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NATO में मतभेद गहराए, ईरान मुद्दे पर यूरोप ने नहीं दिया अमेरिका का साथ

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Published On: 16 March 2026
NATO
— NATO-Ukraine Council Working Dinner in Foreign Ministers’ session NATO/OTAN Summit 2025 I June 24, 2025 Foreign Affairs ministers meet for a working dinner of the NATO-Ukraine Council during the NATO Summit 2025. Tijdens de NAVO-top 2025 komen de ministers van Buitenlandse Zaken bijeen voor een werkdiner van de NATO-Ukraine Council.

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ईरान युद्ध में अमेरिका पड़ा अकेला? यूरोपीय देशों ने क्यों खींचे हाथ, ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी में दिखी दरार

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ी गई जंग का असर अब केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहा है। इसका सीधा असर दशकों पुरानी अमेरिका-यूरोप ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी पर भी दिखाई देने लगा है। पहली बार ऐसा माहौल बनता दिख रहा है जब कई प्रमुख यूरोपीय देशों ने अमेरिका के सैन्य अभियान से दूरी बना ली है। जर्मनी, इटली, स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की प्रतिक्रिया से यह साफ संकेत मिल रहा है कि पश्चिमी दुनिया की पारंपरिक एकता अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया ने एक ही तस्वीर देखी थी—जब भी अमेरिका ने युद्ध छेड़ा, यूरोपीय देश अक्सर NATO के बैनर तले उसके साथ खड़े दिखाई दिए। 1990 का खाड़ी युद्ध, 2001 का अफगानिस्तान अभियान और 2003 का इराक युद्ध इसके प्रमुख उदाहरण हैं। लेकिन ईरान के मामले में तस्वीर बदली हुई नजर आ रही है। इस बार अमेरिका और उसका करीबी सहयोगी इजरायल कूटनीतिक रूप से काफी हद तक अकेले दिखाई दे रहे हैं।

यूरोप का बदला हुआ रवैया

यूरोपीय देशों का यह रुख अचानक नहीं आया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह दरार लंबे समय से बन रही थी, जो अब खुलकर सामने आ गई है। अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति, व्यापारिक टैरिफ, नाटो को लेकर दबाव और ग्रीनलैंड विवाद जैसे मुद्दों ने यूरोप में असंतोष पैदा किया है।

जब ट्रंप ने दूसरी बार राष्ट्रपति पद संभाला तो उन्होंने साफ कहा था कि अगर यूरोप को नाटो में अमेरिका का साथ चाहिए तो उसे रक्षा खर्च बढ़ाना होगा। उन्होंने कई बार यूरोपीय देशों को चेतावनी दी कि अमेरिका अब अकेले भी दुनिया में अपना प्रभाव बनाए रखने में सक्षम है। इन बयानों ने यूरोप में यह भावना मजबूत कर दी कि अमेरिका अब साझेदार की तरह नहीं बल्कि नेतृत्व थोपने की कोशिश कर रहा है।

जर्मनी: युद्ध से दूरी

ईरान युद्ध को लेकर जर्मनी का रुख सबसे स्पष्ट माना जा रहा है। भारत में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर जर्मनी के राजदूत ने कहा कि उनका देश इस युद्ध में शामिल होने का इरादा नहीं रखता। जर्मनी पहले से ही ऊर्जा संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि अगर ईरान के साथ युद्ध बढ़ता है तो इसका सीधा असर यूरोप की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा। जर्मनी के लिए यह स्थिति आर्थिक संकट को और गहरा कर सकती है। यही वजह है कि बर्लिन इस संघर्ष से दूर रहना चाहता है।

इटली: अंतरराष्ट्रीय कानून की बात

इटली, जो लंबे समय से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है, उसने भी इस बार सतर्क रुख अपनाया है। इटली का कहना है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम चिंता का विषय जरूर है, लेकिन बिना अंतरराष्ट्रीय सहमति के किया गया हमला वैश्विक नियमों को कमजोर कर सकता है।

इटली ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके सैन्य अड्डों का इस्तेमाल केवल लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए किया जा सकता है, न कि हमले के लिए।

