MP विधानसभा में उच्च शिक्षा पर सरकार दो मोर्चों पर घिरी:
भोपाल: MP विधानसभा में उच्च शिक्षा को लेकर सरकार को एक साथ दो गंभीर मुद्दों पर जवाब देना पड़ा। यह दोनों मुद्दे राज्य की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े थे। विधानसभा सत्र में कांग्रेस और बीजेपी दोनों पक्षों ने सरकार से जवाब मांगा।
140 शैक्षणिक पद रिक्त
सबसे पहले चर्चा क्रांतिसूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय, खरगोन के शैक्षणिक पदों की रिक्तता पर हुई। कांग्रेस विधायक डॉ. झूमा सोलंकी ने सदन में प्रश्न उठाया कि विश्वविद्यालय में वर्तमान में कितने पद भरे गए हैं और रिक्त पदों को भरने की समय-सीमा क्या है।
उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने बताया कि विश्वविद्यालय में कुल 140 शैक्षणिक पद स्वीकृत हैं—सहायक प्राध्यापक के 80, सह-प्राध्यापक के 40 और प्राध्यापक के 20 पद। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि सभी पद रिक्त हैं।
इस खुलासे के बाद विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब विश्वविद्यालय में एक भी नियमित शिक्षक नहीं है, तो शैक्षणिक गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि स्नातक स्तर पर कृषि, कला, वाणिज्य (कंप्यूटर) और विज्ञान (कंप्यूटर) के पाठ्यक्रम संचालित हैं। स्नातकोत्तर स्तर पर अर्थशास्त्र पाठ्यक्रम चलाए जा रहे हैं। फिलहाल नियमित नियुक्तियों की कमी के कारण कुछ शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर भेजकर कार्य चलाया जा रहा है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि रिक्त पदों की पूर्ति की कोई निश्चित समय-सीमा अभी तय नहीं की जा सकती है। यह बात विपक्ष के लिए चिंता का विषय बनी, क्योंकि बिना नियमित शिक्षकों के विश्वविद्यालय में पढ़ाई की गुणवत्ता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
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27.50 करोड़ रुपये के निर्माण भुगतान पर बहस
सत्र के दौरान दूसरा मुद्दा महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, छतरपुर में निर्माण कार्यों के लिए किए गए 27.50 करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर उठा। बीजेपी विधायक ललिता यादव ने सवाल किया कि कुलपति निवास, प्रशासनिक भवन और बाउंड्री वॉल निर्माण के लिए कुलसचिव द्वारा किए गए भुगतान की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठता है।
मंत्री इंदर सिंह परमार ने बताया कि कुलपति निवास और प्रशासनिक भवन के लिए 17 करोड़ रुपये तथा बाउंड्री वॉल, गेट और गार्ड रूम के लिए 10.50 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पूरी राशि लोक निर्माण विभाग (पीआईयू), जिला छतरपुर को हस्तांतरित की गई है।
मंत्री ने यह भी बताया कि अकादमिक भवन निर्माण के लिए कोई भुगतान नहीं किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुलसचिव ने अपने अधिकारों के अंतर्गत भुगतान किया है और किसी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ। कार्य परिषद केवल प्रस्ताव पारित कर अनुमोदन देने का अधिकार रखती है, लेकिन वित्तीय हस्ताक्षर का अधिकार नहीं।
विपक्ष ने जांच की मांग की
इस पर ललिता यादव ने मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की। मंत्री ने जवाब दिया कि अभी तक कोई अनियमितता सामने नहीं आई है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर जांच कराई जा सकती है।
विपक्ष ने इस मुद्दे को राज्य में शैक्षणिक वित्तीय पारदर्शिता और विश्वविद्यालयों में सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठाने का अवसर माना।
उच्च शिक्षा पर सरकार की स्थिति
उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि राज्य सरकार शैक्षणिक गुणवत्ता और वित्तीय पारदर्शिता दोनों को सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया में समय लग सकता है और इस बीच प्रतिनियुक्ति प्रणाली से पढ़ाई जारी रखी जा रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में निर्माण कार्य और भुगतान सभी नियमों के अनुसार किए गए हैं। किसी भी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है।
विपक्ष की चिंता और सवाल
विपक्ष के अनुसार, विश्वविद्यालय में 140 शैक्षणिक पदों का रिक्त होना छात्रों और शैक्षणिक गुणवत्ता दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बिना नियमित शिक्षक, विश्वविद्यालय में पढ़ाई और अनुसंधान की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
साथ ही 27.50 करोड़ रुपये के निर्माण भुगतान पर बहस ने यह सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन में सख्त वित्तीय निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा रही है या नहीं।
निष्कर्ष
MP विधानसभा में उच्च शिक्षा को लेकर यह बहस दर्शाती है कि राज्य की शिक्षा नीतियों और विश्वविद्यालय प्रशासन में दोहरी चुनौती है:
- शैक्षणिक पदों की रिक्तता और गुणवत्ता बनाए रखना।
- निर्माण कार्यों और वित्तीय भुगतान में पारदर्शिता सुनिश्चित करना।
सरकार को इस सत्र में दोनों मुद्दों पर जवाब देना पड़ा। विपक्ष ने सवाल उठाए और जांच की मांग की। इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और निगरानी की आवश्यकता है।
उच्च शिक्षा मंत्री ने रिक्त पदों की पूर्ति और निर्माण भुगतान की वैधता पर सरकार की स्थिति स्पष्ट की, लेकिन सत्र में उठाए गए सवालों ने शिक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर कई चुनौतियों को उजागर किया।
