संत अभयदास महाराज भागवत कथा भीनमाल में तीसरे दिन दिया प्रेरणादायक संदेश, मंदिर को आत्मचिंतन का केंद्र बताया, जीवन सुधारने का मार्ग बताया।
संत अभयदास महाराज भागवत कथा भीनमाल
भीनमाल शहर में आयोजित भागवत कथा के दौरान संत अभयदास महाराज द्वारा दिए गए विचार न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य और मंदिरों की सही भूमिका को स्पष्ट किया।
संत अभयदास महाराज भागवत कथा भीनमाल का तीसरा दिन
भीनमाल के नीमगोरिया क्षेत्रपाल मंदिर परिसर में आयोजित भागवत कथा के तीसरे दिन संत अभयदास महाराज ने कहा कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मज्ञान का केंद्र है।उन्होंने कहा कि मंदिर का निर्माण इसलिए हुआ कि व्यक्ति वहां बैठकर अपने मन के भीतर झांक सके और आत्मिक शांति प्राप्त कर सके।
मंदिर का वास्तविक अर्थ क्या है
संत अभयदास महाराज ने कहा कि “मंदिर” शब्द का अर्थ ही है – मन के भीतर जाना।
उन्होंने बताया कि बाहरी पूजा, प्रतीक और धार्मिक गतिविधियां केवल माध्यम हैं, असली उद्देश्य है स्वयं से जुड़ना।
समाज की वर्तमान स्थिति पर संत की चिंता
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज स्थिति उल्टी हो गई है। मंदिरों में लोग भजन-कीर्तन करने के बजाय आपसी चर्चा, आलोचना और घरेलू विषयों में समय बिताते हैं।उन्होंने विशेष रूप से कहा कि कई माताएं भजन के लिए आती हैं, लेकिन वहां बैठकर संसार की बातें करती हैं, जिससे मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है।
मंदिरों का राजनीतिकरण – एक चिंता
संत अभयदास महाराज ने यह भी कहा कि कई स्थानों पर मंदिर राजनीति के केंद्र बनते जा रहे हैं, जो सनातन संस्कृति के लिए उचित नहीं है।उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थानों को केवल आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र ही बने रहना चाहिए।
आत्मचिंतन और कर्मों का लेखा-जोखा
संत ने अपने प्रवचन में एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन का “मेहता” यानी अकाउंटेंट स्वयं बनना चाहिए।उन्होंने कहा कि:
- जीवन में किए गए कर्मों का हिसाब स्वयं रखें
- आत्मनिरीक्षण करें
- अपने व्यवहार और सोच पर ध्यान दें
यह आत्मचिंतन ही जीवन को सफल और सार्थक बनाता है।
भजन के माध्यम से दिया संदेश
एक गुजराती भजन के माध्यम से संत अभयदास महाराज ने समझाया कि मृत्यु के बाद भले ही परमात्मा हमारे कर्मों का हिसाब करेगा, लेकिन यदि हम जीवन में ही जागरूक होकर अपने कर्मों के साक्षी बन जाएं, तो जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो सकता है।
आयोजन में उपस्थित गणमान्य नागरिक
इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
मुख्य रूप से उपस्थित रहे:
प्रेमाराम बंजारा, गेमाराम परमार, चम्पालाल शर्मा, पहाड़सिंह राव, दिनेश दवे, श्याम लाल दवे, नेनाराम चौहान, श्यामलाल खेतावत, कपूराराम जीनगर, निरंजन व्यास, वेलाराम घाची, सुरम सिंह, कालुराम परमार, जगदीश जाट, सालूराम देवासी, बगदाराम, मनोज गुप्ता, पारस घाची, कन्हैयालाल खण्डेलवाल, जयरूप राम माली, दिनेश सोनी चाटवाड़ा, कोलचन्द सोनी, रमेश सोनी, भारताराम सुंदेशा, जोरावर सिंह सियाणा, अरविंद बंजारा, पारस बंजारा, भावेश बंजारा, शारदा कंवर, गायत्री दवे, राजदुलारी खेतावत, हुआ देवी जाट, मुंगी देवी, लहरी देवी, मधु बंजारा सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से संदेश का महत्व
संत अभयदास महाराज का यह संदेश आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
जब व्यक्ति बाहरी दुनिया में उलझा रहता है, तब उसे अपने भीतर झांकने की आवश्यकता होती है।मंदिर हमें यही सिखाते हैं:
- आत्मज्ञान
- आत्मनिरीक्षण
- आत्मशांति
निष्कर्ष
संत अभयदास महाराज भागवत कथा भीनमाल का यह संदेश हमें यह समझाता है कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि आत्मिक यात्रा का माध्यम है।यदि हम मंदिरों का सही उपयोग करें और अपने भीतर झांकना सीख लें, तो जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।