स्पेन: युद्ध के खिलाफ स्पष्ट रुख

स्पेन ने इस मुद्दे पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी है। स्पेन के नेतृत्व ने युद्ध को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है और शांति का रास्ता अपनाने की अपील की है। स्पेन का मानना है कि एक और बड़ा युद्ध यूरोप और मध्य-पूर्व दोनों के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

फ्रांस और ब्रिटेन की सावधानी

फ्रांस और ब्रिटेन परंपरागत रूप से अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते हैं। लेकिन इस बार दोनों देशों का रुख अपेक्षाकृत सावधान नजर आ रहा है।

फ्रांस के राष्ट्रपति ने संकेत दिया है कि उनका देश ईरान के खिलाफ किसी आक्रामक सैन्य अभियान का समर्थन नहीं करेगा। हालांकि फ्रांस ने अपने हितों की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बनाए रखी है।

वहीं ब्रिटेन ने भी साफ किया है कि वह शुरुआती हमलों में शामिल नहीं था और फिलहाल इस संघर्ष में शामिल होने की कोई योजना नहीं है। ब्रिटेन में आर्थिक चुनौतियां और जनता का दबाव भी सरकार के फैसलों को प्रभावित कर रहा है।

NATO की सीमित भूमिका

ईरान संकट के दौरान नाटो की भूमिका भी सीमित दिखाई दे रही है। संगठन के महासचिव ने कहा है कि नाटो का मुख्य उद्देश्य अपने सदस्य देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। ईरान के खिलाफ किसी बड़े सैन्य अभियान में नाटो की सीधी भागीदारी की योजना फिलहाल नहीं है।

इस बयान से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अमेरिका इस संघर्ष में नाटो के पूरे समर्थन पर भरोसा नहीं कर सकता।

ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया

यूरोपीय देशों के इस रवैये पर राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि जब अमेरिका नाटो के लिए खड़ा रहता है तो यूरोप को भी संकट के समय उसका साथ देना चाहिए।

उन्होंने कुछ देशों पर व्यापारिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी भी दी है। ट्रंप का तर्क है कि अगर यूरोप अमेरिका के सैन्य अभियानों में साथ नहीं देता तो भविष्य में अमेरिका भी यूरोप की सुरक्षा के लिए उतनी तत्परता नहीं दिखा सकता।

ग्रीनलैंड विवाद का असर

अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ने के पीछे ग्रीनलैंड विवाद भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। जब अमेरिका ने डेनमार्क के नियंत्रण वाले ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा जताई थी, तब यूरोप के कई देशों ने इसे असहज कदम माना था।

इस घटना ने यूरोपीय देशों को यह सोचने पर मजबूर किया कि अमेरिका के साथ उनकी साझेदारी किस दिशा में जा रही है।

बदलती वैश्विक राजनीति

आज की दुनिया पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है। चीन, भारत और रूस जैसी शक्तियों के उभरने से वैश्विक राजनीति अब बहुध्रुवीय हो गई है। ऐसे में यूरोप भी अपनी स्वतंत्र रणनीति बनाना चाहता है।

यूरोपीय संघ लंबे समय से ‘स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी’ यानी रणनीतिक स्वतंत्रता की बात करता रहा है। ईरान संकट के दौरान उसका रवैया इसी दिशा में एक संकेत माना जा रहा है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर

युद्ध का असर केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। तेल की कीमतें, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार युद्ध की स्थिति में प्रभावित होते हैं।

अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है तो दुनिया की बड़ी तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।

नए विश्व व्यवस्था की आहट

ईरान संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिमी देशों की एकता अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। अमेरिका और यूरोप के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भविष्य में वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकती है। यूरोप धीरे-धीरे अधिक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है, जबकि अमेरिका अपनी अलग रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है।

आगे क्या होगा?

फिलहाल स्थिति काफी जटिल बनी हुई है। एक तरफ अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए हुए है, तो दूसरी ओर यूरोपीय देश युद्ध से दूरी बनाकर कूटनीतिक समाधान पर जोर दे रहे हैं।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती दूरी अस्थायी है या फिर यह पश्चिमी गठबंधन की राजनीति में एक स्थायी बदलाव का संकेत है।

ईरान युद्ध ने कम से कम इतना तो साफ कर दिया है कि वैश्विक राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां पुराने गठबंधन और समीकरण तेजी से बदल रहे हैं।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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