मिथ्यात्व का निवारण दर्शन सम्पन्नता से होता है: साध्वी Nikhilshilaji
थांदला। पक्खी पर्व के अवसर पर आयोजित धार्मिक सभा में पूज्य साध्वी Nikhilshilaji म.सा. ने कहा कि वर्तमान समय में मिथ्यात्व का बोलबाला है और इसका निवारण केवल दर्शन सम्पन्नता से ही संभव है। ठांदला के आदि ठाणा-4 में आयोजित इस आयोजन में नगर के अनेक श्रद्धालु शामिल हुए और पूज्य साध्वी के मार्गदर्शन में सामूहिक उपवास और तप का आयोजन किया गया।
पक्खी पर्व पर सामूहिक उपवास और तप
पक्खी पर्व पर करीब 80 श्रावक-श्राविकाओं ने सामूहिक उपवास और तप किया। इस दौरान देवसीय प्रतिक्रमण का आयोजन भी किया गया, जिसमें पाप और अज्ञानता की आलोचना की गई।
पूज्य साध्वी निखिलशीलाजी ने इस अवसर पर कहा कि श्रमण भगवान महावीर स्वामी की अंतिम देशना “उत्तराध्ययन सूत्र” में वर्णित सम्यक्त्व पराक्रम के 67 बालों में दर्शन सम्पन्नता के भाव स्पष्ट रूप से उजागर किए गए हैं। उन्होंने बताया कि दर्शन और तत्वज्ञान से उत्पन्न सम्पन्नता ही मिथ्यात्व का निवारण करती है और जीव को भगवान से सम्यक्त की प्राप्ति दिलाती है।
साध्वी ने कहा,
“व्यक्ति जब दुःख या तनाव में होता है, वह चमत्कार और अंधी दौड़ में बहकर मिथ्यात्व के पीछे भागने लगता है। यह उसकी अज्ञानता का परिणाम है। जब तक जीव दुःख के पीछे लगे कर्मों का निवारण नहीं जानता, तब तक उसे दुःख से मुक्ति के वास्तविक उपायों पर श्रद्धा नहीं होती।”
इस प्रकार उन्होंने स्पष्ट किया कि मिथ्यात्व का निवारण केवल आध्यात्मिक दृष्टि और ज्ञान के माध्यम से संभव है।
मिथ्यात्व और उसके दुष्प्रभाव
साध्वी निखिलशीलाजी ने बताया कि आज के समय में मिथ्यात्व केवल व्यक्तिगत जीवन पर ही नहीं बल्कि समाज पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। लोग अक्सर भौतिक लालच, त्वरित सुख और दिखावे की दौड़ में मिथ्यात्व का शिकार हो जाते हैं।
उन्होंने समझाया कि जब व्यक्ति अपने दुःख के कारणों और कर्मों का सही ज्ञान प्राप्त करता है, तब वह मिथ्यात्व और अज्ञानता से मुक्त होता है।
“जिसने अपने मिथ्यात्व का निवारण कर लिया, उसने अपने भव का भी अंत कर लिया।” – साध्वी निखिलशीलाजी
इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि जीवन में सच्चे समाधान और मानसिक शांति केवल दर्शन और श्रद्धा से प्राप्त हो सकती है।
चेलना रानी का चरित्र और सामाजिक संदेश
कार्यक्रम में पूज्य प्रियशीलाजी म.सा. ने महासती चेलना रानी के चरित्र का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आजकल लड़कियां संस्कार और भलाई की बजाय आकर्षण में फंसकर बड़े निर्णय ले लेती हैं, जैसे घर से भागकर विवाह करना।
प्रियशीलाजी ने बताया कि ऐसे निर्णयों के परिणाम अक्सर गैर-सामाजिक और अपरिचित परिवेश में अनुशासन और आत्मसात की कमी के रूप में सामने आते हैं। चेलना रानी ने भी घर छोड़कर विवाह किया, परंतु पश्चाताप और उत्तम चारित्र के बल पर उन्होंने अपने गुनाहों का उद्धार किया।
संदेश यह है कि संस्कार और माता-पिता की आज्ञा के साथ चलना आवश्यक है और भौतिक चकाचौंध में फँसने से बचना चाहिए।
साध्वी और साध्वीजन ने यह उदाहरण युवाओं और महिलाओं के लिए एक सावधानी संदेश के रूप में प्रस्तुत किया।
वर्तमान समय में मिथ्यात्व और शिक्षा
साध्वी ने कहा कि आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास ने युवाओं के सामने अनेक विकल्प और चुनौतियाँ ला दी हैं।
- युवाओं में भौतिक आकर्षण और स्वतंत्रता की चाह अत्यधिक बढ़ गई है।
- बिना अनुभव और सही मार्गदर्शन के जल्दी निर्णय लेना उनके जीवन में समस्याएँ पैदा कर सकता है।
- परिवार और समाज का संस्कार और नैतिक शिक्षा आज भी महत्वपूर्ण है।
इस सन्दर्भ में साध्वी ने कहा कि धार्मिक और सामाजिक मूल्यों का पालन, और माता-पिता की आज्ञा में रहना, जीवन में स्थिरता और मानसिक शांति के लिए आवश्यक है।
उपवास, आयम्बिल और प्रत्याख्यान
पक्खी पर्व के अवसर पर अनेक धर्म आराधकों ने उपवास, आयम्बिल, निवि और एकासन जैसे तपों का पालन किया। इन तपों का पारण नेहा मनीष जैन परिवार द्वारा स्थानीय महावीर भवन में संपन्न कराया गया।
इस अवसर पर पूज्य साध्वी और साध्वीजन ने आराधकों को धार्मिक प्रवचन और आत्मा की उन्नति के उपाय बताए। सभी वर्षीतप, उपवास और प्रत्याख्यान से आराधकों ने आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।
सभा का संचालन संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने किया, जबकि जानकारी संघ प्रवक्ता पवन नाहर ने दी।
समाज और परिवार पर संदेश
साध्वी और पूज्य साध्वीजन ने इस अवसर पर सामाजिक संदेश भी दिया:
- मिथ्यात्व का निवारण केवल आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन से संभव है।
- परिवार और माता-पिता की आज्ञा में चलना जीवन के लिए स्थिरता और सुरक्षा देता है।
- भौतिक आकर्षण और त्वरित निर्णय जीवन के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
- धार्मिक आयोजन, सामूहिक उपवास और प्रत्याख्यान से आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
साध्वी ने यह भी कहा कि धार्मिक और नैतिक शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। युवा वर्ग और महिलाएं इस मार्गदर्शन से सही निर्णय और जीवन की स्थिरता प्राप्त कर सकते हैं।
निष्कर्ष
इस प्रकार, पक्खी पर्व पर आयोजित इस धार्मिक सभा ने यह संदेश दिया कि:
- मिथ्यात्व का निवारण दर्शन, श्रद्धा और तत्वज्ञान से ही संभव है।
- परिवार और समाज के संस्कार का पालन करना आवश्यक है।
- भौतिक लालच और आकर्षण में फँसकर गलत निर्णय लेना जीवन को कठिन बना सकता है।
- सामूहिक उपवास, तप और प्रत्याख्यान से आध्यात्मिक विकास और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है।
पूज्य साध्वी और साध्वीजन का मार्गदर्शन आज के समय में धार्मिक चेतना, सामाजिक अनुशासन और नैतिक मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
“जो अपने मिथ्यात्व का निवारण कर लेता है, वह अपने भव का भी अंत कर लेता है और भगवान से सम्यक्त की प्राप्ति करता है।” – साध्वी Nikhilshilaji

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