जर्जर इमारतें, बेलगाम वाहन और लापरवाह प्रशासन: इंदौर में जिंदगी दांव पर
इंदौर, जिसे देश-विदेश में स्वच्छता और संस्कृति की पहचान के रूप में जाना जाता है, इन दिनों हादसों का शहर बनता जा रहा है। एक के बाद एक दुर्घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर शहर को किसकी पनौती लग गई है और जिम्मेदार अधिकारी कहां हैं?
रानीपुरा में पांच मंजिला इमारत ढहने से तीन परिवार मलबे में दब गए। विधायक की बस दुर्घटना ने चार लोगों की जान ले ली। एयरपोर्ट रोड पर ट्रक की चपेट में आने से कई नागरिक असमय मौत के शिकार हो गए। वहीं, एमवाई अस्पताल में चूहों के काटने से दो मासूम बच्चों की मौत हुई, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की लापरवाही उजागर हो गई। इन हादसों में अब तक 12 निर्दोष लोगों की जिंदगी छिन चुकी है।
प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल उठे हैं। आलोचकों का कहना है कि जो अधिकारी अपने कामों का श्रेय लेने के लिए देश-विदेश तक सम्मान लेने जाते हैं, वही अपने शहर में जिम्मेदारी निभाने से मुंह मोड़ लेते हैं। जनता पूछ रही है—क्या इन मौतों की जवाबदेही कोई लेगा?
नगर निगम पर भी सवाल खड़े हुए हैं। नए निर्माण और कॉलोनियों में कागजी नपाई करने वाले अफसर जर्जर मकानों की तरफ आंखें क्यों मूंद लेते हैं? घटनाओं के बाद ही एडवाइजरी और कार्रवाई की रस्म अदायगी क्यों होती है? बावड़ी हादसे से लेकर अब तक हर त्रासदी के बाद यही पैटर्न दोहराया जा रहा है।
राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका पर भी आरोप लगे हैं। इंदौर में नौ विधायक, दो मंत्री, एक सांसद और खुद मुख्यमंत्री प्रभारी मंत्री की जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। बावजूद इसके, नगर निगम से लेकर पुलिस व प्रशासनिक तंत्र तक केवल “शुभ लाभ” और दबाव की राजनीति में उलझे दिखाई देते हैं।
जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरशाही तक, सबके लिए यह चेतावनी है कि वे केवल वादे, भाषण और औपचारिक कदमों से जनता को भ्रमित न करें। शहर की जनता को भी अब जागना होगा और अपने अधिकारों की मांग करनी होगी, क्योंकि सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि इंदौरी जिंदगी की सुरक्षा का है।


