अवैध रेत उत्खनन ने ली मर्चेंट नेवी अफसर की जान, दतिया में परिवार में मातम
दतिया, मध्य प्रदेश: दतिया जिले के गोराघाट थाना क्षेत्र में एक बड़ा और दर्दनाक हादसा हुआ। ग्राम उचाड़ के सरपंच रेनू चतुर्वेदी के बेटे, 28 वर्षीय मर्चेंट नेवी अफसर किशंकू उर्फ “चीकू” की मौत अवैध रेत उत्खनन के कारण हुई। शनिवार की सुबह किशंकू अपने दोस्तों और चचेरे भाइयों के साथ सिंध नदी में नहाने गया था। नहाते समय वह नदी में खोदे गए गहरे गड्ढों में फंस गया और करीब 20 घंटे तक तलाशने के बाद उसका शव बरामद हुआ।
किशंकू की मौत ने पूरे उचाड़ गांव में मातम फैला दिया है। उनके पिता ने बताया कि उन्होंने पहले ही बेटे को चेतावनी दी थी कि नदी में गहरे गड्ढे बने हैं और वहां जाना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन किशंकू ने अपने पिता को आश्वस्त किया कि उसे तैरना आता है और उसे किसी खतरे की आशंका नहीं है। किशंकू की यह आत्मविश्वासभरी निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुई।
रेत माफियाओं की मनमानी
स्थानीय लोगों का कहना है कि सिंध नदी में गहरे गड्ढे रेत माफियाओं द्वारा किए गए अवैध उत्खनन के कारण बने हैं। रेत माफिया यहां तक कि पनडुब्बियों का इस्तेमाल कर रेत उत्खनन करते हैं, जिससे नदी में गहरे गड्ढे और खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो गई। दतिया और ग्वालियर जिलों में अवैध रेत उत्खनन की यह प्रवृत्ति खासकर वर्षा ऋतु में भी जारी रहती है, जबकि सरकार ने वर्षा काल के दौरान रेत उत्खनन पर प्रतिबंध लगा रखा है।
प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत
सूत्रों के अनुसार, अवैध रेत उत्खनन को स्थानीय प्रशासन और पुलिस का संरक्षण प्राप्त है। रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे खुलेआम नदी में गहरे गड्ढे बनाते हैं और रेत को उत्तर प्रदेश में बेच देते हैं। वहीं, स्थानीय राजनेता भी इन पर छुपा-छुपाया संरक्षण देते हैं। इस मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन और पुलिस अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का साहस दिखा पाएंगे।
एक परिवार की खुशियों का अंत
किशंकू की मौत ने रेनू चतुर्वेदी के परिवार की खुशियों को छीन लिया। अमेरिका की एक विदेशी कंपनी में काम कर रहे किशंकू परिवार की एकमात्र आशा थे। अब उनका परिवार गहरे शोक में डूबा हुआ है। स्थानीय लोगों और परिवार ने प्रशासन से कड़ी कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में इस तरह के हादसे रोके जा सकें।
इस दुखद घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि अवैध रेत उत्खनन केवल पर्यावरण और नदी के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह सीधे मानव जीवन को भी खतरे में डालता है।
