चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला: इंदौर के हक की अरबों की राशि पर हाईकोर्ट का बड़ा निर्णय
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला इन दिनों पूरे मध्य प्रदेश में चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। इंदौर के हक की अनुमानित ₹21,000 करोड़ की वैधानिक फंडिंग को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद में 05 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। यह निर्णय न केवल इंदौर बल्कि पूरे प्रदेश के सार्वजनिक न्यासों की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है।
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
1972 से सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य क्षेत्र में सेवा दे रहा Choithram Charitable Trust (CCT) इंदौर में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य परोपकारी संस्थान चलाता है। ट्रस्ट के संस्थापक स्वर्गीय ठाकुरदास चोइथराम पगारानी ने विदेश में Choithram International Foundation (CIF) स्थापित की थी, जिसका उद्देश्य ट्रस्टों को वित्तीय सहयोग प्रदान करना था।
शिकायतों में दावा किया गया कि CIF के अरबों रुपये के फंड में से लगभग 25% हिस्सा, यानी ₹21,000 करोड़, CCT का है, परंतु यह राशि ट्रस्ट तक कभी नहीं पहुंची।
आरोप क्या थे और विवाद कैसे शुरू हुआ?
CCT के चेयरमैन एवं मैनेजिंग ट्रस्टी सतीश मोतीयानी ने चार व्यक्तियों—
- लेखराज पगारानी,
- किशोर पगारानी,
- रमेश थानवानी,
- दयाल दतवानी
पर गंभीर आरोप लगाए कि उन्होंने—
ट्रस्ट के लिए निर्धारित विदेशी फंडिंग और निवेश की जानकारी छुपाई
CIF की संपत्तियों को सार्वजनिक नहीं किया
“Choithram” जैसे ट्रेडमार्क विदेशी कंपनियों के नाम कराए
अपने ट्रस्टी या पूर्व ट्रस्टी पद का दुरुपयोग किया
इन आरोपों के आधार पर इंदौर के रजिस्ट्रार, लोक न्यास ने जांच शुरू की। इसी कार्रवाई को चुनौती देने के लिए इन चार व्यक्तियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें—विदेशी संपत्ति और अधिकारक्षेत्र का मुद्दा
चारों याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया कि—
- CIF विदेशी फाउंडेशन है, इसलिए उसकी संपत्तियों की जांच भारत के रजिस्ट्रार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
- रजिस्ट्रार की ओर से चल रही कार्रवाई नियम से परे और अमान्य है।
- कार्यकारी ट्रस्टी द्वारा शिकायत दायर करना विधिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।
यानी उनकी मुख्य मांग थी कि रजिस्ट्रार की कार्रवाई को रोका जाए और जांच समाप्त की जाए।
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला—अदालत ने क्या कहा?
05 दिसंबर 2025 को आए विस्तृत आदेश में हाईकोर्ट ने सभी आपत्तियाँ स्पष्ट रूप से खारिज कर दीं। अदालत ने कहा—
1. रजिस्ट्रार की कार्रवाई पूर्णतः वैध है
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एम.पी. पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1951 की धारा 26 के तहत की जा रही है, जो पूरी तरह कानूनी है। रजिस्ट्रार अपने अधिकार क्षेत्र में कार्य कर रहा है।
2. कार्यकारी ट्रस्टी शिकायत दर्ज कर सकता है
अदालत ने माना कि किसी भी कार्यकारी ट्रस्टी को शिकायत दर्ज कराने का पूरा अधिकार है, विशेषकर तब जब बात सार्वजनिक ट्रस्ट संपत्तियों की पारदर्शिता और सुरक्षा की हो।
3. आरोप गंभीर हैं—जांच रोकी नहीं जा सकती
हाईकोर्ट ने माना कि अरबों की संपत्ति और फंड छुपाने जैसे आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं। इसलिए रजिस्ट्रार को जांच जारी रखने का निर्देश दिया जाना उचित है।
4. विदेशी संपत्ति का तर्क निराधार
अदालत ने साफ कहा:
“विदेशी संपत्ति या निवेश की दलील प्रारंभिक जांच को रोकने का आधार नहीं हो सकती।”
यानी यह मुद्दा आगे विस्तृत जांच में स्पष्ट होगा, लेकिन अभी कार्रवाई रोकना गलत होगा।
फैसला आने के बाद आगे क्या होगा?
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला के बाद अब—
- रजिस्ट्रार धारा 26 और 27 के तहत विस्तृत जांच आगे बढ़ाएगा।
- आवश्यकता पड़ने पर मामला जिला न्यायालय को भेजा जा सकता है।
- ट्रस्ट की विदेशी और देशी संपत्तियों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए विस्तृत सुनवाई होगी।
यह फैसला सार्वजनिक न्यासों की पारदर्शिता के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
इंदौर के लिए यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
इंदौर शहर में चोइथराम समूह शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा नाम है। यदि ट्रस्ट को उसका वैधानिक हिस्सा—₹21,000 करोड़—मिलता है, तो—
शहर और समाज को बड़े लाभ हो सकते हैं:
- नए अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाएँ
- गरीबों के लिए निशुल्क उपचार
- आधुनिक स्कूल और कॉलेज
- छात्रवृत्ति कार्यक्रम
- सामाजिक कल्याण की नई परियोजनाएँ
इसलिए यह फैसला इंदौर के भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला—ट्रस्ट की बड़ी जीत
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह आदेश ट्रस्ट की प्राथमिक जीत है, क्योंकि—
- जांच को मान्यता मिली
- याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ खारिज हुईं
- ट्रस्ट संपत्तियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई
अदालत ने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक न्यासों की संपत्तियों पर पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है, चाहे संपत्ति भारत में हो या विदेश में।
निष्कर्ष — हाईकोर्ट का फैसला क्यों ऐतिहासिक है?
चोइथराम चैरिटेबल ट्रस्ट हाईकोर्ट फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि एक सिद्धांत है—
“ट्रस्ट संपत्तियों का वास्तविक मालिक समाज होता है, और उसके हितों की रक्षा सर्वोपरि है।”
यह फैसला आने वाले समय में—
- अन्य ट्रस्टों की कार्यप्रणाली
- विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता
- समाजहित में संपत्तियों के उपयोग
पर भी प्रभाव डाल सकता है।
इंदौर के लिए यह सिर्फ एक कानूनी नहीं बल्कि विकास और न्याय की दिशा में बड़ा कदम है।







