“भीष्म तपस्वी रत्न” 180-उपवास पारणा समारोह: राष्ट्रीय-संस्कृति-धर्म की यशोगाथा
दिल्ली, 8–9 नवम्बर 2025
भारत की राजधानी दिल्ली में आने वाले दिनों में एक अत्यंत प्रेरणादायक और ऐतिहासिक कार्यक्रम आयोजित होने जा रहा है, जिसमें भारतवर्ष के धार्मिक-साधना-संस्कार से सम्बद्ध एक महोत्सव रूपी आयोजन की रूपरेखा सामने आ रही है। यह आयोजन है आचार्य श्रीमद् विजय हंसरत्नसूरीश्वरजी महाराज साहेब (जिन्हें “तपस्वी रत्न” एवं “भीष्म तपस्वी रत्न” की संज्ञा दी गई है) के आठवीं बार 180-दिन उपवास (संलग्न उपवास) के पारणा समारोह का, जिसे श्री मंडार जैन संघ दिल्ली द्वारा आयोजित किया जा रहा है।
कार्यक्रम की रूपरेखा
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दिनांक: 8 नवम्बर 2025 — सुबह 9 बजे से “राष्ट्र-संस्कृति-धर्म की यशोगाथा” कार्यक्रम।
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स्थान: विज्ञान भवन, दिल्ली, दिल्ली।
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उद्देश्य एवं आयोजन: 9 नवम्बर 2025 को पारणा (उपवास समाप्ति) के साथ “180 उपवास” की महोत्सवी प्रक्रिया का समापन, जिसमें गाजे-गाजे से महावीरनो शासन के गौरव तथा जैन साधना-परंपरा का जश्न होगा।
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मुख्य अतिथि: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्ण जी।
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मंच संचालनकर्ता: श्री साकेत शाह।
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संगीत एवं रंग-रूप: युवा प्रसिद्ध संगीतकार श्री अनीश भाई राठोड की संगीत-रमझट।
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निमंत्रक एवं आयोजक: श्री मंडार जैन संघ, दिल्ली।
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वन्दनकर्ता: श्री कुंथुनाथ राजेंद्र, नवयुवक मंडल सुराणा; महावीर मानव सेवा ग्रुप मुंबई संस्थापक श्री विक्रम कुशलराज जी छत्रिया बोहरा सुराणा।
तपस्वी रत्न की साधना-गाथा
आचार्य विजय हंसरत्नसूरीश्वरजी महाराज साहेब को “तपोरत्न महोद्दधि” की उपाधि प्राप्त है और वे जैन धर्म-परंपरा में अलौकिक साधना-मार्ग के प्रतीक माने जाते हैं। उनके उपवास-तपस्या-प्रसंगों में विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उन्होंने पूर्व में एक से अधिक बार 180-दिन (संलग्न) उपवास का अनुष्ठान पूर्ण किया है। उदाहरण के लिए, एक समाचार के अनुसार वे पाँचवीं बार 180-दिन उपवास पूर्ण कर चुके थे।
इस प्रकार इस बार उनका आठवीं बार 180-उपवास पारणा समारोह न केवल उनकी व्यक्तिगत साधना-यात्रा का महोत्सव है बल्कि पूरे जैन धर्मसाधना-परंपरा व “जिनशासन” की गरिमा एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रसार का अवसर बन रहा है।
“राष्ट्र-संस्कृति-धर्म की यशोगाथा” का सन्दर्भ
आज जब भारत-वर्ष में धर्म-संस्कृति-राष्ट्र की भूमिका निरंतर चर्चित है, इस कार्यक्रम का शीर्षक “राष्ट्र-संस्कृति-धर्म की यशोगाथा” अत्यंत प्रासंगिक है। यह आयोजन साधना, तपस्या, सामाजिक सेवा एवं धार्मिक संस्कार के समन्वय का प्रतीक है। आयोजन के माध्यम से निम्नलिखित संदेश प्रमुख होंगे:
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तपस्वी का जीवन, साधना-तपस्या व सामाजिक समर्पण के माध्यम से राष्ट्र-संस्कृति-धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ाना।
