भायखला में आध्यात्मिक आयोजन का भव्य दृश्य
मुंबई (भायखला): महाराष्ट्र की आर्थिक राजधानी मुंबई के भायखला क्षेत्र स्थित लव लेन, शेठ मोतीशा लेन में स्थित शंखेश्वर दर्शन Jain संघ में एक अत्यंत पावन और आध्यात्मिक प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस आयोजन में वर्तमान गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जयानंद सूरीश्वरजी महाराजा साहेब की आज्ञानुवर्ती साध्वी भगवंत सुव्रतयशाश्रीजी महाराज का संघ में मंगल प्रवेश हुआ, जिससे पूरा वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे और साध्वीजी के प्रवचन का लाभ प्राप्त किया। पूरे परिसर में “जय जिनेन्द्र” के उद्घोष के साथ वातावरण धार्मिकता से परिपूर्ण दिखाई दिया।
साध्वी सुव्रतयशाश्रीजी का मंगल प्रवचन
साध्वी भगवंत सुव्रतयशाश्रीजी महाराज ने अपने प्रवचन में भगवान महावीर स्वामी के जीवन, उनके उपदेशों और धर्म शासन की स्थापना के गूढ़ रहस्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर स्वामी केवल एक तीर्थंकर नहीं थे, बल्कि वे सम्पूर्ण मानव जाति के लिए मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले अनंत उपकारी और अनंत ज्ञानी थे।
उन्होंने अपने ज्ञान बल से यह अनुभव किया कि संसार के सभी जीव अनादिकाल से सुख की खोज में भटक रहे हैं, लेकिन उन्हें वास्तविक सुख कभी प्राप्त नहीं हो पा रहा है।
सुख की खोज में भटकता जीव
प्रवचन के दौरान साध्वीजी ने बताया कि जीव लगातार सुख प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है, लेकिन वह जितना प्रयास करता है, उतना ही अधिक दुःख की ओर बढ़ता जाता है।
यह एक गहन दार्शनिक सत्य है कि बाहरी सुख स्थायी नहीं होता, बल्कि क्षणिक होता है, जबकि आंतरिक सुख ही वास्तविक और शाश्वत होता है।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने इसी स्थिति को देखकर धर्मतीर्थ की स्थापना की, ताकि जीव को सही दिशा मिल सके और वह वास्तविक सुख की ओर अग्रसर हो सके।
चार संज्ञाओं का गूढ़ विश्लेषण
साध्वीजी ने अपने प्रवचन में भगवान महावीर स्वामी द्वारा बताए गए चार प्रमुख कारणों पर विशेष प्रकाश डाला, जिन्हें “चार संज्ञाएं” कहा जाता है।
ये चार संज्ञाएं हैं—
- आहार संज्ञा
- भय संज्ञा
- मैथुन संज्ञा
- परिग्रह संज्ञा
उन्होंने समझाया कि प्रत्येक जीव इन चार संज्ञाओं के अधीन रहता है और इन्हें बढ़ाने में ही अपना अधिकांश जीवन व्यतीत कर देता है।
संज्ञाओं के कारण मानव जीवन का दुःख
साध्वीजी ने कहा कि इन चार संज्ञाओं के कारण ही मनुष्य संसार में बंधन और दुःख का अनुभव करता है।
उन्होंने समझाया कि यह मानव जीवन केवल भोग-विलास या इन प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए नहीं मिला है, बल्कि इनसे ऊपर उठकर आत्मकल्याण के लिए प्राप्त हुआ है।
यदि मनुष्य इन संज्ञाओं को कम करने का प्रयास करे, तो वह धीरे-धीरे आत्मिक शांति की ओर बढ़ सकता है।
आहार और मन का गहरा संबंध
प्रवचन में साध्वीजी ने भोजन और मनुष्य के मानसिक स्वभाव के बीच गहरे संबंध पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जैसा भोजन करता है, वैसा ही उसका मन और विचार बनते हैं।
तामसिक भोजन जैसे अत्यधिक मसालेदार, मांसाहारी या अशुद्ध भोजन मन को अशांत, क्रोधित और असंतुलित बनाता है।
इसके विपरीत सात्विक भोजन मन को शांत, संयमित और करुणामय बनाता है।
तामसिक और सात्विक प्रवृत्ति का अंतर
