श्रुत पंचमी 2025 पर विशेष संवादकीय। जानिए जिनवाणी, षट्खण्डागम, आचार्य धरसेन, कुन्दकुन्ददेव, विद्यासागर जी महाराज और श्रुत परम्परा के अनन्त आलोक की प्रेरक गाथा।
श्रुत पंचमी 2025 : जिनवाणी का अनन्त आलोक, श्रुत परम्परा का अक्षय महोत्सव
डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चन्देरी
श्रुत-पञ्चमी : जिनवाणी का अनन्त आलोक और श्रुत-परम्परा का अक्षय महोत्सव
ज्ञान की अविरल गंगा, आचार्यों की अमर साधना और आत्मजागरण का महापर्व
दिगम्बर जैन परम्परा के आलोक में एक विशेष
“धम्मो मगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति, जस्स धम्मे सया मणो॥”
जब संसार का समस्त वैभव काल की धूल में विलीन हो जाता है, जब राजसत्ताएँ, साम्राज्य और सभ्यताएँ इतिहास के पृष्ठों में सिमट जाती हैं, तब भी यदि कुछ अमर रहता है तो वह है ज्ञान। और जब वह ज्ञान वीतराग सर्वज्ञ जिनेन्द्र भगवान की दिव्यध्वनि से प्रकट हुआ हो, आचार्यों की तपःपूत परम्परा से सुरक्षित हुआ हो तथा असंख्य भव्य जीवों के मोक्षमार्ग का प्रदीप बना हो, तब वह केवल ज्ञान नहीं रह जाता, वह श्रुतदेवता, वह जिनवाणी, वह आत्मा का चक्षु बन जाता है।
इसी अनादि-अनन्त ज्ञानधारा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण का पावन पर्व है श्रुत-पञ्चमी महापर्व।
जिनवाणी : भगवान महावीर की दिव्यध्वनि का अमृत
भगवान महावीर स्वामी के केवलज्ञान प्रकट होने पर समवसरण में दिव्यध्वनि का प्रादुर्भाव हुआ। यह ध्वनि किसी एक भाषा, जाति अथवा सम्प्रदाय की नहीं थी, बल्कि समस्त प्राणिमात्र के कल्याण हेतु थी। गणधर देवों ने उसे द्वादशांग श्रुत के रूप में व्यवस्थित किया। गौतम स्वामी, सुधर्मा स्वामी और जम्बूस्वामी से प्रवाहित यह ज्ञानगंगा श्रुतकेवली आचार्यों की परम्परा द्वारा सुरक्षित रही।
आचार्य उमास्वाति ने कहा
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
मोक्ष का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र है। इन तीनों में ज्ञान की भूमिका सूर्य के समान है। बिना प्रकाश के मार्ग दिखाई नहीं देता और बिना जिनवाणी के आत्मा अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकती।
धरसेनाचार्य, पुष्पदन्त और भूतबलि श्रुत के अमर प्रहरी
काल की गति के साथ जब श्रुत का लोप होने लगा, तब गिरिनार पर्वत की चन्द्रगुफा में विराजमान आचार्य धरसेनदेव ने अपने दो शिष्यों, आचार्य पुष्पदन्त और आचार्य भूतबलि को सिद्धान्त का अमूल्य खजाना प्रदान किया।
उनके पुरुषार्थ से षट्खण्डागम जैसा दिव्य सिद्धान्तग्रन्थ संसार को प्राप्त हुआ। यह केवल ग्रन्थ नहीं, अनन्त साधकों के लिए मोक्षमार्ग का मानचित्र है। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को श्रुत-पञ्चमी के रूप में मनाया जाता है।
आचार्य कुन्दकुन्ददेव आत्मा के सम्राट और श्रुत-सूर्य
यदि दिगम्बर जैन परम्परा में किसी एक आचार्य ने आत्मतत्त्व को सर्वाधिक गहराई से उद्घाटित किया है, तो वे हैं आचार्य श्री कुन्दकुन्ददेव।
दिगम्बर परम्परा की श्रद्धानुसार, चारण ऋद्धि से सम्पन्न आचार्य कुन्दकुन्ददेव महाविदेह क्षेत्र में विराजमान वर्तमान तीर्थंकर भगवान सीमंधर स्वामी के समवसरण में पहुँचे और वहाँ से श्रुत-सार ग्रहण कर भारतभूमि में लौटे। चाहे इसे आध्यात्मिक अनुभूति मानें या परम्परागत विश्वास, इसमें निहित संदेश अत्यन्त गहन है— सत्य की यात्रा सीमाओं से परे है और जिनवाणी कालातीत है।
उनकी वाणी आज भी आत्मा को पुकारती है—
णाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा।
एयं मग्गं जिनक्खादं मोक्षस्स कारणं परं॥
समयसार, प्रवचनसार, नियमसार, पंचास्तिकाय और अष्टपाहुड़ आज भी आत्मानुभूति के दिव्य दीपक हैं।
समन्तभद्र से नेमिचन्द्र तक : श्रुत की अखण्ड ज्योति
