अमेरिका का बड़ा बयान – पाकिस्तान से रिश्ते बढ़ाएंगे, पर भारत की कीमत पर नहीं
हाल के महीनों में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों पर पूरी दुनिया की नजर है। अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के साथ नए रणनीतिक कदम उठाने से यह सवाल उठने लगे थे कि क्या अब वाशिंगटन भारत के साथ अपने “स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” को उतना महत्व नहीं दे रहा। इन अटकलों पर अब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद जवाब देकर स्थिति साफ कर दी है।
रूबियो ने रविवार को मलेशिया में चल रहे आसियान समिट में पहुँचने से पहले मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ काम करना चाहता है, लेकिन यह भारत के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं होगा। उनका कहना था कि आज की वैश्विक परिस्थितियों में हर देश को अपने कूटनीतिक रिश्तों में संतुलन बनाना पड़ता है और अमेरिका इसे बखूबी समझता है।
“भारत के साथ साझेदारी ऐतिहासिक और मूल्यवान” – मार्को रुबियो
अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि भारत पूरी तरह समझता है कि अमेरिका के विभिन्न देशों से अलग-अलग प्रकार के रिश्ते हैं। उन्होंने कहा,
“भारत हमारे लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी साझेदारी ऐतिहासिक, गहरी और बहुआयामी है। पाकिस्तान के साथ हमारे कदम भारत की दोस्ती की कीमत पर नहीं उठाए जा रहे।”
रूबियो ने बताया कि भारत एक परिपक्व और व्यावहारिक विदेश नीति वाला देश है, जो जानता है कि वैश्विक मंच पर हर राष्ट्र अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं पर काम करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने भी उन देशों के साथ संबंध बनाए रखे हैं जिनके साथ अमेरिका के रिश्ते नहीं हैं, इसलिए यह सब एक “मैच्योर डिप्लोमैटिक एप्रोच” का हिस्सा है।
अमेरिका-पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकी पर उठे सवाल
बीते कुछ हफ्तों में वॉशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच संवाद तेज हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने हाल ही में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर की खुलकर प्रशंसा की थी, जिसे लेकर भारत में कई विश्लेषकों ने चिंता जताई थी।
ट्रंप ने कहा था कि पाकिस्तान ने दक्षिण एशिया में स्थिरता लाने के लिए अहम भूमिका निभाई है। इस बयान के बाद भारतीय राजनीतिक हलकों में सवाल उठे कि क्या ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को फिर से प्राथमिक सहयोगी के रूप में देख रहा है।
रूबियो के बयान से अब यह संकेत मिला है कि भले ही अमेरिका पाकिस्तान के साथ कुछ रणनीतिक कदम आगे बढ़ा रहा हो, लेकिन उसकी मूल साझेदारी भारत के साथ ही केंद्रित रहेगी।
भारत और अमेरिका के रिश्तों में आई खटास?
बीते कुछ समय में भारत–अमेरिका संबंधों में टैरिफ, ट्रेड और तेल आयात को लेकर मतभेद सामने आए हैं। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कई मौकों पर भारत को रूसी तेल खरीदने पर निशाना बनाया था। साथ ही व्यापारिक शुल्क (टैरिफ) को लेकर भी उन्होंने भारत को “अनुचित व्यापारिक नीतियों” वाला देश बताया था।
इसके बावजूद भारत ने संयमित रवैया अपनाया और सभी विवादों को कूटनीतिक संवाद के ज़रिए सुलझाने की दिशा में काम किया। ट्रंप की पाकिस्तान संबंधी प्रशंसा और भारत–पाक संबंधों में मध्यस्थता के दावे पर भी नई दिल्ली ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी।
रूसी तेल खरीद पर भी अमेरिकी प्रतिक्रिया
आसियान समिट से पहले मार्को रुबियो से यह भी पूछा गया कि क्या भारत व्यापार समझौते (Trade Deal) के लिए रूस से तेल खरीदना कम करेगा। इस पर उन्होंने कहा कि भारत पहले ही तेल खरीद के स्रोतों में विविधता (Diversity) लाने की बात कर चुका है।
रूबियो के अनुसार, “भारत का इरादा है कि वह रूस के अलावा अन्य देशों से भी तेल खरीदे, ताकि उसका एनर्जी पोर्टफोलियो संतुलित रहे। अगर वे हमसे ज्यादा खरीदते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि किसी दूसरे देश से खरीद बंद करेंगे। अभी इस पर कोई निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।”
इस बयान को अमेरिका की “संतुलित विदेश नीति” के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत के साथ ट्रेड वार्ता को नकारात्मक प्रभाव से बचाने की कोशिश है।
एस. जयशंकर और मार्को रुबियो की मुलाकात
सोमवार, 27 अक्टूबर 2025 को मलेशिया में आयोजित आसियान समिट के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मार्को रुबियो से द्विपक्षीय मुलाकात की।
जयशंकर ने बैठक के बाद एक्स (X) पर पोस्ट करते हुए कहा – “कुआलालंपुर में अमेरिकी विदेश मंत्री से मिलकर खुशी हुई। हमने द्विपक्षीय साझेदारी, क्षेत्रीय मुद्दों और वैश्विक चुनौतियों पर सार्थक चर्चा की।”
सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच इंडो-पैसिफिक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और ऊर्जा विविधता पर विशेष चर्चा हुई। भारत ने अमेरिका से यह आश्वासन भी मांगा कि पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार का सैन्य सहयोग भारत विरोधी नीतियों में तब्दील न हो।
आसियान समिट 2025 में भारत और अमेरिका की भूमिका
इस वर्ष का आसियान समिट मलेशिया में आयोजित किया गया है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप व्यक्तिगत रूप से इसमें पहुंचे, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअली सम्मेलन को संबोधित किया।
भारत का उद्देश्य था एशिया-प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक सहयोग को मजबूती देना और सुरक्षा के क्षेत्र में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ समन्वय बढ़ाना। वहीं, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत के सक्रिय योगदान की सराहना की।
भारत–अमेरिका साझेदारी की दिशा
अमेरिका का यह बयान ऐसे समय आया है जब पूरी दुनिया में ब्लॉक पॉलिटिक्स दोबारा उभर रही है। यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व के तनाव और चीन की विस्तारवादी नीति के बीच भारत–अमेरिका सहयोग की भूमिका निर्णायक साबित हो रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के संबंधों में अस्थायी मतभेद के बावजूद आपसी रणनीतिक भरोसे की नींव मजबूत बनी हुई है। हालिया संवाद और कूटनीतिक संकेत ये दर्शाते हैं कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली आने वाले वर्षों में इंडो-पैसिफिक में साझेदारी के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे।
निष्कर्ष
अमेरिका ने अब साफ कर दिया है कि पाकिस्तान के साथ संबंधों की नई पहल भारत के खर्चे पर नहीं होगी। विदेश मंत्री मार्को रुबियो के ताजा बयान ने दोनों देशों के बीच बढ़ती अनिश्चितता को कम करने का संदेश दिया है।
जहां एक ओर वाशिंगटन इस्लामाबाद को आतंकवाद विरुद्ध मोर्चे पर साथ रखने की रणनीति पर काम कर रहा है, वहीं भारत को अमेरिका अपनी दीर्घकालिक साझेदारी के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता वाले मित्र देश के रूप में देख रहा है।
ऐसे में आसियान समिट 2025 ने न सिर्फ एशिया-पैसिफिक में नई कूटनीतिक दिशा दी है, बल्कि भारत–अमेरिका साझेदारी की मजबूती का एक और संकेत भी दिया है।
