तीर्थराज सम्मेद शिखर पावनता संकट पर गंभीर चिंतन। जैन तीर्थों की पवित्रता, संरक्षण और धार्मिक अस्मिता बचाने की सशक्त आवाज।
तीर्थराज सम्मेद शिखर पावनता संकट: भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर पर गहराता खतरा
तीर्थराज सम्मेद शिखर पावनता संकट आज केवल जैन समाज का नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का गंभीर प्रश्न बन चुका है।
प्राचीन तीर्थ स्थल भारतीय सभ्यता की आत्मा होते हैं। उनकी रक्षा, सुरक्षा और पवित्रता बनाए रखना हमारा परम कर्तव्य है।
“कलयुग की ये कैसी बलिहारी है,
पाप और अत्याचार तीर्थ स्थलों पर पड़ रहे भारी हैं।”
पारस जैन “पार्श्वमणि”
पत्रकार, कोटा (राज.)
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी
सम्मेद शिखर जी: मोक्ष और निर्वाण की दिव्य भूमि
गिरीडीह (झारखंड) स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह पावन धरा — तीर्थराज सम्मेद शिखर जी, जहाँ से 20 तीर्थंकरों ने निर्वाण प्राप्त किया, जैन धर्म की आत्मा है।
“एक बार बंदे जो कोई ताहि,
नरक पशुपति नहीं होहि।”
इस भूमि का कण-कण पूजनीय, वंदनीय और अभिनंदनीय है। यह वह स्थान है जहाँ अनंत भव्य आत्माओं ने तप, त्याग और संयम के माध्यम से संसार बंधनों से मुक्ति पाई।
तीर्थराज सम्मेद शिखर पावनता संकट की भयावह सच्चाई
हर वर्ष 14 और 15 फरवरी को लाखों की संख्या में लोग पर्यटन के नाम पर पर्वत पर चढ़ते हैं।
इन दिनों —
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जैन श्रद्धालुओं को वंदना से रोका जाता है
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पर्वत पर कचरा, गंदगी और अपवित्र गतिविधियाँ होती हैं
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नशीले पदार्थों का सेवन तक देखा जाता है
यह सब घोर पाप का बंध है।
प्रकृति से खिलवाड़ और चेतावनी
जब-जब मानव ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है,
तब-तब प्रकृति ने अपना तांडव दिखाया है।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी इसका उदाहरण है —
जिसने हमें सादगी और संयम का पाठ पढ़ाया।
जैन समाज: मूक दर्शक क्यों?
पूरे भारतवर्ष का जैन समाज आज इस संकट को देखकर भी मौन है।
यह केवल शर्मनाक नहीं, बल्कि आत्ममंथन का समय है।
आज तक किसी भी जैन समुदाय ने किसी अन्य धर्मस्थल पर अवैध कब्जा नहीं किया,
तो फिर हमारे सिद्ध क्षेत्र, अतिशय क्षेत्र और तीर्थ क्षेत्र क्यों निशाने पर हैं?
स्पष्ट समाधान और मांग
मुख्य मांगें
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तीर्थराज सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल नहीं, जैन तीर्थ घोषित किया जाए
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तीर्थ क्षेत्र में बाउंड्री वॉल का निर्माण
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अपवित्र गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध
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तीर्थ की प्राचीनता, पावनता और प्रमाणिकता अक्षुण्ण रहे
“तीर्थ बचाओ – धर्म बचाओ”
यही आज का मंत्र है।
शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी
यह केवल समाज की नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे इस विषय को गंभीरता से लें।
समापन: एक आत्मीय निवेदन
मैं, पारस जैन “पार्श्वमणि” राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पत्रकार, कोटा (राज.) देश की समस्त जैन संस्थाओं, तीर्थ क्षेत्र कमेटियों और प्रतिनिधि मंडलों से हृदय की गहराइयों से निवेदन करता हूँ कि इस विषय को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। यह समय की सबसे बड़ी चुनौती है।📞 9414764980
