Nagda में यूजीसी संशोधित कानून पर प्रस्तावित बैठक स्थगित सुप्रीम कोर्ट की 19 मार्च की सुनवाई के बाद होगा अगला फैसला
सवर्ण और ओबीसी समाज ने जताई चिंता
बैठक स्थगित होने की सूचना के साथ ही Nagda के सवर्ण एवं ओबीसी समाज के सदस्यों ने यूजीसी से जुड़े संशोधित कानून को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। समाजजनों का कहना है कि यदि किसी कानून के दुरुपयोग की संभावना हो और वह समाज में जातिवाद या वर्ग विभाजन को बढ़ावा देता हो, तो उस पर पुनर्विचार आवश्यक है। शिक्षा का क्षेत्र समाज को जोड़ने का माध्यम होना चाहिए, न कि नए मतभेद और टकराव पैदा करने का कारण। समाज के लोगों ने कहा कि किसी भी नियम या कानून का उद्देश्य योग्यता, समान अवसर और पारदर्शिता को बढ़ावा देना होना चाहिए। यदि संशोधित प्रावधानों से सामाजिक सद्भाव प्रभावित होने की आशंका है, तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा
यूजीसी प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई को समाजजनों ने सकारात्मक कदम बताया है। उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ही इस विषय में संतुलित और निष्पक्ष निर्णय देने में सक्षम है। समाज के प्रतिनिधियों का मानना है कि कोर्ट के निर्णय से स्थिति स्पष्ट होगी और सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित दिशा तय हो सकेगी। समाजजनों ने यह भी कहा कि वे किसी भी प्रकार के टकराव या अव्यवस्था के पक्ष में नहीं हैं और कानून के दायरे में रहते हुए अपनी बात रखना चाहते हैं।
पहले भी हो चुकी हैं बैठकें, उठी थीं आपत्तियां
गौरतलब है कि इससे पूर्व Nagda 26 जनवरी को सायं 7:00 बजे विश्वकर्मा मंदिर में नगरवासियों, समाज अध्यक्षों और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की एक बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में यूजीसी के संशोधित नियमों को लेकर विस्तार से चर्चा की गई थी। वक्ताओं ने आशंका जताई थी कि यदि ये नियम लागू होते हैं और उनका दुरुपयोग होता है, तो इससे सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंच सकता है। इसी क्रम में 30 जनवरी को औदीच्य धर्मशाला में आयोजित होने वाली यूजीसी विषयक समाज की बैठक को भी निरस्त कर दिया गया था। लगातार बैठकों के स्थगन से यह स्पष्ट होता है कि समाज इस विषय पर कोई भी कदम सोच-समझकर और कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए उठाना चाहता है।
