कमठ तीर्थों पर हमला करेगा तो धरणेन्द्र–पदमावती आज भी रक्षा करेंगे — आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज
इंदौर।
श्रमण संस्कृति के अलौकिक प्रतीक, महामहिम पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने भारत वर्षीय जैन समाज को संबोधित करते हुए तीर्थों की सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि चल-अचल तीर्थों की रक्षा केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि संपूर्ण जैन समाज की साझा जिम्मेदारी है। समाज यदि अपने कर्तव्यों से विमुख हो गया, तो तीर्थ-संरक्षण का मूल आधार कमजोर हो जाएगा।
आचार्य श्री ने अपने विशेष मंगल उपदेश में कहा कि “समाज का प्रत्येक सदस्य—बच्चा, युवा और वयोवृद्ध—सबको तीर्थ और संस्कृति की सुरक्षा में योगदान देना चाहिए। जहां धर्म और तीर्थ हैं, वहीं समाज की आत्मा बसती है। इसलिए चल-अचल तीर्थों की रक्षा हमारा प्रथम कर्तव्य है।”
उनकी वाणी में तीर्थों के प्रति समर्पण, संवेदना और जागरूकता का अद्भुत संगम दिखाई दिया। उन्होंने पंचकल्याणक के दौरान भी समाज को इसी भावना से काम करने का आह्वान किया।
अमृत तीर्थ, जबलपुर में पंचकल्याणक महोत्सव — समाज के लिए चेतना का संदेश
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी दी कि जबलपुर स्थित अमृत तीर्थ के जिनबिंब पंचकल्याणक महामहोत्सव के दौरान आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने तीर्थक्षेत्र कमेटी के 125वें वर्ष पर चल रही योजनाओं पर विस्तृत मार्गदर्शन दिया। इस अवसर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जंबू प्रसाद जैन, शतकोत्तर रजत वर्ष समिति के चेयरमैन जवाहरलाल जैन, तथा चैनल महालक्ष्मी के प्रमुख शरद जैन भी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में परंपरा, तीर्थ रक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई।
तीर्थ रक्षा कमेटी का आह्वान — “तीर्थ वंदना ही तीर्थ सुरक्षा”
तीर्थ रक्षा कमेटी के अध्यक्ष जंबू कुमार जैन ने समाज को संबोधित करते हुए कहा कि तीर्थ केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा—
**“तीर्थ दो प्रकार के होते हैं —
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मंच पर स्थित चेतन तीर्थ
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और शिखरजी जैसे अचेतन तीर्थ”**
उन्होंने स्पष्ट कहा कि धर्म कभी नष्ट नहीं होता, न ही तीर्थ नष्ट हो सकते हैं। किंतु समाज की जागरूकता और सक्रियता से उनकी महिमा और प्रभाव बना रहता है। जो बच्चे, जो युवा आज तीर्थ वंदना में शामिल हैं, वही भविष्य में जैन शासन की रीढ़ बनेंगे।
उन्होंने कहा—
**“तीर्थ वंदना करेंगे तो तीर्थ रक्षा स्वतः होगी।
आत्मरक्षा का भाव जिनमें होगा, उनमें तीर्थ संरक्षण का भाव स्वतः जीवित रहेगा। यह त्रैकालिक धर्म है।”**
उन्होंने जोर देकर कहा कि नई प्रतिष्ठाएँ हो रही हैं, नए तीर्थ विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन पुराने तीर्थों की सुरक्षा और संरक्षण समाज का सर्वोच्च दायित्व होना चाहिए। संस्कृति की पहचान इन्हीं तीर्थों से होती है।
“गुरुओं–तीर्थों की महिमा पर कभी आंच न आने दें” — आचार्य श्री का दृढ़ संदेश
आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने भावपूर्ण शब्दों में कहा कि जैन समाज की शक्ति, एकता, त्याग और धर्मप्रेम ने इतिहास में अनगिनत उदाहरण प्रस्तुत किए हैं—
चाहे वह टोडरमल हों, भामाशाह हों या अन्य महापुरुष।
उन्होंने समाज को चेताया कि आज भी बाहरी और आंतरिक स्तर पर तीर्थों पर हमले या अवमानना की स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा—
**“कमठ आज भी हमला कर सकता है,
पर याद रखिए — धरणेन्द्र और पद्मावती की कृपा आज भी कम नहीं हुई है।
धर्म और तीर्थ की रक्षा सदैव दिव्य शक्तियों और समाज के संयुक्त प्रयास से होती आई है।”**
यह संदेश तीर्थ रक्षा पर पूर्ण विश्वास और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।
समाज से अपील — चल-अचल तीर्थों की सेवा में सदैव तत्पर रहें
आचार्य श्री ने कहा कि तीर्थों की रक्षा का अर्थ केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि—
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जागरूकता
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नियमित वंदना
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समाज का संगठन
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गुरुओं और तपस्वियों के प्रति सम्मान
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और धार्मिक मूल्यों का पालन
इन सभी का समन्वित रूप है।
उन्होंने तीर्थ यात्रा, मुनियों को आहार और सम्यक्त्व के बोध को धर्म का आधार बताया।
“चल-अचल तीर्थों की सेवा करें, गुरु परंपरा की रक्षा करें और संस्कृति पर कभी आंच न आने दें।”
निष्कर्ष
आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का यह संदेश केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि जैन समाज के लिए चेतना का शंखनाद है। तीर्थ संरक्षण, धर्म रक्षा और संस्कृति की निरंतरता समाज की सक्रियता, श्रद्धा और एकता पर निर्भर करती है।
जैन समाज यदि इसी भाव से आगे बढ़ा, तो आने वाला समय जैन संस्कृति और तीर्थ परंपरा को और भी अधिक उज्ज्वल बनाकर प्रस्तुत करेगा।

