Jain समाज में बढ़ती कटुता को लेकर डॉ. अखिल बंसल ने चंदेरी स्थित सर्वोदय तीर्थ आदिश्वरम से जुड़े विवाद, कथित धमकी, धार्मिक दबाव और समाज में बढ़ती वैचारिक असहिष्णुता पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
चंदेरी और सर्वोदय तीर्थ आदिश्वरम का इतिहास
Jain समाज में बढ़ती कटुता को लेकर वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी डॉ. अखिल बंसल ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि चंदेरी उनकी मातृभूमि है और वहीं अपनी पैतृक भूमि पर उन्होंने अपने प्रयासों से “सर्वोदय तीर्थ आदिश्वरम” जिनालय का निर्माण कराया। यह जिनालय “तीर्थंकर ऋषभदेव सर्वोदय फाउंडेशन” ट्रस्ट के अंतर्गत निर्मित है, जो मध्यप्रदेश शासन द्वारा विधिवत पंजीकृत संस्था है।
इस जिनालय का भव्य पंचकल्याणक वर्ष 2013 में आचार्य श्री विमर्श सागर जी ससंघ एवं पूज्य कानजी स्वामी के अनन्य भक्त डॉ. हुकमचंद भारिल्ल के सान्निध्य में सम्पन्न हुआ था। यह तीर्थ आज जैन समाज में एक विशेष पहचान रखता है।
डॉ. अखिल बंसल की धार्मिक आस्था और सामाजिक भूमिका
डॉ. अखिल बंसल ने स्पष्ट किया कि उनकी आस्था दिगंबर मुनिराजों के प्रति जितनी गहरी है, उतनी ही श्रद्धा पूज्य श्री कानजी स्वामी के प्रति भी है। वे पिछले लगभग 50 वर्षों से टोडरमल स्मारक जैसी संस्था से जुड़े हुए हैं, जिसका संचालन कानजी स्वामी के अनुयायियों द्वारा किया जाता है।उन्होंने पूज्य आचार्य श्री विद्यानंद जी के उस संदेश को याद किया जिसमें कहा गया था —
“मत ठुकराओ, गले लगाओ, धर्म सिखाओ।”
डॉ. बंसल ने कहा कि उन्होंने सदैव समाज में समन्वय, संवाद और सहिष्णुता की भावना को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे पांच दशकों से सक्रिय हैं और “समन्वय वाणी” का संपादन करते हुए समाज की विकृतियों के विरुद्ध आवाज उठाते रहे हैं।
19 मई की घटना और विवाद की शुरुआत
डॉ. अखिल बंसल के अनुसार 19 मई को चंदेरी के एक समाजश्रेष्ठि, जो आदिश्वरम जिनालय से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं और संरक्षक की भूमिका निभा रहे हैं, उनका फोन आया। उन्हें बताया गया कि कुछ मुनिराज विराजमान हैं और उनकी इच्छा है कि आदिश्वरम जिनालय में आचार्य श्री के एक विशेष संघ के चरण स्थापित किए जाएं।
डॉ. बंसल ने विनम्रता से उत्तर दिया कि यह निर्णय किसी एक व्यक्ति का नहीं हो सकता। चूंकि जिनालय एक ट्रस्ट के अंतर्गत संचालित है, इसलिए सभी ट्रस्टियों की सहमति आवश्यक होगी। बिना ट्रस्टियों की अनुमति के वे अकेले कोई स्वीकृति नहीं दे सकते।इसके बाद जिनसे उनकी बात कराई गई, संभवतः वे कोई मुनिराज थे। उन्हें भी यही निवेदन किया गया कि प्रस्ताव ट्रस्टियों के समक्ष रखा जाएगा और सामूहिक सहमति बनने पर ही आगे निर्णय संभव होगा।
ट्रस्ट की सहमति और धार्मिक निर्णय का प्रश्न
जैन समाज में बढ़ती कटुता का सबसे बड़ा कारण धार्मिक निर्णयों को लेकर बढ़ता दबाव माना जा रहा है। डॉ. अखिल बंसल ने कहा कि किसी भी ट्रस्ट के अंतर्गत आने वाले धार्मिक स्थल में निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति विशेष या किसी समूह द्वारा दबाव बनाकर निर्णय करवाना उचित नहीं कहा जा सकता। धार्मिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए लोकतांत्रिक और सहमति आधारित प्रक्रिया जरूरी है।
