सत्वेषु मैत्री का भाव ही समाज को सही दिशा देता है – आर्यिका यशस्विनी माताजी
इंदौर।
सत्वेषु मैत्री अर्थात सभी प्राणियों के प्रति मैत्री, करुणा और वात्सल्य का भाव रखना ही सच्चा धर्म है। जब मनुष्य इस भावना से दूर होता है, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार, समाज और संपूर्ण मानवता पर दिखाई देता है। आज समाज में बढ़ते तनाव, टूटते परिवार और आपसी वैमनस्य का मूल कारण भी सत्वेषु मैत्री का अभाव ही है।
यह विचार पूज्य गणिनी आर्यिका यशस्विनी माताजी ने दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय, छत्रपति नगर, इंदौर में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए।
सत्वेषु मैत्री का अभाव और समाज की वर्तमान स्थिति
आर्यिका यशस्विनी माताजी ने कहा कि आज हर क्षेत्र में सत्वेषु मैत्री की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। परिवारों में परस्पर प्रेम, करुणा और वात्सल्य का भाव कमजोर होता जा रहा है। माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी, भाई-भाई में मनमुटाव और रिश्तों में बढ़ती दूरी इसी का परिणाम है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के बारे में सोचता है और दूसरे के सुख-दुख की चिंता नहीं करता, तब समाज में विकृतियां जन्म लेती हैं। सत्वेषु मैत्री केवल एक धार्मिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन बनाए रखने का आधार है।
वसुधैव कुटुंबकम और सत्वेषु मैत्री
माताजी ने अपने प्रवचन में वसुधैव कुटुंबकम की भावना पर विशेष बल देते हुए कहा कि संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। जब हम इस भावना को आत्मसात करते हैं, तभी सत्वेषु मैत्री हमारे व्यवहार में उतरती है।
उन्होंने कहा कि सुख और दुख में समता भाव रखना, दूसरों की प्रगति में प्रमोद भाव रखना और पीड़ित प्राणियों के प्रति करुणा भाव रखना ही सच्चा धर्म है। साथ ही, जब परिस्थितियां हमारे नियंत्रण से बाहर हों, तब माध्यस्थ भाव रखना भी आवश्यक है।
सत्वेषु मैत्री से ही आती है मानसिक शांति
आर्यिका यशस्विनी माताजी ने कहा कि सत्वेषु मैत्री का भाव रखने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक शांत और संतुलित रहता है। ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध जैसे विकार धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि जब हम सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखते हैं, तब हमारा दृष्टिकोण व्यापक होता है और जीवन के प्रति सकारात्मकता बढ़ती है। यही सकारात्मकता व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
आज के समय में सत्वेषु मैत्री की आवश्यकता
आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं में उलझ गया है। ऐसे समय में सत्वेषु मैत्री का महत्व और भी बढ़ जाता है। माताजी ने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में इस भावना को अपनाए, तो समाज में बढ़ रही हिंसा, तनाव और असहिष्णुता स्वतः ही कम हो जाएगी।
प्रतिदिन हो रहे मंगल प्रवचन
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी देते हुए बताया कि पूज्य गणिनी आर्यिका यशस्विनी माताजी वर्तमान में आदिनाथ जिनालय, छत्रपति नगर, इंदौर में विराजमान हैं।
यहां प्रतिदिन प्रातः 8:45 बजे से 9:45 बजे तक उनके मंगल प्रवचन आयोजित होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
सत्वेषु मैत्री – केवल उपदेश नहीं, जीवन शैली
अंत में माताजी ने कहा कि सत्वेषु मैत्री को केवल सुनने या समझने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने दैनिक जीवन में उतारें। जब हम व्यवहार में मैत्री, करुणा और वात्सल्य लाते हैं, तभी समाज में वास्तविक परिवर्तन संभव है।
उन्होंने सभी से आह्वान किया कि प्रत्येक प्राणी के प्रति मैत्री भाव रखें और अपने आचरण से समाज को सही दिशा देने का प्रयास करें।
निष्कर्ष
सत्वेषु मैत्री ही वह सूत्र है, जो व्यक्ति को व्यक्ति से, परिवार को परिवार से और समाज को समाज से जोड़ता है। आर्यिका यशस्विनी माताजी का यह संदेश आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक है।
