आचार्य विशुद्धसागर जी दीक्षा दिवस: श्रमण संस्कृति के तेजस्वी महामहिम का दिव्य दिवस, गुरु भक्तों ने किया त्रिवार नमोस्तु
श्रमण संस्कृति के उज्ज्वल प्रहरी, जन-जन के आराध्य, वर्तमान काल के महावीर और चलते-फिरते धरती के देवता पट्टाचार्य आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के दीक्षा दिवस पर पूरे देश के जैन समाज में दिव्य उत्साह और गहन भक्ति का वातावरण बना रहा।
गुरुवर आचार्य श्री विशुद्धसागर जी का व्यक्तित्व केवल एक अध्यात्मिक मार्गदर्शक का नहीं, बल्कि अंतःकरण की गहराइयों में विराजमान एक दिव्य चेतना का प्रतीक है। उनका केवल स्मरण मात्र ही विपदाओं को शांत करने वाला और जीवन में शुभ-संकेत देने वाला माना जाता है।
दीक्षा दिवस के इस पावन अवसर पर गुरु भक्तों ने भावपूर्ण शब्दों के साथ त्रिवार प्रणाम प्रस्तुत किया—
नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु!
गुरुवर की असीम करुणा, अहिंसा के प्रति उनकी तल्लीनता, तपश्चर्या, अध्ययन-मनन और समाज को पवित्र दिशा देने वाली प्रेरक वाणी ने हजारों जीवनों को स्पर्श किया है। जैन समाज के लिए आचार्य विशुद्धसागर जी केवल आध्यात्मिक नेता नहीं, बल्कि धर्म, त्याग और सत्य मार्ग के प्रकाश स्तंभ हैं।
इस दिव्य दिवस पर डॉ. जैनेन्द्र जैन, आज़ाद जी जैन, टीके वेद, हंसमुख गांधी, राजेश जैन दद्दू, मयंक जैन सहित समस्त गुरु भक्त भारत ने गुरु चरणों में कोटि-कोटि वंदन अर्पित किया और प्रार्थना की कि गुरुदेव का मंगलमय सान्निध्य सदैव विश्व का कल्याण करता रहे।
गुरु भक्ति से ओतप्रोत सभी श्रद्धालुओं ने मिलकर एक ही स्वर में उच्चारित किया—
“नमोस्तु, शासन जयवंत हो!”