कथित धमकी और समाज में बढ़ती कटुता
डॉ. बंसल के अनुसार इसके तुरंत बाद ललितपुर से जयकुमार जी हिरावल वालों का फोन आया। उन्होंने भी वही आग्रह दोहराया। जब उन्हें भी यही उत्तर दिया गया कि अंतिम निर्णय ट्रस्टियों की सहमति से ही होगा, तो वे अत्यंत आक्रोशित हो गए।
डॉ. बंसल ने आरोप लगाया कि उन्हें दो दिन का अल्टीमेटम देते हुए कठोर शब्दों में कहा गया —
“दो दिन बाद यदि स्वीकृति नहीं दी तो हम तुम्हें देख लेंगे।”उन्होंने कहा कि एक पत्रकार होने के नाते वे कभी धमकियों से भयभीत नहीं हुए, लेकिन प्रश्न केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा का नहीं बल्कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता का है।
जैन धर्म की मूल भावना और अनेकांतवाद
डॉ. अखिल बंसल ने कहा कि Jain धर्म की मूल भावना अहिंसा, सहिष्णुता और अनेकांतवाद पर आधारित है। यदि धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा के नाम पर किसी ट्रस्ट, संस्था या व्यक्ति पर दबाव बनाया जाता है, तो यह जैन धर्म की मूल शिक्षाओं के विपरीत माना जाएगा।उन्होंने कहा कि मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उसका समाधान संवाद और सहमति से होना चाहिए, न कि धमकी और कटुता से।
चरण स्थापना पर उठे धार्मिक प्रश्न
डॉ. बंसल ने वर्तमान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां किसी मुनिराज की समाधि होती है, वहीं उनके चरण स्थापित करने की परंपरा रही है। अन्य स्थानों पर सामान्यतः उन्हीं महापुरुषों के चरण स्थापित किए जाते हैं जिन्हें पूर्वकाल में मोक्षगामी माना गया है।उन्होंने कहा कि वर्तमान काल में किसी के मोक्षगमन का आगमिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में प्रत्येक मंदिर में किसी विशेष आचार्य संघ के चरण स्थापित करने का आग्रह कहां तक उचित है, यह गंभीर चिंतन का विषय है।
चौबीसी मंदिर विवाद और साहित्य हटाने का मामला
डॉ. बंसल ने यह भी आरोप लगाया कि चंदेरी में इसी संघ के मुनिराजों द्वारा पूर्व में प्रसिद्ध चौबीसी मंदिर से कानजी स्वामी अथवा उनकी विचारधारा से संबंधित संस्थाओं द्वारा प्रकाशित जिनवाणी साहित्य को बलपूर्वक हटवाया जा चुका है।उन्होंने कहा कि ऐसे वातावरण में कानजी स्वामी के अनुयायियों द्वारा निर्मित मंदिर में किसी विशेष संघ के चरण स्थापित कराने का दबाव स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े करता है।
समाज में संवाद बनाम दबाव की संस्कृति
Jain समाज में बढ़ती कटुता केवल एक व्यक्ति या संस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। डॉ. अखिल बंसल ने कहा कि धर्म का कार्य जोड़ना है, तोड़ना नहीं।यदि समाज में वैचारिक मतभेद हैं, तो उनका समाधान संवाद, सहमति और पारस्परिक सम्मान से होना चाहिए। दबाव और धमकी की संस्कृति समाज को विभाजित कर सकती है।
जनगणना से पहले समाज को संगठन की जरूरत
डॉ. अखिल बंसल ने कहा कि जनगणना का समय निकट है। ऐसे समय समाज को विभाजन नहीं बल्कि संगठन, संवाद और पारस्परिक सम्मान की सबसे अधिक आवश्यकता है।उन्होंने जैन समाज के सभी संतों, मुनियों, विद्वानों और समाजश्रेष्ठियों से आत्ममंथन करने की अपील की और कहा कि अनेकांत और सहिष्णुता की परंपरा को जीवित रखना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
