गुरुकृपा से ही श्रुत ज्ञान पढ़ने–पढ़ाने का अवसर मिला: निखिलशीलाजी
थांदला। Jain दर्शन श्रुत ज्ञान की महिमा से परिपूर्ण है। सर्वज्ञ, केवलज्ञानी जिनेश्वर भगवान की दिव्य वाणी को उनके शिष्य एवं 14 पूर्वधर स्थविर गुरुभगवंतों ने सूत्र रूप में संकलित किया, जिसे द्वादशांगी कहा जाता है। यही श्रुत परंपरा कालांतर में आचार्यों के माध्यम से आज तक अक्षुण्ण रूप से चली आ रही है। जैन आगम साहित्य वास्तव में एक ऐसा आध्यात्मिक रत्नाकर है, जिसमें ज्ञान, विवेक, संयम और मोक्ष के अमूल्य रत्न समाहित हैं। साधक जितनी गहराई से इस रत्नाकर में डुबकी लगाता है, उतना ही वह आत्मकल्याण के दुर्लभ रत्न प्राप्त करता है।
भगवती सूत्र: जैन आगम साहित्य का ज्ञानकोष
Jain आगमों में पाँचवाँ अंगसूत्र विवाहप्रज्ञप्ति, जिसे सामान्यतः भगवती सूत्र कहा जाता है, का विशेष महत्व है। जनमानस में इसकी अपार श्रद्धा है, क्योंकि यह Jain दर्शन को गहराई से समझने और तत्वज्ञान का सूक्ष्म, तलस्पर्शी अध्ययन कराने वाला प्रमुख आगम है।
भगवती सूत्र में श्रमण भगवान महावीर स्वामी और उनके प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम स्वामी के मध्य, साथ ही जयंती श्राविका एवं अन्य जिज्ञासु आत्माओं के साथ हुए लगभग 36 हजार प्रश्नोत्तर सरल, सहज संवाद शैली में वर्णित हैं। इसमें कर्म सिद्धांत, जीव-अजीव तत्व, आत्मा की विभिन्न अवस्थाएं, स्व-पर मत का विवेचन तथा अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों का समावेश है।
थांदला में पाँच माह चली भगवती सूत्र की वाचनी
जिन शासन गौरव जैनाचार्य पूज्य गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म.सा. ‘अणु’ की दिव्य कृपा एवं पूज्य श्री धर्मदास गण नायक, बुद्धपुत्र प्रवर्तक देव पूज्य श्री जिनेन्द्रमुनिजी म.सा. के आशीर्वाद से उनकी आज्ञानुवर्ती महासती पूज्याश्री निखिलशीलाजी म.सा., पूज्याश्री दिव्यशीलाजी म.सा., पूज्याश्री प्रियशीलाजी म.सा. एवं पूज्याश्री दीप्तिजी म.सा. ठाणा-4 पिछले आठ वर्षों से थांदला में सकारण स्थिर होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं।
इस अवधि में नगर के श्रावक-श्राविकाओं को नियमित रूप से दर्शन-वंदन, पर्युपासना और जिनवाणी श्रवण का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। 11 अंगसूत्रों के प्रथम चार अंगों की वाचनी सम्पन्न करने के पश्चात, जैन दर्शन के सबसे विशाल आगम भगवती सूत्र का वाचन लगभग पाँच माह की अवधि में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
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138 शतक, 1925 उद्देशक और 84 लाख पदों का अद्भुत ग्रंथ
भगवती सूत्र में कुल 138 शतक, 1925 उद्देशक, 15,752 गाथाएं और लगभग 84 लाख पद समाहित हैं। इसकी विशालता और विषय-विस्तार को देखते हुए इसे यदि जैन ज्ञान का विश्वकोष कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इस आगम के माध्यम से साधकों को कर्म सिद्धांत की गहन समझ, जीव की सूक्ष्म अवस्थाओं का बोध और मोक्ष मार्ग का स्पष्ट दर्शन प्राप्त होता है। यही कारण है कि आज लगभग प्रत्येक संत-सती, जैन एवं जैनोत्तर बंधुओं को जिनवाणी का रसास्वादन कराने के लिए भगवती सूत्र का आलंबन लेते हैं।
“यह सब गुरुकृपा का ही फल है” – महासती निखिलशीलाजी
भगवती सूत्र की वाचनी सम्पन्नता पर महासती पूज्याश्री निखिलशीलाजी म.सा. ने इस सम्पूर्ण श्रुत ज्ञानामृत का श्रेय अपने पूज्य गुरुभगवंतों, प्रवर्तक देव तथा समस्त वरिष्ठ गुरु-गुरुणियों को देते हुए कहा—
“आज उनकी कृपा और छत्रछाया में ही हमें इस अनुपम श्रुत ज्ञान को पढ़ने और पढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। श्रुत ज्ञान आत्मा के लिए प्रकाश स्तंभ है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।”
उन्होंने कहा कि जीव के लिए आश्रव से संसार और संवर से मोक्ष के द्वार खुलते हैं। यदि आत्मा आश्रव को हेय मानकर त्यागे और संवर को ज्ञेय व उपादेय मानकर यथासमय ग्रहण करे, साथ ही संवरवान आत्माओं का आदर-सत्कार करे, तो उसका आत्मकल्याण निश्चित है। यही मोक्ष का राजमार्ग है।
अब ज्ञाताधर्म कथा की वाचनी होगी प्रारंभ
Jain दर्शन में साधु-साध्वी एवं श्रावक-श्राविकाएं जिनेश्वर भगवान की वाणी को आगम रूप में स्वीकार करते आए हैं। स्थानकवासी संप्रदाय में दृष्टिवाद के विलुप्त हो जाने के बाद शेष 32 आगमों को मान्यता दी गई है, जिनमें 11 अंगसूत्र, 12 उपांग सूत्र, 4 छेद सूत्र, 4 मूल सूत्र और 1 आवश्यक सूत्र सम्मिलित हैं।
इन 11 अंगसूत्रों में अब छठे अंगसूत्र ‘ज्ञाताधर्म कथा’ की वाचनी प्रारंभ की जाएगी। यह आगम धर्म कथाओं के माध्यम से जीवन में धर्म, करुणा, संयम और नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता है।
प्रतिदिन जिनवाणी श्रवण का अनुपम अवसर
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया, सचिव हितेश शाह एवं संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने जानकारी देते हुए बताया कि गुरुभगवंतों के आशीर्वाद से थांदला को यह दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि यहाँ विराजित विदुषी महासती पूज्याश्री निखिलशीलाजी आदि ठाणा-4 आगम वाचनी को सरल और सहज रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
स्थानीय पौषध भवन में प्रतिदिन प्रातः 9:15 से 10:15 बजे तक जिनवाणी श्रवण का नियमित आयोजन हो रहा है। संघ ने सभी श्रावक-श्राविकाओं से आग्रह किया है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर इस अमूल्य अवसर का लाभ लें और अपने भव को सार्थक बनाएं।
निष्कर्ष
भगवती सूत्र की वाचनी का सम्पन्न होना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा के उत्थान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह आयोजन श्रद्धालुओं को श्रुत ज्ञान के माध्यम से आत्मबोध, संयम और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है। महासती निखिलशीलाजी एवं ठाणा-4 की यह सेवा थांदला नगर के लिए निश्चित ही गौरव और आध्यात्मिक सौभाग्य का विषय है।

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