभदेव बावन जिनालय में हुआ भव्य आयोजन
Jhabua स्थित जैन श्वेतांबर तीर्थ श्री ऋषभदेव बावन जिनालय परिसर में एक अत्यंत भावनात्मक और आध्यात्मिक वातावरण के बीच नवकार आराधिका, तपस्वीरत्ना स्व. श्रीमती लीलाबेन शांतिलालजी भंडारी (जीजी) को मरणोपरांत ‘पुण्यश्लोका’ के प्रतिष्ठित पद से अलंकृत किया गया। यह सम्मान उनके धर्ममय जीवन, तपस्या, सेवा और समाज के प्रति उनके योगदान को समर्पित रहा।
श्री संघ झाबुआ द्वारा आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में तीन दिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव के अंतर्गत आज गुणानुवाद सभा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संतगण और समाज के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
धार्मिक और सामाजिक सेवाओं को किया गया याद
गुणानुवाद सभा में वक्ताओं ने स्व. लीलाबेन भंडारी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका पूरा जीवन धर्म, सेवा और तपस्या को समर्पित रहा। उन्होंने जीवनभर जिनालय में स्नात्र पूजन, पाठशाला संचालन, आयंबिल तप खाता संचालन, प्रतिक्रमण व्यवस्था तथा जीवदया जैसे अनेक धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाई।
श्री संघ के प्रतिनिधियों ने बताया कि जीजी साधु-संतों की सेवा में हमेशा अग्रणी रहती थीं और उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह धार्मिक साधना और समाजसेवा के लिए समर्पित कर दिया था।

‘पुण्यश्लोका’ पद से मरणोपरांत सम्मान
श्री संघ झाबुआ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में उन्हें मरणोपरांत ‘पुण्यश्लोका’ के पद से अलंकृत कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके साथ ही अखिल भारतीय श्री राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद की राष्ट्रीय इकाई की ओर से उन्हें ‘परिषद गौरव’ और परिषद परिवार झाबुआ की ओर से ‘झाबुआ परिषद रत्ना’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया।
इस अवसर पर उपस्थित समाजजनों ने इसे उनके जीवन की महान उपलब्धियों और धार्मिक समर्पण का सम्मान बताया।
संतों और साध्वियों ने किया गुणानुवाद
कार्यक्रम में उपस्थित पूज्य तपस्वी मुनि श्री पीयूषचंद्र विजय जी महाराज साहेब ने अपने प्रवचन में कहा कि जीजी ने अपना संपूर्ण जीवन साधु-संतों की सेवा और वैयावच्च में व्यतीत किया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन अत्यंत तपमय और प्रेरणादायी रहा, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनेगा।
वहीं पूज्य साध्वी श्री जीवनकला श्री जी ने कहा कि स्व. लीलाबेन भंडारी पुण्य सम्राट गुरुदेव की अनन्य आराधिका थीं और उन्होंने 55 वर्षों तक निरंतर नवकार महामंत्र की आराधना की। वे सदैव गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता में आगे रहती थीं।

त्रि-दिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव का आयोजन
यह पूरा आयोजन त्रि-दिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव के अंतर्गत किया जा रहा है, जो पूज्य आचार्य भगवंतों एवं गच्छाधिपति की प्रेरणा से आयोजित हुआ है। महोत्सव में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम, भक्ति संगीत, प्रवचन और गुणानुवाद सभाओं का आयोजन किया गया।
पैलेस गार्डन में आयोजित इस गुणानुवाद सभा में साधु-साध्वी भगवंतों की निश्रा में कार्यक्रम संपन्न हुआ, जहां वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।
समाज के गणमान्य लोगों की उपस्थिति
इस श्रद्धांजलि एवं सम्मान समारोह में कई प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक व्यक्तित्व उपस्थित रहे। इनमें पूर्व सांसद कांतिलाल भूरिया, गुमानसिंग डामोर, मोहनखेड़ा तीर्थ के मैनेजिंग ट्रस्टी सुजानमल सेठ, परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रकाश छाजेड़, पेपरल तीर्थ ट्रस्ट अध्यक्ष महेंद्र भाई सहित अनेक गणमान्य लोग शामिल रहे।
इसके अलावा श्री संघ झाबुआ के निर्मल मेहता, प्रदीप रुनवाल, मितेश गादिया, तेजप्रकाश कोठारी, नीरज सुराना (इंदौर), आदित्य धोका (धार), सुरेश समीर (राणापुर) सहित कई लोग उपस्थित रहे।
महिला परिषद की प्रांतीय अध्यक्ष सारिका कोलन, नीलम पगारिया, तिहान भंडारी, गाथा सकलेचा सहित अनेक महिला प्रतिनिधियों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

गुणानुवाद और भावांजलि अर्पित
कार्यक्रम के दौरान सभी उपस्थित जनों ने स्व. लीलाबेन भंडारी के धर्ममय जीवन पर अपने विचार व्यक्त किए और उन्हें भावांजलि अर्पित की। LED स्क्रीन के माध्यम से उनके जीवन की झलकियां भी प्रदर्शित की गईं, जिसे डॉ. पुनीत सकलेचा ने अपनी आवाज में प्रस्तुत किया।
सभा का संचालन श्री संघ अध्यक्ष संजय मेहता द्वारा किया गया, जबकि भंडारी परिवार की ओर से यशवंत भंडारी ने सभी का आभार व्यक्त किया।
आध्यात्मिक विरासत का संदेश
वक्ताओं ने कहा कि स्व. लीलाबेन भंडारी का जीवन त्याग, सेवा और भक्ति का प्रतीक है। उनका जीवन समाज के लिए प्रेरणा स्रोत है और उन्होंने जो धार्मिक कार्य किए हैं, वे आने वाली पीढ़ियों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहेंगे।
निष्कर्ष
झाबुआ में आयोजित यह भव्य गुणानुवाद सभा केवल एक सामान्य श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि यह जैन समाज की उस समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आई, जिसमें सेवा, तप, त्याग और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, समाजजन, साधु-संत और गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे, जिन्होंने स्व. श्रीमती लीलाबेन भंडारी के धर्ममय जीवन को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्व. लीलाबेन भंडारी को मरणोपरांत प्रदान किया गया ‘पुण्यश्लोका’ का सम्मान उनके संपूर्ण जीवन की महानता, धार्मिक निष्ठा और समाज सेवा के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनका जीवन नवकार मंत्र की आराधना, साधु-संतों की सेवा, जीवदया और धार्मिक आयोजनों में सक्रिय सहभागिता से परिपूर्ण रहा। इस अवसर पर वक्ताओं ने उनके जीवन को आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
कार्यक्रम में यह संदेश भी स्पष्ट रूप से सामने आया कि ऐसे व्यक्तित्व समाज को आध्यात्मिक दिशा देने के साथ-साथ मानवीय मूल्यों को भी मजबूत करते हैं। यह सभा वास्तव में एक आध्यात्मिक प्रेरणा का केंद्र बन गई।
