आचार्य श्री विश्वरत्नसागर सूरीश्वरजी महाराज दीक्षा दिवस की प्रेरणादायक कथा, तप, त्याग और धर्म जागरण की अद्भुत यात्रा को विस्तार से पढ़ें।
आचार्य श्री विश्वरत्नसागर सूरीश्वरजी महाराज दीक्षा दिवस
संयम का सूर्य, धर्म का ध्वजवाहक : आचार्य श्री विश्वरत्नसागर सूरीश्वरजी महाराज का दीक्षा दिवस
अक्षय तृतीया—यह केवल एक तिथि नहीं, यह अनंतता का प्रतीक है; यह वह क्षण है जब आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप की ओर जागृत होती है। इसी अमर दिवस पर संयम की ज्योति प्रज्वलित कर, धर्माकाश में तेजस्वी सूर्य के समान उदित हुए पूज्य आचार्य श्री विश्वरत्नसागर सूरीश्वरजी महाराज का दीक्षा दिवस आज भी जन-जन के अंतर्मन को आलोकित करता है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मालवा की पुण्यभूमि दत्तीगांव (राजगढ़) में 16 अप्रैल 1973 को जन्मी यह विभूति, जिनका संसारी नाम हुकमीचंद जैन था। बचपन से ही वैराग्य के संस्कार परिक्षित थे। माता कमला बाई के ममत्व और पिता पन्नालालजी के संस्कारों ने इस बालक के भीतर धर्म का ऐसा दीप प्रज्वलित किया, जो कालांतर में एक प्रचंड ज्योति बनकर समस्त समाज को प्रकाशित करने लगा।
दीक्षा दिवस का महत्व
केवल 6 वर्ष 20 दिन की अल्पायु में, जब संसार के आकर्षण अपनी चरम सीमा पर होते हैं, तब इस दिव्य आत्मा ने रामपुरा भनकोड़ा (गुजरात) की पावन भूमि पर अक्षय तृतीया 1979 को संयम को अंगीकार कर यह सिद्ध कर दिया कि महानता आयु की नहीं, आत्मा की परिपक्वता की परिचायक होती है। वह क्षण केवल दीक्षा का नहीं, बल्कि एक युग-परिवर्तन का प्रारंभ था—जहाँ एक बालक, तपस्वी बनकर जगत के कल्याण हेतु अग्रसर हुआ।
तप, त्याग और साधना
तप, त्याग और साधना की अनवरत साधना ने उन्हें गणी, पन्यास, उपाध्याय और अंततः आचार्य पद तक सुशोभित किया। एक लाख किलोमीटर से अधिक पदविहार, महानिशीथ और बियासणा जैसे कठिन तप, अंजनशलाका, प्रतिष्ठा और उपधान ओली जी जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में उनका मार्गदर्शन—ये सब उनके जीवन को एक चलता-फिरता तीर्थ बना देते हैं।
समाज में योगदान
किन्तु पूज्य आचार्य श्री का व्यक्तित्व केवल तप और त्याग तक सीमित नहीं है; वे युगदृष्टा हैं, समाज को नई दिशा देने वाले चिंतक हैं। उन्होंने भलीभाँति अनुभव किया कि आधुनिक युग में धर्म का संदेश केवल मंदिरों और प्रवचनों तक सीमित नहीं रह सकता, उसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए सशक्त माध्यमों की आवश्यकता है।
जैन पत्रकार परिषद की भूमिका
इसी दूरदर्शी चिंतन के परिणामस्वरूप “जैन पत्रकार परिषद” जैसे अभिनव और प्रेरणास्पद मिशन को गति प्रदान की गई। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि धर्म प्रचार का आधुनिक आयाम है—एक ऐसा सेतु, जो परंपरा और तकनीक, साधना और समाज, आस्था और अभिव्यक्ति के बीच सशक्त संवाद स्थापित करता है।
गुरुदेव की प्रेरणा से पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि धर्मप्रभावना का दिव्य साधन बनाया गया। कलम को करुणा का कंठहार, शब्दों को श्रद्धा का श्रृंगार और लेखनी को लोकमंगल का आधार बनाकर, जैन पत्रकार परिषद ने धर्म की गंगा को घर-घर तक पहुँचाने का अद्भुत कार्य प्रारंभ किया है।
प्रेरणादायक व्यक्तित्व
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि जहाँ-जहाँ गुरुदेव के चरण पड़े, वहाँ-वहाँ धर्म का नवसूर्योदय हुआ; और जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पहुँची, वहाँ-वहाँ जागृति का नवप्रभात हुआ। प्रतिमाह सुदि एकम की महामांगलिक में हजारों की तादात में जनभेदिनी ने गुरु के प्रति समर्पण और श्रद्धा आपके आशीर्वाद से लोगों के मन में आप श्री हारे के सहारे बनते हो। महामांगलिक के दौरान कई चमत्कारिक घटनाएं घटित होने से वो भक्तों के भगवान बन गये।
निष्कर्ष
आज उनके दीक्षा दिवस पर, जब हम श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं, तब यह केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि एक संकल्प है—कि हम भी धर्म के इस दिव्य अभियान में सहभागी बनें, अपने जीवन को संयम, सेवा और सद्भाव से सजाएँ।नमन उस तपस्वी को, जिसकी तपस्या युगों को दिशा दे रही है; वंदन उस आचार्य को, जिसकी वाणी आज भी आत्माओं को जागृत कर रही है।दीक्षा दिवस—एक पर्व नहीं, एक प्रेरणा है; एक उत्सव नहीं, एक उज्ज्वल चेतना है।
नागदा से जीवनलाल जैन की रिपोर्ट
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