इंदौर में आर्यिका विहार श्री माताजी का समाधि मरण, समाज ने दी भावपूर्ण विन्याजलि
संवाददाता: राजेश जैन दद्दू
इंदौर
समाधि मरण का आध्यात्मिक महत्व
आर्यिका विहार श्री माताजी समाधि मरण की पावन घटना ने इंदौर के धार्मिक वातावरण को गहन आध्यात्मिक भावनाओं से भर दिया। जैन दर्शन में समाधि मरण को जीवन की सर्वोच्च साधना माना गया है—जहाँ साधक पूर्ण जागरूकता, वैराग्य और आत्मसंयम के साथ शरीर का परित्याग करता है।
यह केवल मृत्यु नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मोक्षमार्ग की ओर सजग प्रस्थान है।
दीक्षा से समाधि तक की तपस्या यात्रा
पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज की आज्ञानुवर्ती शिष्या
श्रद्धेय श्रीमती शकुंतला बाकलीवाल ने श्रमणी आर्यिका 105 विदक्षाश्री माताजी के पावन हस्तकमलों से जैनैश्वरी आर्यिका दीक्षा अंगीकार की थी।दीक्षा के उपरांत उन्हें नव मंगल नाम आर्यिका 105 विहार श्री माताजी प्राप्त हुआ।उनका जीवन संयम, साधना, त्याग और धर्मप्रचार को समर्पित रहा।धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि माताजी ने पूर्ण आत्मस्मृति के साथ उत्तम समाधि मरण को अंगीकार किया—जो जैन साधना की सर्वोच्च अवस्था मानी जाती है।
इंदौर जैन समाज ने दी श्रद्धांजलि
आर्यिका विहार श्री माताजी समाधि मरण के उपलक्ष्य में इंदौर नगर का संपूर्ण दिगंबर जैन समाज श्रद्धा से नतमस्तक हुआ।
श्रद्धांजलि अर्पित करने वालों में प्रमुख रूप से उपस्थित रहे:
- श्री अमित कासलीवाल
- सुशील पांड्या
- डॉ. जैनेन्द्र जैन
- हंसमुख गांधी
- टीके वेद
- नवीन गोधा
- मयंक जैन
- धर्म समाज के अनेक गणमान्य सदस्य
सभी ने माताजी के मोक्षगामी व्यक्तित्व को विनम्र श्रद्धा-सुमन अर्पित किए।
समाधि मरण क्यों माना जाता है सर्वोच्च साधना
जैन आगमों के अनुसार समाधि मरण का अर्थ है—
- राग-द्वेष का पूर्ण त्याग
- देह से विरक्ति
- आत्मा में स्थित होना
- जागरूकता के साथ अंतिम क्षण स्वीकारना
- कर्म निर्जरा की चरम साधना
आर्यिका विहार श्री माताजी समाधि मरण इसी आध्यात्मिक आदर्श का जीवंत उदाहरण है।
यह घटना बताती है कि साधना केवल प्रवचन नहीं—जीवन की अंतिम श्वास तक अनुशासन है।
समाज के लिए प्रेरणा का संदेश
आज के भौतिकवादी युग में आर्यिका विहार श्री माताजी समाधि मरण समाज को तीन महत्वपूर्ण संदेश देता है:
1. संयम ही वास्तविक शक्ति है
भोग नहीं, त्याग आत्मबल देता है।
2. धर्म जीवन जीने की पद्धति है
यह केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यवहार है।
3. मृत्यु भी साधना बन सकती है
यदि जीवन जागरूकता से जिया जाए।
आध्यात्मिक वातावरण से भाव-विभोर हुआ इंदौर
धर्म समाज के अनुसार,
“ऐसे विरक्त संतों का जीवन समाज को दिशा देता है, और उनका समाधि मरण आत्मकल्याण का महापर्व होता है।”
निष्कर्ष – विरक्ति से मोक्षमार्ग की ओर
आर्यिका विहार श्री माताजी समाधि मरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का प्रकाशस्तंभ है।
उनका जीवन और समाधि—दोनों ही साधना, समर्पण और आत्मोन्नति का संदेश देते हैं।इंदौर का जैन समाज उन्हें विनम्र विन्याजलि अर्पित करते हुए यही प्रार्थना करता है—
उनकी तपस्या से समाज में धर्म, संयम और आत्मजागृति का प्रकाश निरंतर फैलता रहे।