आचार्य समन्तभद्र, पूज्यपाद, अकलंकदेव, वीरसेन स्वामी, जिनसेनाचार्य, गुणभद्राचार्य, नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती, पण्डित टोडरमल और बनारसीदास जैसे महापुरुषों ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण जिनवाणी की सेवा में समर्पित कर दिया।
आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रती की गाथा आज भी आत्मा को झकझोरती है—
जो जाणदि अरिहंतं दव्वगुणपज्जएहि सपूर्णं।
सो जाणदि अप्पाणं, मोहो खलु तस्स गलिदो॥
जो अरिहन्त को जानता है, वह स्वयं को जान लेता है और उसका मोह गल जाता है।
श्रुत के बिना धर्म नहीं
आचार्य वट्टकेर स्वामी मूलाचार में कहते हैं
सुयं णाणं महप्पं, सुयं धम्मस्स कारणं।
सुयेण विणा ण सिद्धी, सुयं मोक्षस्स कारणं॥
श्रुतज्ञान महान है, धर्म का कारण है और मोक्ष का आधार है।
इसलिए जैन परम्परा में जिनवाणी को माता कहा गया
“श्रुतमाता”
क्योंकि माता शरीर को जन्म देती है, परन्तु जिनवाणी आत्मा को जागृत करती है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज : आधुनिक युग के श्रुत-ऋषि
वर्तमान युग में यदि किसी ने श्रुत-परम्परा को पुनः जन-जन तक पहुँचाने का महायज्ञ किया, तो वे राष्ट्रसंत, तपोनिधि, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज हैं।
उन्होंने केवल ग्रन्थ नहीं पढ़े, बल्कि उन्हें जिया। उनका सम्पूर्ण जीवन स्वाध्याय, तप और करुणा का मूर्तिमान रूप था।
उनकी कालजयी कृति “मूकमाटी” वस्तुतः मौन की वाणी है। नर्मदा के कोमल कंकड़ों में उन्होंने जीवन का दर्शन देखा। जिस प्रकार नर्मदा की धारा कठोर पत्थरों को भी चिकना और सुन्दर बना देती है, उसी प्रकार जिनवाणी का सतत संस्पर्श मनुष्य के भीतर के क्रोध, अहंकार और मोह को परिष्कृत कर देता है।
मूकमाटी मानो कहती है
“पत्थर भी तराशे जा सकते हैं, तो फिर चेतन आत्मा क्यों नहीं?”
आज का संकट : ग्रन्थ सज रहे हैं, जीवन नहीं
आज घरों में विशाल पुस्तकालय हैं, किन्तु स्वाध्याय का समय नहीं। अलमारियों में आगम हैं, परन्तु मन मोबाइल में खोया हुआ है। बच्चों के हाथों में शास्त्र कम, स्क्रीन अधिक दिखाई देती है।
श्रुत-पञ्चमी हमें झकझोरती है
क्या केवल चन्दन, अक्षत और पुष्प अर्पित कर देना ही जिनवाणी की पूजा है?
नहीं।
वास्तविक पूजा है
एक गाथा पढ़ना।
एक श्लोक समझना।
एक सिद्धान्त जीवन में उतारना।
एक बालक को जैन संस्कृति से जोड़ना।
भक्तामर की विनम्रता और उत्तराध्ययन का मंगल संदेश
आचार्य मानतुंगदेव कहते हैं
बुद्ध्या विनापि विबुधार्चितपादपीठ!
स्तोतुं समुद्यतमतिर्विगतत्रपोऽहम्।
और उत्तराध्ययन सूत्र उद्घोष करता है
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसन्ति, जस्स धम्मे सया मणो॥
श्रुत-पञ्चमी : केवल पर्व नहीं, आत्मा का उत्सव है
श्रुत-पञ्चमी हमें स्मरण कराती है
जिनवाणी केवल अक्षरों का संग्रह नहीं, आत्मा का आलोक है।
शास्त्र केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, जीने की दिशा हैं।
आचार्य केवल इतिहास के पात्र नहीं, वर्तमान के पथप्रदर्शक हैं।
स्वाध्याय केवल परम्परा नहीं, आत्मा का आहार है।
जब तक संसार में एक भी व्यक्ति नवकार मंत्र का जाप करेगा, जब तक कोई बालक समयसार की गाथा पढ़ेगा, जब तक किसी साधक के हाथों में षट्खण्डागम और मूकमाटी रहेगी, तब तक जिनवाणी की यह ज्योति कभी बुझ नहीं सकती।
अन्त में श्रुतदेवता के चरणों में यही प्रार्थना
जयतु जिनवाणी, जयतु श्रुतदेवता।
जयतु कुन्दकुन्द-वाणी।
जयतु षट्खण्डागम।
जयतु विद्यासागर-परम्परा।
जयतु जिनशासनम्॥
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं।
णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं॥
॥ जय जिनेन्द्र ॥
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