khargone के बेड़िया में अनोखी लोक परंपरा: माता का मायका-ससुराल, 2053 तक एडवांस बुकिंग की जा रही है
khargone । गणगौर के पर्व के अवसर पर निमाड़ अंचल में हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। खरगोन जिले के बेड़िया क्षेत्र में इस बार गणगौर के पर्व को लेकर एक अनोखी और अद्भुत परंपरा ने लोगों का ध्यान खींचा। यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी अंचल की पहचान बन चुकी है।
khargone जिले के बेड़िया क्षेत्र में माता की बाड़ी को साढ़े सात गांवों के मायके और शेष गांवों के ससुराल में विभाजित किया गया है। विशेष बात यह है कि मायके और ससुराल दोनों स्थानों पर बाड़ी एक दिन के अंतराल से खोली जाती है। मायके के गांवों में माता की बाड़ी पहले खोली जाती है, और इस वर्ष शुक्रवार को यही परंपरा निभाई गई। वहीं, ससुराल के गांवों में माता की बाड़ी शनिवार को खुली। इस प्रकार श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए दोनों स्थानों का अलग-अलग दिन आते हैं, जिससे उनकी आस्था और श्रद्धा को विशेष महत्व मिलता है।
माता का पारिवारिक रिश्ता
स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार, देवी माता का बेड़िया और उसके आसपास के साढ़े सात गांवों से गहरा पारिवारिक रिश्ता है। इन गांवों को माता का मायका माना जाता है। वहीं, ग्राम अंजरूद समेत अन्य साढ़े सात गांव उनके ससुराल के रूप में प्रतिष्ठित हैं। परंपरा के अनुसार माता पहले अपने मायके के गांवों में समय व्यतीत करती हैं और भक्तों को दर्शन देती हैं। अगले दिन माता ससुराल के गांवों में जाती हैं और वहां के लोगों से मिलती हैं।
श्री रेवा गुर्जर समाज के निर्धर शिक्षा कोष अध्यक्ष रामू सेठ ने बताया कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। ग्रामीण इसे पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ निभाते हैं। उनका कहना है कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि सामाजिक संबंधों और सामुदायिक भावना को जोड़ने वाली परंपरा भी है। यह परंपरा न केवल महिलाओं और पुरुषों के बीच सांस्कृतिक और पारिवारिक बंधन मजबूत करती है, बल्कि अंचल की सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखती है।
एडवांस बुकिंग की अनूठी व्यवस्था
khargone जिले में गणगौर पर्व के समय माता की बाड़ी के दर्शन के लिए एडवांस बुकिंग का प्रावधान भी है, जो इस परंपरा की अनूठी विशेषता है। यहां श्रद्धालु अगले कई वर्षों तक की बाड़ी खोलने की बुकिंग कर सकते हैं। वर्तमान में बताया गया है कि यहां 2053 तक की बुकिंग की जा चुकी है, जिससे यह परंपरा कितनी गंभीर और व्यवस्थित है, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। यह व्यवस्था न केवल भक्तों को सुनिश्चित समय पर माता के दर्शन का अवसर देती है, बल्कि आयोजन में व्यवस्था और अनुशासन भी बनाए रखती है।
गणगौर पर्व की विशेषता और लोक रंग
निमाड़ अंचल में गणगौर केवल देवी के उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति का प्रतिबिंब भी है। बेड़िया क्षेत्र की इस परंपरा में देखा गया कि महिलाएं और पुरुष दोनों ही देवी के उत्सव में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। लोग फूल, दीप और विशेष प्रसाद के साथ माता की बाड़ी के दर्शन करने आते हैं। इस दौरान लोकगीत, भजन, कीर्तन और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ भी आयोजित की जाती हैं।
स्थानीय लोगों की श्रद्धा और अनुभव
श्रद्धालु इस परंपरा को लेकर विशेष उत्साह और भक्ति भाव रखते हैं। उनके लिए यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक एकता को भी मजबूत करने वाला अवसर है। गांवों के लोग अपने परिवार, मित्र और समाजजनों के साथ समयपूर्वक बाड़ी में पहुंचते हैं। माताजी के दर्शन करने का अनुभव उन्हें आध्यात्मिक तृप्ति के साथ-साथ मानसिक शांति भी प्रदान करता है।
रामू सेठ ने बताया कि परंपरा के अनुसार प्रत्येक गांव के लोग अपने स्थानीय रीति-रिवाज और सांस्कृतिक प्रथाओं के अनुसार गणगौर की तैयारी करते हैं। इसे देखने और भाग लेने के लिए दूर-दराज के लोग भी इस क्षेत्र में आते हैं। इस प्रकार यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है।
समारोह और सामाजिक महत्व
बेड़िया और आसपास के गांवों में यह आयोजन ग्रामीण जीवन का अविभाज्य हिस्सा बन चुका है। माता के मायके और ससुराल के बीच एक दिन का अंतराल रखने की परंपरा न केवल भक्तों के लिए उत्सव को रोचक बनाती है, बल्कि यह सामाजिक तालमेल और गांवों के बीच सामुदायिक संबंधों को भी मजबूती प्रदान करती है।
इस अनोखी परंपरा में ग्रामीणों की श्रद्धा, भक्ति और लोक संस्कृति के रंग स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। प्रत्येक वर्ष गणगौर के अवसर पर यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह क्षेत्रीय लोक संस्कृति की जीवंतता का प्रतीक भी बन चुका है।