साध्वीजी ने बताया कि तामसिक भोजन करने वाले व्यक्तियों में क्रोध, असंतोष और हिंसक प्रवृत्तियां अधिक देखी जाती हैं।
ऐसे व्यक्ति तेज संगीत, शोर-शराबे और उत्तेजक वातावरण को पसंद करते हैं।
इसके विपरीत सात्विक भोजन करने वाले व्यक्ति शांति, स्थिरता और आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित होते हैं।
वे शास्त्रीय संगीत, ध्यान और साधना को अधिक पसंद करते हैं।
संगीत और मानसिक स्थिति का संबंध
प्रवचन के दौरान साध्वीजी ने यह भी बताया कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की मानसिक स्थिति को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि तामसिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के लिए शोर-शराबे वाला संगीत आकर्षण का केंद्र होता है, जबकि सात्विक प्रवृत्ति वाला व्यक्ति शांत और मधुर संगीत को पसंद करता है।
यह अंतर केवल स्वाद का नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर का होता है।
धर्म शासन की स्थापना का उद्देश्य
साध्वीजी ने भगवान महावीर स्वामी के धर्म शासन की स्थापना के उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि यह धर्म शासन केवल पूजा-पाठ या बाहरी आचरण के लिए नहीं है, बल्कि आत्मा के शुद्धिकरण और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए स्थापित किया गया है।
श्रावक-श्राविकाओं की भावपूर्ण उपस्थिति
कार्यक्रम में शंखेश्वर दर्शन जैन संघ के ट्रस्टी पारस भाई मुलोबा और नरेश भाई सुराणा सहित अनेक गणमान्य सदस्य उपस्थित रहे।
इसके अलावा समाजसेवी एक्टीव आई.बी. जैन, नरपतजी मोरसीम, पृथ्वीराजजी पोषणा, रमेश जी मोरसीम, उत्तमजी मोरसीम, कैलाशजी, नरपतजी कांकरिया सुराणा, धीरज भाई, मुकेश भाई सेठ, पंकज भाई सेठ (भीनमाल), संदीप भाई पोषाणा, मुकेश भाई भीनमाल, प्रविण भाई पांथेडी तथा के. विक्रम सुराणा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
पूरे कार्यक्रम में श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने वातावरण को अत्यंत भक्तिमय और ऊर्जावान बना दिया।
ट्रस्टियों द्वारा स्वागत और आभार
शंखेश्वर दर्शन जैन संघ के ट्रस्टी पारस भाई मुलोबा ने साध्वी भगवंत का संघ में पधारने पर भावपूर्ण स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि साध्वीजी के प्रवचन समाज में नैतिकता, संयम और आध्यात्मिक जागृति को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने भविष्य में भी ऐसे आध्यात्मिक कार्यक्रमों के आयोजन की विनती की, ताकि समाज अधिक से अधिक धर्म मार्ग की ओर अग्रसर हो सके।
प्रवचन का सामाजिक और आध्यात्मिक प्रभाव
यह प्रवचन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह समाज को आत्मचिंतन की दिशा में प्रेरित करने वाला आयोजन था।
साध्वीजी के विचारों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि में निहित है।
निष्कर्ष
भायखला स्थित शंखेश्वर दर्शन जैन संघ में आयोजित यह प्रवचन कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान का अद्भुत संगम बनकर सामने आया।
साध्वी भगवंत सुव्रतयशाश्रीजी महाराज के प्रवचनों ने भगवान महावीर स्वामी के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाकर श्रद्धालुओं के हृदय में गहरी छाप छोड़ी।
यह आयोजन समाज को संयम, सात्विकता और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