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जैन धर्म की अनवरत साधना-परंपरा का जन-मानस में स्थान सुनिश्चित करना।
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युवा पीढ़ी को धार्मिक-सांस्कृतिक आदर्शों से प्रेरित करना।
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साधना-उपवास से व्यक्ति-समाज-राष्ट्र के रूप में संयोजन स्थापित करना।
“180 उपवास” का अर्थ और महत्व
“180 उपवास” जैन साधना-मार्ग में एक विशिष्ट एवं कठिन तपस्या-प्रकार माना जाता है। इस तरह के संलग्न उपवास का आयोजन साधारण नहीं होता — इसे पूर्व क्लिष्ट विमर्श, सरलता तथा पूर्ण समर्पण के साथ किया जाता है। उदाहरणस्वरूप, आचार्य विजय हंसरत्नसूरीश्वरजी महाराज ने पहले 180-दिन उपवास कई बार पूरा किया है; तथा इस तपस्या के दौरान उन्होंने अत्यंत नियंत्रित जीवन, अल्प निद्रा, ध्यान-विहार व पूर्ण संयम का पालन किया।
इस प्रकार, इस पारणा कार्यक्रम का व्यापक सामाजिक-धार्मिक महत्व है — यह केवल एक उपवास समाप्ति समारोह नहीं, बल्कि तपस्या-समर्पण-संस्कार की प्रतीकात्मक घटना है।
आयोजक एवं मंच-विन्यास
आयोजनकर्ता श्री मंडार जैन संघ दिल्ली द्वारा इस आयोजन को बड़े पैमाने पर तैयार किया गया है। विज्ञान भवन दिल्ली जैसे प्रमुख स्थल पर आयोजन होना इसे राष्ट्र-स्तरीय स्वरूप देता है। मंच पर संगीत, गाजे-गाजे, प्रवचन, यशोगाथा एवं सामाजिक-धार्मिक संवाद का संपूर्ण संयोजन होगा। इस प्रकार यह कार्यक्रम जैविक रूप से साधना-धार्मिक आयोजन व सामाजिक उत्सव दोनों का रूप लेता है।
उपस्थिती एवं भागीदारी के सुझाव
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दिल्ली के विज्ञान भवन में सुबह 9 बजे “राष्ट्र-संस्कृति-धर्म की यशोगाथा” कार्यक्रम प्रारंभ होगा; उपस्थित होने वाले सजग दर्शकों को समय से पहुंचने की सुझाव दी जाती है।
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उपवास पारणा एवं गाजे-गाजे से संबंधित कार्यक्रम में श्रद्धालुओं, युवा वर्ग, सामाजिक-सांस्कृतिक हस्तियों एवं साधना-परिवार के लोग शामिल होंगे।
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मंच संचालन तथा संगीत-रमझट के बाद प्रवचन एवं सावधानियाँ होंगी; अतः समय-पालन एवं शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखना उचित होगा।
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यदि विशेष आमंत्रण, बैठने की व्यवस्था, पार्किंग, श्रद्धालु प्रवाह आदि का उल्लेख आयोजक ने किया है, तो उनसे पूर्व संपर्क कर लेना लाभदायक रहेगा।
निष्कर्ष
यह आयोजन सिर्फ एक उपवास-समापन का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक धार्मिक-सामाजिक महापर्व है — जिसमें तपस्वी की साधना-यात्रा, जैन धर्म-परंपरा, राष्ट्र-संस्कृति-धर्म का एकत्रित उत्सव होकर सामने आता है। आचार्य श्रीमद् विजय हंसरत्नसूरीश्वरजी महाराज साहेब का आठवीं बार 180-उपवास पारणा इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस कार्यक्रम के माध्यम से जैन समाज एवं समस्त श्रद्धालु “जिनशासन” की गरिमा, धर्म-संस्कार की धरोहर एवं युवा-सशक्तिकरण के उद्देश्य को आगे बढ़ाने का अवसर पाएँगे।
आइए, इस महोत्सव में हिस्सा लें और इस यशोगाथा का साक्षी बनें — “तपस्वी रत्न की जय हो!”


