“इंदौर नगर निगम के पुरस्कार और असली गंदगी का चेहरा — आम आदमी की नजरों से देखें सड़कों और गलियों की हकीकत” ✅
इंदौर, जिसे कभी देश का स्वच्छ शहर कहा जाता था, आज उसी शहर की सड़कों पर कचरे का अंबार नजर आ रहा है। नगर निगम की ओर से बार-बार “स्वच्छता में सिरमौर” बनने की घोषणाएं की जाती हैं, लेकिन असली तस्वीर बिलकुल अलग है। लोग अब खुली आंखों से देख रहे हैं कि शहर की गलियों और कॉलोनियों में कचरा अस्थायी बिंदुओं पर जमा हो रहा है, जिसे कई दिनों तक उठाया ही नहीं जाता।
सच तो यह है कि इंदौर नगर निगम सिर्फ पुरस्कार लेने में माहिर है, असल सफाई व्यवस्था को बनाए रखने में नहीं। शहर के प्रमुख मार्ग भले ही चमकते हुए दिखाई दें, लेकिन पीछे की गलियों, फुटपाथ और नालियों में कचरा और धूल का अंबार जमा हो चुका है। यहां तक कि लोग घरों के कचरे को खुले में ही फेंकने लगे हैं क्योंकि चालान और सख्त कार्रवाई का नामोनिशान नहीं है।
पूर्व निगमायुक्त शिवम वर्मा और अपर आयुक्त अभिलाष शुक्ला के समय में इंदौर स्वच्छता लीग में शीर्ष पर रहा करता था। उनका तबादला होने के बाद नगर निगम की कार्यप्रणाली में ढिलाई नजर आने लगी है। यही वजह है कि अब शहर में बारिश का मौसम खत्म होने और तेज धूप निकलने के बाद कीचड़ सूखकर धूल में तब्दील हो गया है। परिणामस्वरूप शहरवासी हर रोज उड़ती धूल से परेशान हैं।
त्योहारों में बढ़ा कचरे का बोझ
दीपावली जैसे बड़े त्यौहार के चलते कचरे की मात्रा में भी अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है। प्रतिदिन डेढ़ हजार टन से ज्यादा कचरा निकलने वाला इंदौर, अब 1800 टन से अधिक कचरे का सामना कर रहा है। घरों और दुकानों से अतिरिक्त कचरा निकलने के बावजूद कचरा वाहन समय पर कचरा उठाने में असमर्थ हैं। नतीजतन, कई जगहों पर कचरा खुले में फेंका जा रहा है।
स्वास्थ्य समिति के प्रभारी अश्विनी शुक्ला का कहना है कि दीपावली के मद्देनजर अतिरिक्त सफाई अमला लगाया जाएगा और चालान भी बनाए जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उपाय अस्थायी कचरा बिंदुओं और गंदगी की स्थायी समस्या का समाधान कर पाएंगे, या फिर इंदौर सिर्फ पुरस्कार लेने की दौड़ में ही लगा रहेगा?
पुरस्कार और वास्तविकता में अंतर
इंदौर नगर निगम को स्वच्छता में बार-बार देशभर में सम्मान मिला है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह सम्मान सिर्फ फोटोज और रिपोर्ट्स तक सीमित है। नगर निगम शहर की सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई को नजरअंदाज कर रहा है। प्रमुख सड़कें साफ दिखने के बावजूद कॉलोनियों और नगर सीमाओं के आसपास की स्थिति बेहद खराब है।
सफाईकर्मी भी अब ढीले नजर आ रहे हैं। फुटपाथ, गलियां और नालियां जिस तरह से साफ होनी चाहिए, वैसा काम अब नहीं हो रहा। कई जगह खाली प्लॉट और नालियों पर कचरा फेंका जा रहा है। नगर निगम की तरफ से सिर्फ प्रचार और पुरस्कार की बातें हो रही हैं, लेकिन नागरिकों के सामने असली स्थिति बिल्कुल अलग है।
नगर निगम की जिम्मेदारी और नागरिकों की परेशानी
नगर निगम की जिम्मेदारी है कि शहर के हर हिस्से को साफ-सुथरा बनाए। लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि इंदौरवासी धूल और गंदगी से परेशान हैं। यह केवल स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं है, बल्कि शहर की सूरत और जीवन की गुणवत्ता पर भी असर डाल रहा है।
नगर निगम को चाहिए कि सिर्फ पुरस्कार और प्रचार के लिए काम न करे, बल्कि असली सफाई व्यवस्था को पुनः बहाल करे। कचरे के अस्थायी बिंदुओं को तुरंत हटाया जाए, गलियों और कॉलोनियों की सफाई नियमित रूप से की जाए और चालान प्रक्रिया को कड़ाई से लागू किया जाए। तभी इंदौर वास्तव में “स्वच्छता में सिरमौर” कहलाने योग्य होगा।
निष्कर्ष
इंदौर की कहानी हमें यह सिखाती है कि पुरस्कार और प्रचार सिर्फ बाहरी दिखावे हैं। असली सफलता तब होती है जब नागरिक सड़कों और गलियों की सफाई को रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस करें। नगर निगम को चाहिए कि वह वास्तविकता की नजर से काम करे, न कि सिर्फ रिपोर्ट्स और फोटोज के लिए। वरना इंदौर केवल पुरस्कारों का शहर रह जाएगा, स्वच्छ शहर नहीं।
इंदौरवासी अब इंतजार कर रहे हैं कि कब नगर निगम वास्तविक कदम उठाएगा और शहर को वास्तव में स्वच्छ बनाएगा। तब तक केवल कहानियों और पुरस्कारों में इंदौर चमकता रहेगा, लेकिन असली सड़कें और गलियां गंदगी में डूबी रहेंगी।

