मुम्बई में श्रेणीतप के 35 तपस्वी रत्नों का भव्य पारणा सम्पन्न
जनसैलाब ने लिया पुण्यदायक अवसर का लाभ, जैन समाज में उमड़ा श्रद्धा का सागर
मुम्बई / अभियान आज तक (संवाददाता – के. विक्रम सुराणा)
महाराष्ट्र की मायानगरी मुम्बई एक बार फिर जैन धर्म की पवित्र आभा से आलोकित हुई। श्री सांचोरी जैन संघ मुम्बई के तत्वावधान में एवं चातुर्मास में विराजित गच्छाधिपति परम पूज्य आचार्य श्री विजय राजशेखरसूरीश्वरजी महाराजा, मरुधररत्न परम पूज्य आचार्य श्री विजय रत्नाकरसूरीश्वरजी महाराजा, तथा परम पूज्य आचार्य श्री विजय रत्नसंचयसूरीश्वरजी महाराजा सहित अनेक श्रमण-श्रमणी वृंद के पावन सानिध्य में श्रेणीतप के 35 तपस्वी रत्नों का भव्य पार्णोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्ति भाव से सम्पन्न हुआ।
पुण्य और भक्ति का संगम: मुम्बई बनी तप की भूमि
चार महीनों तक चले इस भीष्म तप में जैन समाज के आराधकों ने अद्भुत संयम, साधना और तप की मिसाल पेश की। पारणा के पावन अवसर पर मुम्बई में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। पुण्य नगरी ने इस अवसर को धर्ममय बना दिया।
इस भव्य पार्णोत्सव एवं नवकारशी के लाभार्थी परिवार रहे —
श्रीमती समुबेन चुन्नीलालजी घमंडीरामजी चन्दन परिवार (सांचोर, सत्यपुर)।
संघ की प्रेरणा और तपस्वियों का अद्भुत योगदान
आज पारणा समारोह में उपस्थित पंन्यास राजसुंदर विजयजी महाराज साहेब ने अपने प्रवचन में कहा कि —
“श्रेणीतप में तपस्वीगणों को जोड़ने का जो सुंदर कार्य किया गया, वह वास्तव में पुण्य का अद्वितीय अवसर है। इस कार्य का श्रेय कामाठीपुरा संघ के सुश्रावक मुकेशभाई चौधरी को जाता है, जिन्होंने भीनमाल और रानीवाड़ा शहरों के आराधकों को श्रेणीतप में जोड़कर सांचोरी संघ का गौरव बढ़ाया है।”
उन्होंने आगे कहा —
“आज के समय में चार महीने तक निरंतर आराधना करने वाले आराधक दुर्लभ हैं। प्रायः पर्युषण तक आराधक जुड़े रहते हैं, परंतु सांचोरी संघ ने पूरे चार महीने तक भक्तों को साधना से जोड़े रखा — यह अत्यंत प्रेरणादायक है।”
सांचोरी संघ का अनुकरणीय आयोजन
पंन्यासश्री ने सांचोरी संघ की सराहना करते हुए कहा कि संघ ने खड़े पैर साधना करने वाले तपस्वियों की सेवा, भक्ति और बियासणे (दोनों समय भक्ति) के माध्यम से जो समर्पण दिखाया, वह पूरे दक्षिण मुम्बई में जैन समाज के लिए आदर्श बन गया है।
सांचोरी जैन संघ मुम्बई ने इस आयोजन से न केवल तप परंपरा को पुनर्जीवित किया बल्कि समाज में नई ऊर्जा और धर्मभावना का संचार किया।
वरकाणा परिवार और धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं की सहभागिता
इस पार्णोत्सव में वरकाणा जैन परिवार के संस्थापक और गुरुभक्त परिवारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बागोड़ा निवासी मुकेशजी चौधरी, अंतरराष्ट्रीय सुप्रसिद्ध संगीतकार नरेन्द्रजी वाणीगोता की धर्मपत्नी, तथा ताडदेव संघ के जयदीपभाई एवं उनकी धर्मपत्नी सहित अनेक श्रद्धालुओं ने मंडल के सदस्यगणों के साथ मिलकर तपस्वी रत्नों का भव्य पारणा करवाया।
तपस्वियों का दृपटा से बहुमान, पुष्पवर्षा, भक्ति-भजन और मंगलगान के साथ किया गया। पारणा स्थल पर भक्तों ने “जय हो तपस्वियों की”, “नमो अरिहंताणं” के उद्घोष से वातावरण को धर्ममय बना दिया।
समाज के अग्रणी गणमान्य उपस्थित
इस अवसर पर समाज के प्रमुख गणमान्य एवं समाजसेवी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे —
सुरेशजी चौधरी, कीर्तिभाई चावला, उत्तमजी चौधरी, के. विक्रम सुराणा, विनोदभाई सुराणा, कवि विजयभाई दिलीपभाई भंसाली, ललितभाई (सोना ग्रुप) सहित सकल जैन संघ मुम्बई के अनेक प्रतिनिधि इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने।
सभी ने एक स्वर में सांचोरी संघ की कार्यप्रणाली, संगठन कौशल और तप आराधना के आयोजन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
चार महीने की आराधना: साधना और समर्पण की मिसाल
श्रेणीतप का यह अनुष्ठान जैन धर्म की महान तप परंपरा का जीवंत उदाहरण है। चार माह तक कठोर साधना, संयम, उपवास और नियमों का पालन कर तपस्वियों ने आत्मशुद्धि का मार्ग अपनाया।
मुम्बई जैसे व्यस्त महानगर में इतने विशाल स्तर पर 35 तपस्वी रत्नों का एक साथ श्रेणीतप संपन्न होना अपने आप में ऐतिहासिक घटना कही जा सकती है।
धर्म, संस्कृति और समाज के उत्थान की दिशा में सांचोरी संघ का योगदान
सांचोरी जैन संघ मुम्बई ने न केवल तपस्वियों के इस तपोत्सव का आयोजन किया बल्कि धर्म, भक्ति और संस्कृति के प्रति जनजागरण का भी कार्य किया। संघ के सदस्यगणों ने श्रद्धालुओं को तप के महत्व, संयम और त्याग के संदेश से प्रेरित किया।
इस पार्णोत्सव ने समाज में यह संदेश दिया कि —
“तप केवल आत्मशुद्धि का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक एकता और आध्यात्मिक उत्थान का भी माध्यम है।”
निष्कर्ष
मुम्बई में सम्पन्न श्रेणीतप के 35 तपस्वी रत्नों का पार्णोत्सव जैन समाज के लिए एक गौरवमयी अध्याय बन गया है। सांचोरी संघ की यह अनुकरणीय पहल आने वाले वर्षों में भी समाज को धर्म, संयम और साधना के मार्ग पर अग्रसर करेगी।
सच ही कहा गया है —
“तप से बढ़कर कोई साधना नहीं, और संघ से बढ़कर कोई शक्ति नहीं।”


