टोंक में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के ऐतिहासिक वर्षायोग से महका पूरा जिला
संयम, तप, त्याग और साधना की सुगंध में डूबा टोंक – आर्यिका श्री वत्सल मति माताजी का समाधिमरण बना प्रेरणा का प्रतीक
टोंक (राजस्थान)।
भारत की पावन भूमि सदैव ऋषि-मुनियों, त्यागी तपस्वियों और साधकों की जन्मभूमि रही है। यह वही वसुंधरा है, जहाँ मानव से महामानव, नर से नारायण और तप से तीर्थंकर बनने की प्रेरणा प्रवाहित होती है। इन्हीं पुण्य प्रवाहों में आज फिर इतिहास के पन्नों पर टोंक जैन समाज का नाम अमर हो गया है — क्योंकि यहां के चातुर्मास में पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महामुनिराज का दिव्य सानिध्य प्राप्त हुआ है।
जब से वात्सल्यवारिधि, दिगंबर जैन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महामुनिराज ससंघ का चातुर्मास टोंक जिले में प्रारंभ हुआ, तभी से समस्त क्षेत्र संयम, तप, त्याग और साधना की सुगंध से सराबोर हो उठा। हर गली, हर मोहल्ले और हर श्रावक-श्राविका के मन में केवल एक ही भाव है — “धर्म, ध्यान और साधना का उत्कर्ष”।
टोंक के चातुर्मास में धर्म, ध्यान और संयम का विराट संगम
टोंक में आयोजित इस ऐतिहासिक वर्षायोग ने पूरे जिले को अध्यात्ममय बना दिया है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महामुनिराज के पावन चरणों ने इस भूमि को धन्य कर दिया। उनके सानिध्य में सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने आत्मजागरण, साधना और संयम की राह अपनाई।
चार महीने से चल रहे इस वर्षायोग के दौरान असंख्य धार्मिक कार्यक्रम, प्रवचन, आराधना और समाधि मरण जैसे दुर्लभ क्षणों के साक्षी टोंकवासी बने।
आर्यिका श्री वत्सल मति माताजी का सम्यक समाधि मरण — आत्म संयम की चरम सीमा
हाल ही में इस चातुर्मास के दौरान 105 आर्यिका श्री वत्सल मति माताजी (आयु 72 वर्ष), जो आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की परम प्रभाविका शिष्या थीं, ने 6 नवंबर 2025 की संध्या को टोंक में उत्कृष्ट सम्यक समाधि मरण प्राप्त किया।
उनकी समाधि केवल जैन समाज ही नहीं, पूरे मानव समाज के लिए प्रेरणा बन गई। माताजी के त्याग, संयम और शांतचित्त साधना ने यह सिद्ध कर दिया कि आत्मा का कल्याण केवल त्याग और तप से ही संभव है।
यह समाधि मरण आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में टोंक चातुर्मास के दौरान हुआ, जो धार्मिक दृष्टि से एक अमूल्य क्षण बन गया।
संयम और साधना से महका टोंक जिला
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण पड़ते ही पूरा टोंक जिला मानो धर्मधारा में प्रवाहित हो गया। उनके प्रवचनों, साधना और अनुशासित जीवन ने लोगों में नवचेतना का संचार किया।
श्रावकों ने तन-मन-धन से इस चातुर्मास को सफल बनाने में अमूल्य योगदान दिया।
श्रद्धालुओं ने कहा –
“चार महीनों से टोंक जिले की हर सांस में संयम और साधना की सुगंध घुल गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं भगवान के चरण इस भूमि को स्पर्श कर रहे हों।”
पुण्य उदय से ही मिलता है ऐसा महान सानिध्य
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का सानिध्य किसी साधारण सौभाग्य का परिणाम नहीं। यह केवल उन पुण्यात्माओं को प्राप्त होता है जिनके जन्मों-जन्मों के संस्कार पवित्र हों। जैसा कि पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ (राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी, कोटा) ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा —
“कई जन्मों का पुण्य उदय जब जीवन में आता है, तब जाकर ऐसा महान आचार्य वात्सल्य वारिधि का पावन सानिध्य प्राप्त होता है।”
वास्तव में यह चातुर्मास टोंक जैन समाज के लिए धार्मिक चेतना, भक्ति और साधना का स्वर्ण युग सिद्ध हुआ है।
श्रद्धालुओं की सेवा भावना और अनुमोदना
देशभर से असंख्य श्रद्धालु टोंक पहुंचे। सभी ने अपनी मंगल भावना से इस चातुर्मास को सफल बनाने में योगदान दिया।
चाहे कोटा हो, जयपुर, अजमेर या भीलवाड़ा — हर स्थान से भक्तों ने तन, मन और धन से सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
पत्रकार पारस जैन “पार्श्वमणि” ने कहा –
“मैं उन सभी श्रद्धालुओं का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने इस चातुर्मास को सफल बनाने में सहयोग दिया। ऐसे क्षण जीवन में बार-बार नहीं आते, जब दिगंबर संतों के सानिध्य में जीवन का हर पल सार्थक हो जाता है।”
समाधि मरण का दिगंबर परिप्रेक्ष्य — जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य
दिगंबर जैन परंपरा में समाधि मरण (सल्लेखना) को आत्मा की पूर्ण शुद्धि का प्रतीक माना गया है। यह मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन की सर्वोच्च साधना है।
आर्यिका श्री वत्सल मति माताजी ने जो शांतिपूर्वक समाधि धारण की, वह इस बात का प्रमाण है कि तप, त्याग और संयम ही आत्मकल्याण के सच्चे साधन हैं।
उनका जीवन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की शिक्षाओं का मूर्त रूप था —
“संयम ही साधना है, साधना ही शांति है और शांति ही मोक्ष का मार्ग।”
जीवन का सार — संतों की चरण रज से ही सार्थकता
जीवन का कोई पल स्थायी नहीं। कल किसे क्या हो जाए, कोई नहीं जानता।
किन्तु यदि यह जीवन ऐसे दिगंबर संतों के चरणों की रज में बीत जाए, तो यही जीवन की सच्ची सार्थकता है।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का यह ऐतिहासिक वर्षायोग न केवल टोंक की धरती को पवित्र बना गया, बल्कि इसने हर साधक को आत्मचिंतन का संदेश दिया कि —
“त्याग में ही जीवन का सार है, और संयम में ही परम आनंद।”
निष्कर्ष
टोंक का यह चातुर्मास भारतीय जैन समाज के इतिहास में आध्यात्मिकता, भक्ति और साधना का अनुपम अध्याय बन गया है।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में जैन समाज ने न केवल धर्म का उत्थान किया, बल्कि समाज के हर वर्ग में आत्मशुद्धि की भावना भी जगाई।
यह चातुर्मास सिद्ध करता है कि जब पुण्य उदय होता है, तब ही संतों का आगमन संभव होता है — और वही क्षण समाज को युगों तक दिशा देते हैं।
✍️ लेखक: पारस जैन “पार्श्वमणि”
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी | पत्रकार – कोटा
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