MP-CG Pensioners Controversy 2026: पेंशनर्स को राहत की उम्मीद,
मध्यप्रदेश–छत्तीसगढ़ पेंशन विवाद फिर चर्चा में
MP-CG Pensioners Controversy : मध्यप्रदेश के विभाजन को लगभग 25 साल 6 महीने 16 दिन बीत चुके हैं, लेकिन पेंशनर्स से जुड़ा विवाद अभी भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। इस बीच अब राज्य सरकार 4.35 लाख पेंशनर्स को राहत देने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
ताजा जानकारी के अनुसार, मध्यप्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक पत्र भेजकर यह स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों और पेंशनर्स का विभाजन पहले ही पूरी तरह हो चुका है, ऐसे में हर बार महंगाई राहत (Dearness Relief) के लिए आपसी सहमति लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
2006 से शुरू हुई सहमति की प्रक्रिया
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य 1 नवंबर 2000 को अलग हुए थे। शुरुआत में पेंशनर्स को महंगाई राहत बिना किसी बाधा के मिलती रही, लेकिन वर्ष 2006 में यह प्रक्रिया बदल गई।
उस समय यह व्यवस्था बनाई गई कि महंगाई राहत देने से पहले छत्तीसगढ़ सरकार की सहमति आवश्यक होगी। मध्यप्रदेश पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अनुसार, यह निर्णय तत्कालीन प्रशासनिक आदेशों के कारण लागू हुआ था, जिसके बाद से यह प्रक्रिया जारी है।
एसोसिएशन का कहना है कि यह व्यवस्था पेंशनर्स के लिए लंबे समय से परेशानी का कारण बनी हुई है और समय पर लाभ नहीं मिल पा रहा है।
2024 में हाई कोर्ट में पहुंचा मामला
वर्ष 2024 में मध्यप्रदेश पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने इस पूरी व्यवस्था को चुनौती देते हुए जबलपुर हाई कोर्ट का रुख किया। याचिका में कहा गया कि राज्य पुनर्गठन के समय जारी सर्कुलर में 2000 के बाद के पेंशनर्स पर छत्तीसगढ़ की सहमति जैसी कोई शर्त लागू नहीं की गई थी।
इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि महंगाई राहत को लेकर किसी प्रकार की सहमति लेने का स्पष्ट प्रावधान उस दस्तावेज में मौजूद नहीं है।
हाई कोर्ट ने मांगा जवाब, अब तक स्थिति अस्पष्ट
हाई कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन एवं वित्त विभागों से जवाब मांगा था।
अदालत ने यह स्पष्ट करने को कहा कि आखिर महंगाई राहत देने से पहले सहमति लेने की प्रक्रिया क्यों अपनाई जा रही है। हालांकि, अब तक इस पर कोई संयुक्त और स्पष्ट जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है।
आरटीआई और कानूनी लड़ाई तेज
पेंशनर्स एसोसिएशन ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 से संबंधित जानकारी भी मांगी है, लेकिन आरोप है कि अभी तक पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
इसी मुद्दे पर संगठन ने केंद्रीय सूचना आयोग में दूसरी अपील भी दायर की है, जिससे मामला और अधिक कानूनी प्रक्रिया में उलझ गया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
पेंशनर्स संगठन ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया निर्णय का हवाला दिया है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि पेंशन और संबंधित लाभ किसी भी कर्मचारी का संवैधानिक अधिकार है, न कि कोई बोनस या अनुग्रह राशि।
इस आधार पर पेंशनर्स का कहना है कि महंगाई राहत में देरी या रोक संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
पेंशनर्स की वर्तमान स्थिति
सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में दिसंबर 2025 तक लगभग 4.40 लाख पेंशनर्स हैं। इनमें से केवल करीब 19 हजार पेंशनर्स 1 नवंबर 2000 से पहले के हैं, जबकि अधिकांश यानी लगभग 4.13 लाख पेंशनर्स बाद के समय के हैं।
छत्तीसगढ़ में ऐसे पेंशनर्स की संख्या लगभग 7 हजार बताई जाती है। इस तरह दोनों राज्यों में कुल प्रभावित पेंशनर्स की संख्या लगभग 26 हजार रह जाती है, जो लगातार कम हो रही है।
81 महीने के एरियर का विवाद
पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अनुसार, सरकार पर 81 महीनों के महंगाई राहत एरियर का भुगतान लंबित है। संगठन का आरोप है कि इस देरी के कारण पेंशनर्स को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अनुमान के मुताबिक, हर पेंशनर को मासिक आधार पर 1500 से 7000 रुपये तक का नुकसान हो रहा है, जो वर्षों में बढ़कर 1.5 लाख से 2 लाख रुपये से अधिक तक पहुंच गया है।
राज्य विभाजन और वित्तीय समझौता
राज्य पुनर्गठन के समय 30 अक्टूबर 2000 को वित्त विभाग द्वारा एक सर्कुलर जारी किया गया था। इसमें दोनों राज्यों के बीच पेंशन दायित्वों का विभाजन जनसंख्या अनुपात के आधार पर किया गया था।
इसके अनुसार मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी 73.38% और छत्तीसगढ़ की 26.62% तय की गई थी। उस समय यह भी तय हुआ था कि 1 नवंबर 2000 से पहले के पेंशनर्स को बिना किसी रुकावट के भुगतान मिलता रहेगा।
2000 के बाद के पेंशनर्स पर विवाद
विवाद का मुख्य बिंदु यही है कि 2000 के बाद के पेंशनर्स को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं थे। इसी वजह से वर्षों से दोनों राज्यों के बीच सहमति आधारित प्रक्रिया जारी रही।
पेंशनर्स संगठन का कहना है कि इस प्रक्रिया की वजह से नियमित महंगाई राहत में देरी हो रही है और इसका सीधा असर लाखों लोगों पर पड़ रहा है।
महंगाई राहत का नियम
नियमों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर हर छह महीने में महंगाई राहत में संशोधन किया जाना चाहिए। यह आमतौर पर 1 जनवरी और 1 जुलाई से लागू होता है।
पहले यह संशोधन तिमाही आधार पर भी किया जाता था, लेकिन अब इसे छमाही प्रणाली में बदल दिया गया है।
निष्कर्ष
मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के पेंशनर्स विवाद में अब सरकार के नए रुख के बाद राहत की उम्मीदें बढ़ी हैं। वित्त विभाग द्वारा सहमति प्रक्रिया को खत्म करने की पहल को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
हालांकि, अंतिम निर्णय न्यायालय और दोनों राज्यों के बीच समन्वय पर निर्भर करेगा। यदि यह प्रक्रिया सरल होती है, तो लाखों पेंशनर्स को लंबे समय से अटकी महंगाई राहत और एरियर का लाभ मिल सकता है।
